कैसे रुके किसान आत्महत्या
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हमारे देश में किसानों की आत्महत्या खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। वर्ष 1997 से 2006 के दौरान देश में 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की। यह आंकड़ा भी पूर्ण नहीं है, क्योंकि इसमें भूमिहीन ग्रामीण मजदूरों और किसानों को शामिल नहीं किया गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, पिछले वर्ष 5,650 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें 75 फीसदी सीमांत किसान थे, जबकि 90 फीसदी किसान तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के ही थे। महाराष्ट्र में वर्ष 2011 से 2013 के बीच दस हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की, जबकि इस वर्ष अकेले मराठवाड़ा क्षेत्र में दो सौ से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की। आत्महत्या करने वाला देश का हर पांचवां व्यक्ति किसान है। यह बेहद मार्मिक मानवीय त्रासदी है। एक प्रतिनिधि के रूप में मैंने अगले पांच वर्षों तक का अपना संसदीय वेतन उत्तर प्रदेश के उन परिवारों के हित में देने का फैसला किया है, जिन परिवारों के किसानों ने आत्महत्या की हैं।
गहराते कृषि संकट के कारण ही देश में किसानों की आत्महत्या और उनकी असुरक्षा बढ़ी है, क्योंकि उनके पास आजीविका के बहुत कम साधन बचे हैं। देश की कृषि जोत में छोटे और सीमांत किसानों की प्रधानता है, जिनकी 44 फीसदी खेतों और 87 फीसदी आबादी में हिस्सेदारी है, और वे कुल सब्जियों का 70 फीसदी और कुल अनाज का 52 फीसदी उत्पादन करते हैं। एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन) के मुताबिक, एक तिहाई किसानों के पास मात्र 0.4 हेक्टेयर भूमि है, जबकि 50 फीसदी किसान परिवार (औसतन 47,000 रुपये) कर्ज में फंसे हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में पिछले पांच वर्षों में कृषि लागत में 33 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। नतीजतन उन्हें बढ़ती गरीबी, घटते लाभ और जमीनों के विखंडन का सामना करना पड़ रहा है। उपज में कमी उन्हें आखिरकार जीवन के त्रासद अंत की तरफ ले जाती है। खेती से अब जीने के लिए मजदूरी भी नहीं मिलती।
हमारे देश में फसल पद्धति और मुआवजे की व्यवस्था काफी खराब है, जिसके कारण भी ऐसे संकट बढ़ते हैं। घटते भूजल (61 फीसदी सिंचाई इसी पर निर्भर है) के बावजूद शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले किसानों को उच्च उपज वाले गेहूं एवं धान की फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है। महाराष्ट्र एवं राजस्थान के ज्यादातर ब्लॉकों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो चुका है। चूंकि मिट्टी की गुणवत्ता खराब है, ऐसे में, पिछड़े इलाकों में सिंचाई के अभाव के कारण यह विषम फसल पद्धति अस्थिरता ही बढ़ाती है। फिर फसल बर्बाद होने पर मुआवजा देने की जो मौजूदा व्यवस्था है, वह भी कृषि मजदूरों से ज्यादा भूस्वामियों के पक्ष में है, क्योंकि यह भूस्वामी के रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाता है। फसलों को होने वाली क्षति की आकलन प्रक्रिया और मुआवजे का वितरण अब भी विकट है।
उचित दस्तावेजीकरण की कमी, भ्रष्ट नौकरशाही और अयोग्य स्थानीय प्रशासन के कारण किसानों को समय पर मुआवजा, सस्ता कर्ज या बीमा की सुविधा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो गया है। संपदा अधिकार में पारदर्शिता बढ़ाकर और भूमि केंद्रित न्यायिक प्रणाली को सुधार कर इस व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। सैटेलाइट और सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल करके बर्बाद फसलों के आकलन में होने वाले विलंब को कम किया जा सकता है।
कर्ज का किसानों की आत्महत्या से सीधा संबंध है। किसान आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम तभी उठाते हैं, जब गैर उत्पादक कार्यों के लिए वे उच्च ब्याज दर पर कर्ज लेते हैं। दूसरी ओर, उनकी आय उम्मीद के मुताबिक नहीं होती। कई पीड़ित परिवारों ने बताया कि पैदावार बढ़ने और भारी कीमत मिलने की उम्मीद में उन्होंने कर्ज लिया था। बीटी कॉटन की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा है, जबकि इन किस्मों की पैदावार के लिए पर्याप्त सिंचाई चाहिए। भूजल का स्तर घटने और कम वर्षा होने की स्थिति में पानी के लिए कुएं खुदवाने और पंपिंग सेट में भारी निवेश करने का भी किसानों को बहुत फायदा नहीं होता। सिंचाई सुविधा बढ़ने के बावजूद खेती अब ज्यादा अस्थिर हो गई है। जब बाजार और मौसम साथ नहीं देता, तो किसानों की दरिद्रता बढ़ जाती है।
किसान साहूकारों से कर्ज न लें, इसके लिए बैंकों से कर्ज सुलभ और उपलब्ध कराने की जरूरत है। कर्ज के चक्र को खत्म करने के लिए लाभ के प्रावधानों को सरल बनाने और कर्ज वितरण की प्रभावी निगरानी की जरूरत है। सिंचाई व्यवस्था में सुधार भी आवश्यक है। पाइपों के जरिये सीधे पौधों की जड़ों में पानी पहुंचाने की (ड्रिप इरिगेशन) व्यवस्था इसका समाधान है-जो खेत के अनियमित आकार और असमतल स्थलाकृति को समायोजित करने में सक्षम हो और जहां पानी का 70 फीसदी तक सदुपयोग हो, जो 230 फीसदी ज्यादा पैदावार दे और उर्वरक की प्रभाव दक्षता तीस फीसदी तक बढ़ाए। एक बड़ी समस्या बैंकों से कर्ज मिलने की भी है, क्योंकि बैंक छोटी जोत वाले किसानों को ऋण उपलब्ध कराने में आनाकानी करते हैं। लैंड पुलिंग से बड़े पैमाने पर इसके समाधान में मदद मिल सकती है। लैंड पुलिंग वह व्यवस्था है, जिसमें सीमांत किसान अपने खेत एक साथ मिलाकर खेती कर बड़े पैमाने पर लाभ पा सकते हैं। इसके अलावा, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना जैसी सब्सिडी योजना ऐसे लेन-देने के ढांचा निर्माण में मदद कर सकती हैं।
सरकार को सीमांत किसानों की जरूरतों पर ध्यान देना होगा। निराशाजनक अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने के लिए सामाजिक एवं संस्थागत तंत्र को फिर से मजबूत बनाए जाने की जरूरत है।
-लेखक भाजपा सांसद हैं