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कितने काम का है यह सत्र

Tue, 17 Jul 2018 06:33 PM IST
manisha priyam मनीषा प्रियम
Updated Tue, 17 Jul 2018 06:33 PM IST
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How much valuable is this session
संसद

अमूमन मानसून का सत्र संसद के लिए एक लंबे कार्यकाल वाला सत्र होता है, इसकी अवधि बरसात से लेकर लगभग शीतकालीन सत्र तक खिंच जाती है। वास्तव में अगर देखें, कृषि प्रधान देश भारत में यह सत्र खेती-बाड़ी और वर्षा के चक्र से जुड़ा हुआ है। बारिश के बाद दिल्ली के सत्ता के गलियारों में भी नमी आती है और यदि तेवर कड़े भी रहे, तो सब राजनीति भूलकर सृजनात्मक वैधानिक संभावनाओं में अपने-आपको डुबो देते हैं। वैसे में 2018 का मानसून सत्र एक अनूठा सत्र होने की संभावना है। गत बजट सत्र में बजट पास होने के अलावा और कोई भी विशेष चर्चा नहीं हो पाई। दम-खम से गर्मा-गर्मी होती रही, सत्तारूढ़ भाजपा के साथी तेलगुदेशम पार्टी ने अपना गठबंधन तोड़ विरोध का तेवर अपना लिया और संसद के बाहर दक्षिण के राज्यों में पंद्रहवें वित्त आयोग के ऊपर भी तीव्र आलोचना की गई। यानी कि केंद्र सरकार की आलोचना संघीय ढांचे में उभरे हुए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के जरिये और राज्यवार मुद्दों के आधार पर जमकर की गई। सत्रावकाश के दरम्यान कर्नाटक में भी चुनाव हो गए और यहां नतीजा कुछ घालमेल वाला ही रहा है। ले-देकर राजनीतिक चरित्र में खींचातानी, बहसबाजी और गर्मा-गर्मी की कोई कमी नहीं रही है। दिसंबर में चार राज्यों के महत्वपूर्ण चुनाव होने वाले हैं, इनमें से तीन में भाजपा का शासन है। ऐसी परिस्थिति में आशंका अब यह बनी हुई है कि क्या 2018 का मानसून सत्र भी धुल जाएगा या इसमें विचार-विमर्श की संभावना है।


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पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और मिर्जापुर में किसानों के मुद्दों को पुरजोर ढंग से उठाया और कहा कि किसान यदि आज जर्जर अवस्था में हैं, तो उसकी जिम्मेदारी उनसे पहले सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकारों की है। प्रधानमंत्री ने कहा कि ड्रिप इरिगेशन या सिंचाई की अन्य परियोजनाएं अधूरी लटकी हैं। वह कितना भी चाहें, इन अधूरी योजनाओं को पूरा नहीं कर सकते। आजमगढ़ में भी उन्होंने कहा कि सरकार को विपक्षी दलों द्वारा काम नहीं करने दिया जाता है। वहीं महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से जो कुछ भी सुनने में आ रहा है, वह यही है कि विपक्षी दल सदन के पटल पर मुद्दों पर भी सरकार का विरोध करेंगे और शायद सरकार में अपना अविश्वास भी जाहिर करें। ले-देकर दोनों तरफ से तेवर कड़े और गर्मा-गर्मी वाला राजनीतिक अंदाज है।

बजट में किए गए महत्वपूर्ण वायदों का क्या होगा, आयुष्मान भारत जैसी योजना का क्या होगा, स्वास्थ्य और शिक्षा के सुधारों पर नीतिगत विचार-विमर्श होगा या नहीं, यह विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि ये मामले समवर्ती सूची के हैं और गरीबों की जिंदगी का इनसे सीधा-सीधा जुड़ाव है। इसके साथ ही अगर मानसून अपना प्रभाव नहीं दिखा पाता है, तो कृषि का संकट और गहरा जाएगा। एमएसपी पर बयानबाजी, किसानों के गर्म तेवर और कृषि की जटिल समस्याओं पर कोई गंभीर बहस नहीं हो रही है। यहां विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी है कि वह संसद में बहस करवा सके। सरकार की आलोचना करनी भी हो, तो सदन के भीतर करे। लेकिन अब तो ट्विटर पर ही सारे संवाद सीमित रह जाते हैं। यहां न तो ग्रीष्म की अनुभूति है और न ही सूखा पड़ने का कोई डर। एक वैकल्पिक दुनिया में ही ट्वीट वार चला-चला कर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी खुश हैं।

संसद बहस और विचार का पटल है और संचार के साधनों में कितना भी इजाफा हो, संसद की इस भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में संसदीय कार्य मंत्री और लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति, दोनों की यह जिम्मेदारी बनती है कि सर्वदलीय बैठकों के जरिये मनमुटाव को दूर करें और परस्पर वार्तालाप के जरिये महत्वपूर्ण मुद्दों को रेखांकित कर अच्छी चर्चा का उत्कृष्ट उदाहरण भारतीय लोकतंत्र को दें। बड़ी कठिनाई से गरीब, दूरस्थ इलाके के निवासी, सबला-अबला सभी मिलकर अपने प्रतिनिधियों को चुनकर इसी उम्मीद से संसद भेजते हैं कि उनके इलाके की समस्याओं को ऊंचे संवाद के केंद्र में रखा जाएगा। मगर होता यह है कि प्रतिनिधि केवल राजनीतिक तेवर दिखाते रह जाते हैं और लोगों के मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा निहित है, लेकिन वैचारिक और वैधानिक मामलों पर संसद को अपना स्तर बनाए रखना होगा। यह कठिन जिम्मेदारी लोकसभा की सर्वोच्च पीठासीन अधिकारी श्रीमती सुमित्रा महाजन की है। राज्यसभा की भूमिका भी अहम है, क्योंकि वह राज्यों के विचारों-मुद्दों को सदन में लाने का काम करता है।
 
कुछ महत्वपूर्ण विधेयक जिसे सरकार इस सत्र में पारित कराना चाहती है, वे हैं-तीन तलाक विधेयक, पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने संबंधी विधेयक, बलात्कार के दोषियों को सख्त दंड के प्रावधान वाला विधेयक, मेडिकल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग विधेयक और ट्रांसजेंडर के अधिकारों से जुड़ा विधेयक। इसके अलावा, सार्वजनिक परिसर अनधिकृत कब्जा को हटाने संबंधी संशोधन विधेयक 2017, दंत चिकित्सक संशोधन विधेयक 2017, जन प्रतिनिधि संशोधन विधेयक 2017, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट अमेंडमेंट विधेयक, नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र विधेयक 2018, भगोड़ा आर्थिक अपराध विधेयक 2018 को भी चर्चा एवं पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। सचमुच अगर सरकार इन विधेयकों पर चर्चा करना और इन्हें पारित करना चाहती है, तो संसदीय कार्य मंत्री की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सभी विपक्षी दलों तक सरकार की मंशा को लेकर जाएं और उन दलों की बातों को भी सुनकर उन्हें साथ लेकर चलें।

पूर्वाग्रह के बजाय इस हफ्ते यह सब्र से देखना होगा कि संसद में बहस और विचार कोई रुख पकड़ता है या तल्खी का बाजार गर्म रहेगा। यदि संसद अपना कार्य नहीं करती, तो चुनाव शीघ्र ही अनुमानित किया जाना चाहिए। फिलहाल, यदि कार्यकलाप सही नहीं हुआ, तो जनता को अपनी निराशा व्यक्त करने में चूकना नहीं चाहिए। 

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