छुट्टी राहुल को कितना बदलेगी
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राहुल गांधी छुट्टी पर हैं! इस समाचार की दो प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। एक तो यह कि वह कब छुट्टी पर नहीं थे? और दूसरी यह कि यह छुट्टी उन्हें काफी पहले ले लेनी चाहिए थी। राहुल गांधी की परेशानी यह है कि वह जिस पार्टी से जुड़े हैं, वह उनसे सब कुछ चाहती है, लेकिन पार्टी उनके लिए नारे लगाने से अधिक कुछ न करे! वह जिस परिवार से जुड़े हैं, वह नाम ही इतना बोझिल है कि किसी भी नए नेता का दम टूट जाए; और राहुल तो उन नेताओं में हैं, जिन पर परिवार भी और नेतृत्व भी लाद-सा ही दिया गया है। इसलिए जरूरी था कि राहुल को नेतृत्व में सामने लाते ही पार्टी और परिवार उनके साथ कवच बन कर नहीं, हथियार बनकर खड़ा हो जाता। पर हुआ ऐसा कि पार्टी और परिवार राहुल को सामने कर दर्शक बन गया। ऐसे में वह बार-बार सेनापति के तेवर से चुनाव मैदानों में उतरते रहे और अंत होते-होते पैदल सिपाही की भूमिका में युद्धभूमि से बाहर जाते मिले।
राहुल ने कभी लड़ाई का तेवर नहीं छोड़ा, पर लड़ाई वह कभी बना नहीं पाए। कांग्रेस के पास कोई प्लान नंबर दो था नहीं! एक प्लान जो संभव भी था, वह यह कि जहां राहुल कमजोर पड़ रहे थे, वहीं से प्रियंका मैदान में कूद पड़तीं। पर यह सोचा गया हो शायद कि दो-दो कुर्बानी एक ही साथ देने से आगे कुछ नहीं बचेगा! लेकिन कुर्बानी तो दो देनी पड़ी-राहुल भी गए और कांग्रेस भी!
राहुल गांधी राजनीतिक विचारक नहीं हैं। इसलिए वह पार्टी और जनता को साथ लेकर उस तरह चल ही नहीं सकते, जिस तरह नेहरू या इंदिरा गांधी या किसी हद तक राजीव गांधी चला करते थे। इसलिए जरूरी था कि पार्टी के दूसरे नेता राहुल के साथ खड़े होते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। राहुल पार्टी को जैसा भी स्वरूप देना चाहते थे, उसका नक्शा कभी सामने नहीं आया, पर यह अंदाजा जरूर हुआ कि पार्टी को वह ज्यादा जनाभिमुख बनाना चाहते थे। लेकिन इस मामले में अध्यक्ष मां और पार्टी पूरी तरह राहुल के साथ खड़ी नहीं हुईं।
कांग्रेस की संस्कृति में यह बात शामिल है कि वह नए व्यक्ति और नए तेवर को तब तक कुबूल नहीं करती, जब तक वह चुनावी सफलता न दिला दे। नेहरू की तो जानें दें, इंदिरा गांधी ने वही किया था और राजीव गांधी ने भी वहीं से अपना सफर शुरू किया था। अटल बिहारी वाजपेयी की आत्ममुग्ध सरकार को चुनाव में हराने में यही करिश्मा सोनिया गांधी ने भी किया था।
राहुल अब तक वैसा कुछ नहीं कर सके हैं और इसीलिए उनकी यह छुट्टी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के पास कोई दूसरा राहुल गांधी नहीं है। राहुल जैसी राजनीतिक संस्कृति में पले-बढ़े हैं, उसमें उनके पास भी दूसरी कोई कांग्रेस नहीं है। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। इसलिए अप्रैल में जब कांग्रेस का अधिवेशन होगा, तब राहुल गांधी म्युनिख से आते हैं कि ग्रीस से कि हिमालय के किसी हिस्से से, यह बात कोई मतलब नहीं रखती। मतलब अगर कुछ रखता है, तो वह यह कि कांग्रेस के बारे में राहुल क्या सोचकर आते हैं, उसे कितने आत्मविश्वास से पार्टी के सामने रखते हैं, और पार्टी कैसे उन्हें अपनी कमान सौंपती है।
तो राहुल गांधी के विकल्प राहुल खुद ही हैं, और कांग्रेस को फिर से विकल्प बनना हो, तो भी विकल्प राहुल गांधी ही हैं। दोनों कुछ सप्ताहों की इस छुट्टी से लौटते हैं, तो कितना बदल कर लौटते हैं, यही इस छुट्टी का एकमात्र सार्थक परिणाम हो सकता है।