ओली कितना बदल पाएंगे नेपाल को
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नेपाल में नए प्रधानमंत्री के चुनाव ने इस देश के साथ भारत के संबंधों के बारे में जिन आशंकाओं को रेखांकित किया है, वे अभूतपूर्व और चिंताजनक ही कही जा सकती हैं। नरेंद्र मोदी ने राजनयिक शिष्टाचार का निर्वाह करते हुए जब उन्हें शुभकानाएं भेजीं, तो धन्यवाद ज्ञापन के साथ ही नेपाली नेता ओली ने उम्मीद जताई कि भारत जल्द ही तराई-मधेस में लगाए ‘अवरोध-बंध’ हटाकर नेपाल का कष्ट दूर करेगा, जिससे हालात सामान्य हो सकेंगे। जिस अवरोध की बात ओली कर रहे हैं, वह भारत की ‘शरारत’ नहीं, बल्कि नेपाली सरकार की असमर्थता से उपजा संकट है। नेपाल सरकार की इस असमर्थता के लिए वहां के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की अदूरदर्शिता-मौकापरस्ती जिम्मेदार है। इसलिए इस संदर्भ में भारत पर आरोप लगाना निहायत गैर जिम्मेदार हरकत ही कही जा सकती है।
नेपाल लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में रहा है। नए संविधान के मसौदे पर राष्ट्रीय सहमति नहीं बन सकी है। यही वर्तमान ‘संकट’ का असली कारण है। सबसे बड़ा टकराव पहाड़ी और मैदानी-मधेसी आबादी के बीच है। नेपाल की जनसंख्या का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़ी सरहद के पास वाले मैदानी भाग में बसा है। इसे लगता है कि अब तक उसे अधिकारों से वंचित रखा गया है। अल्पसंख्यक पहाड़ी श्रेष्ठिवर्ग ही काठमांडू की राजनीति में प्रभावशाली रहा है, जिस कारण क्षेत्रीय विकास असंतुलित रहा है। दूसरी ओर, नेपाली पहाड़ियों की नजर में मधेसी ‘असली’ यानी ‘मूल’ नेपाली हैं ही नहीं-हाल में भारत से पहुंचे आप्रवासी हैं, जिनके 'रोटी-बेटी के रिश्ते' उन्हें भारत के साथ जोड़े रहते हैं और इसी कारण वे नेपाल के राष्ट्रहित की उपेक्षा करते हैं! यहां इस कुतर्क का झूठ जगजाहिर करने की आवश्यकता नहीं है। जिस बात का पर्दाफाश ज्यादा जरूरी है वह यह, कि नेपाल की अनेक जनजातियां, जो पहाड़ों में रहती हैं, वे भी नए सांविधानिक मसौदे से असहमत हैं। उन्हें और महिलाओं को यह शिकायत है कि इस संविधान में एक बार फिर उनका हक मारा जा रहा है। जिस संघीय प्रणाली का खाका सामने रखा गया है, उसके अनुसार सूबों का गठन खतरनाक विभाजक पहचान को ही पुष्ट कर सकता है। इसे भारत का षड्यंत्र नहीं कहा जा सकता।
हकीकत यह है कि दशकों से चले आ रहे गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद भी नेपाल बुरी तरह विभाजित रहा है। माओवादी हिंसा त्याग संसदीय राजनीति में शामिल तो हुए, पर छापामार सैनिकों के पुनर्वास की समस्या का समाधान नहीं हो सका। राजा के प्रति अंत तक वफादार रही नेपाली सेना में इस तबके के प्रति शक बरकरार रहा और बंदूक तजकर बैलट से समतापूर्ण समाज के निर्माण का मार्ग चुनने को नादानी मानने वाले कट्टरपंथी अतिवामपंथियों ने अपनी अलग राह चुनी। सत्ता सुख भोगने के बाद माओवादी नेतृत्व की फूट सामने आते देर नहीं