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विरल अध्यवसाय की विरासत

Thu, 12 Apr 2018 07:07 PM IST
गिरीश्वर मिश्र
गिरीश्वर मिश्र Updated Thu, 12 Apr 2018 07:07 PM IST
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Heritage of rare pursuits
गिरीश्वर मिश्र

आधुनिक हिंदी को विकसित होने के लिए जमीन तैयार करने में जिन महापुरुषों ने निश्छल तन्मयता से योगदान किया, उनमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम अविस्मरणीय है। आज जब सुविधा और संपन्नता बढ़ गई है, तो भी किसी में इतना बौद्धिक साहस, ज्ञान के प्रति गहरा लगाव और इतनी जिज्ञासा नहीं दिखती, जो घोर अभावों और असुविधाओं में कार्य करने वाले हिंदी के  इस निर्व्याज साधक में विद्यमान थी। उन्होंने भारत और भारत के बाहर चीन, तिब्बत, श्रीलंका, जापान, ईरान और सोवियत रूस समेत अनेक देशों की खाक छानी, दुर्गम यात्राएं कीं, वहां के जीवन में  रमे और ज्ञान प्राप्ति की अनथक चेष्टा की। उन्होंने अनेक दुर्लभ ग्रंथ खोजे और भारत को उपलब्ध कराए। एक बेतरतीब, हड़बड़ी वाली और कुछ-कुछ ऊबड़ ख़ाबड़-सी जिंदगी जीते हुए उन्होंने सबके सामने एक असंभव-सा प्रतिमान खड़ा कर दिया। वह देशज मनीषा, ज्ञान की तीव्र ऐषणा और अपने समाज के प्रति सहज आत्मीयता की एक मिसाल बन गए ।


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एक सौ पच्चीस वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की धूल-मिट्टी में वह पैदा हुए थे। शैशव में उनकी माता चल बसी थीं। बचपन में विवाह हो गया था। गांव की परिस्थितियां उनकी प्रतिभा के अनुकूल नहीं थीं। चौदह वर्ष की आयु में वह घर छोड़कर बाहर की दुनिया देखने, समझने और जानने में जो लगे, तो वही उनका व्यसन बन गया। किशोर वय से ही वह आत्मान्वेषण में प्रवृत्त हुए। श्रीलंका में बौद्ध धर्म में दीक्षित होने पर उन्हें ‘राहुल’ नाम मिला। बहुभाषाविद राहुल सांकृत्यायन का देशज संस्कृति, इतिहास, भाषा और शास्त्र के साथ बड़ा लगाव था। ज्ञान के नए-नए क्षेत्रों का स्पर्श और उसमें अवगाहन करने का उनमें दुर्निवार आकर्षण था। पर वह निपट शास्त्रज्ञ नहीं थे। उनमें गहन लोक-चिंता भी मौजूद थी, जो एक तरफ ज्ञान और अनुभव को साझा करने में लगी थी, तो दूसरी ओर आम जन और किसानों के साथ खड़े होकर उनके साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध लड़ने में भी प्रतिफलित हुई। साम्यवाद के प्रति उनमें गहरा रुझान था। वह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और आंदोलनों में भी सक्रिय रूप से भाग लिया, पर बाद में उनका इससे मोहभंग हो गया।

राहुल जी की उदग्र सर्जनात्मकता अनेक दिशाओं में प्रतिफलित हुई। इतिहास, दर्शन शास्त्र और बौद्ध साहित्य के अध्ययन-अनुशीलन के साथ सृजनात्मक साहित्य के क्षेत्र में उनकी मौलिक कृतियां भारत की संस्कृति को समग्रता में समझने और विश्व के साथ उसके संबंध को जानने में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। उन्होंने बौद्ध पिटक ग्रंथों का हिंदी में प्रामाणिक अनुवाद प्रस्तुत किया, तो भोजपुरी नाटक लिखे और जनपदीय भाषा के रूप में  भोजपुरी को समृद्ध करने के लिए यत्न किया। यात्रा और घुमक्कड़ी से लेकर उपन्यास, नाटक और कथा की विधाओं में उनकी लेखनी ने भाषा और विषयवस्तु, दोनों दृष्टियों से हिंदी को बहुत कुछ दिया है। उनके यात्रा वृत्तांत भी बड़े समृद्ध हैं।

राहुल सांकृत्यायन अपने पाठकों से लोकभाषा, लोकगीत और प्रथाओं तथा रीतियों को उदारतापूर्वक साझा करते चलते हैं। उनके लिए संप्रेषण ही मुख्य था और उसके साथ वह कोई समझौता नहीं करते थे। इस महापंडित ने अपना कोई दल, मठ या कुनबा खड़ा नहीं किया। अनथक परिश्रम ने उन्हें मधुमेह का रोगी बना दिया था और अंतिम समय में वह स्मृति भ्रंश के भी शिकार हो गए थे।

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