लगी। प्रचंड और बाबूराम भट्टराई के बीच की दरार इसका एक उदाहरण है। अब तक हाशिये पर पहुंच चुके नेताओं और राजनीतिक दलों को इसमें अपने पुनर्जन्म की संभावना नजर आती रही है। साथ ही पदच्युत ज्ञानेंद्र के समर्थकों का यह लालच बढ़ा है कि अस्थिरता-अराजकता को बढ़ावा देकर वह राष्ट्र को बचाने के लिए फिर राजशाही की स्थापना की मांग को जनादेश के सांचे में ढाल सकते हैं। यह बहुत दूर की कौड़ी लाना नहीं-ओली का राजनीतिक जीवन साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित कार्यकर्ता से लेकर राजशाही समर्थक और दक्षिणपंथी-प्रतिक्रिया या यथास्थितिवादी नेता तक का आश्चर्यजनक चक्र पूरा कर चुका है। अपने किसी भी ताकतवर विपक्षी को भारतीय एजेंट या देशद्रोही करार देने की रणनीति अपनाने वाले वह पहले नेपाली नेता नहीं हैं।
बहरहाल, नेपाल के लिए अपने हितों को प्राथमिकता देने की बात से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। पर नेपाल को यह समझना होगा कि वह भारत के हितों की बलि अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए नहीं देता रह सकता। भारत का ‘भयादोहन’ कर मनचाही मुराद पाने के दिन लद चुके हैं। नेपाल अब तक भारत से जो सुविधाएं प्राप्त करता रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय विधि में निर्धारित व्यवस्था से कहीं अधिक है। भूराजनीतिक संवेदनशील सामरिक स्थिति के प्रचार से जो कमाई हो सकती है, वह अब तक कमाई और गंवाई जा चुकी है। हर वक्त चीनी या पाकिस्तानी तुरुप का पत्ता खेलने की प्रवृत्ति ने इस धमकी की कलई खोल दी है।
भारत के लिए इसे अनदेखा करना असंभव है कि मधेसी इलाके में हिंसक उपद्रव बढ़ रहे हैं और यह लावा बहकर सरहद पार भी आ सकता है। यह शिकायत करना कि भारत असंतोष को भड़का रहा है, गलत है। यह मांग भी नाजायज है कि भारत को सख्त कदम उठाकर हड़ताल समाप्त करवानी चाहिए। उत्पात नेपाली जमीन पर हो रहा है, वहां भारतीय ‘हस्तक्षेप’ गैरकानूनी ही कहा जाएगा। समय आ पहुंचा है कि काठमांडू में बैठे नेताओं को अपनी बोई फसल खुद काटनी पड़ेगी!
बात कड़वी है, पर सच यही है कि बरसों से विदेशी सहायता के कारण आर्थिक विकास के प्रति लापरवाह नेपाली नेताओं और नागरिकों ने यह चिंता छोड़ दी थी कि राष्ट्र निर्माण की उनकी भी जिम्मेदारियां हैं। भारत को नेपाल की खुशहाली के मार्ग में बाधक बताने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। चीन हो या जापान, अमेरिका अथवा यूरोपीय देश या फिर पाकिस्तान, इनमें से कोई भी जरूरत के वक्त उस तरह से नेपाल के काम नहीं आ सकता, जैसे भारत। भूकंप की त्रासदी ने इसे साबित कर दिया था। नेपाल ने हमेशा भारत को बदनाम कर भारतीय सामरिक हितों को नुकसान पहुंचाया है।
विदेश नीति में भाव-विह्वलता का कोई स्थान नहीं। भारत के लिए संयम और धैर्य ही बेहतर है। पर नेपाल के वर्तमान नेतृत्व के लिए भी यह समझना बेहतर होगा कि धैर्य की सीमा होती है और आज घड़ी की सूइयों को पीछे लौटाना संभव नहीं।