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राष्ट्रीय सुरक्षा: ताकत के इस्तेमाल पर सावधान करती है हेनरी किसिंजर की विरासत

Fri, 01 Dec 2023 07:37 AM IST
गुलाम अहमद बेन रोड्स, पूर्व अमेरिकी उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
बेन रोड्स, पूर्व अमेरिकी उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Published by: गुलाम अहमद Updated Fri, 01 Dec 2023 07:37 AM IST
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सार
एक समय अमेरिका के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रहे किसिंजर ताकत के इस्तेमाल में यकीन रखते थे। पर उनकी विरासत हमें सावधान भी करती है। लाओस के बच्चे भी अमेरिकी बच्चों की तरह गरिमापूर्ण जीवन के हकदार हैं, और चिली को भी अपने फैसले लेने का हक है। यही सिद्धांत राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार होना चाहिए। 
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Henry Kissinger legacy cautions against use of force in national security
Henry Kissinger - फोटो : Social Media

विस्तार

महाशक्ति देश अमेरिका क्या करता है, और अमेरिका को क्या करना चाहिए-हेनरी किसिंजर इन दोनों के फर्क के सबसे प्रभावी प्रतीक थे। उनकी विदेश नीति में ताकत के इस्तेमाल का महत्व था, जिसमें मानवीय अस्तित्व की जगह कम थी।



वर्ष 1969 से 1977 तक हेनरी किसिंजर ने खुद को सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में स्थापित किया। उस दौर की एक अवधि में वह एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री की बिल्कुल अलग-अलग जिम्मेदारियां एक ही साथ निभाईं, नतीजतन उस दौरान अमेरिकी विदेश नीति की दिशा तय करने और उस पर अमल करने की सर्वोच्च जिम्मेदारी उन पर थी।  जर्मन यहूदी मूल के होने और अपने खास उच्चारण के कारण अमेरिकी सत्ता राजनीति में जहां वह सबसे अलग थे, वहीं ताकत का बेहद सहजता से इस्तेमाल करने के कारण वह उस अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका में स्वाभाविक थे, जिसने 20वीं सदी में अपनी क्षमता का विस्तार किया।


हेनरी किसिंजर के रिटायर होने के दशकों बाद मैंने शीतयुद्ध और 9/11 की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में आठ साल तक अपनी जिम्मेदारी निभाई। हेनरी किसिंजर अपनी गुरुतर भूमिका से जरा भी असहज नहीं थे। उनके मुताबिक, पद की साख इसमें नहीं कि हमें क्या करना चाहिए, बल्कि इसमें है कि हमने क्या किया। हालांकि वैसे में मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता ढुलमुल लगने लगती थी। उन्होंने वियतनाम के खिलाफ अमेरिकी युद्ध को सिर्फ व्यापक रूप ही नहीं दिया, कंबोडिया और लाओस तक उसका विस्तार भी किया। वहां अमेरिका ने ऐसी गहन बमबारी की, जैसी उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी और जापान पर भी नहीं की थी। उस बमबारी का, जिसमें कई बार निर्दोष नागरिकों का संहार भी हुआ, कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला, हां, इससे यह संदेश जरूर मिला कि अपनी पराजय सामने होने पर अमेरिकी नाराजगी कितनी संहारक हो सकती है।

यह विडंबना ही है कि शीतयुद्ध के दौर में मुक्त विश्व की तरफ से हेनरी किसिंजर ने व्यापक नरसंहार के अभियानों को समर्थन दिया : चाहे वह बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तान का अभियान रहा हो या ईस्ट तिमोर के लोगों के खिलाफ इंडोनेशिया का। किसिंजर पर आरोप लगा कि चिली में उन्होंने सैन्य तख्तापलट की जमीन तैयार की, जिसका नतीजा निर्वाचित कम्युनिस्ट राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की हत्या और फिर तानाशाही शासन के उथल-पुथल भरे दौर के रूप में सामने आया। विचारधारा की लड़ाई के संदर्भ में किसिंजर अपनी इन कवायदों को उचित ठहराते थे, जिससे सोवियत संघ और क्रांतिधर्मी कम्युनिज्म का खात्मा संभव हुआ। पर इस अमेरिकी सोच की तीखी आलोचना हुई। दुनिया को इसका क्रूर संदेश यह था कि अमेरिका सिर्फ अपने देश में लोकतंत्र की परवाह करता है, दूसरे देशों में नहीं।

किसिंजर अमेरिका की मजबूत छवि निर्माण के आग्रही थे और चाहते थे कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अमेरिका के मुताबिक फैसले लेने से जो इन्कार करें, उन्हें उसकी कीमत चुकानी पड़े। लाओस पर बमबारी, चिली में तख्तापलट या पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बंगालियों के संहार से शीतयुद्ध का संबंध जोड़ पाना मुश्किल है। पर यह दुनिया को देखने का किसिंजर का ठंडा और निरपेक्ष रवैया ही था, जिसके कारण अधिनायकवादी देश अमेरिका के पाले में आए, सोवियत संघ से अमेरिका के रिश्ते बेहतर होने से हथियारों की होड़ खत्म हुई, और चीन में खुलेपन की आर्थिक नीति ने सोवियत संघ से उसके रिश्ते बिगाड़ दिए। इसी आर्थिक नीति ने चीन को आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित किया और अपने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला।

चीन में आर्थिक सुधारों की शुरुआत जिन देंग श्याओ पिंग ने की थी, उन्होंने ही तिआनमन चौक पर जुटे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी करने के आदेश दिए थे, और यही किसिंजर की अस्पष्ट विरासत के बारे में बताने के लिए काफी है। अमेरिका-चीन की निकटता ने शीतयुद्ध का परिणाम तय किया और इससे चीनियों का जीवन स्तर सुधरा। दूसरी तरफ, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वैश्विक भू-राजनीति में अमेरिका के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरी, जो न सिर्फ दुनिया में अधिनायकवादी राजनीति का प्रतीक बनी, बल्कि जिसने लाखों लोगों को यातना शिविरों में डाला और उस ताइवान पर हमले की धमकी दी, जिसकी अनिश्चित राजनीतिक स्थिति का हल किसिंजर के कारण ही नहीं निकल पाया।

सौ साल के किसिंजर ने आधी उम्र सरकार से बाहर आने के बाद गुजारी। दशकों तक राजनेताओं और दूसरे दिग्गजों के सम्मेलन में उनकी छवि अति विशिष्ट व्यक्ति की रही, तो शायद इसलिए कि वह कुछ लोगों के अति शक्तिशाली होने का औचित्य बौद्धिक तरीके से साबित कर सकते थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं, जो वैश्विक मामलों में उनकी मजबूत छवि की ही द्योतक थीं; आखिरकार इतिहास हमेशा किसिंजर जैसे ताकतवर लोगों ने ही लिखे हैं, महाशक्ति देश की बमबारी का शिकार हुए लोगों ने नहीं। अलबत्ता किसिंजर शायद यह जानते थे कि महाशक्ति देश की गलतियों को इतिहास माफ कर देता है। वियतनाम युद्ध के कुछ दशक बाद वे तमाम देश अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ते में बंध गए, जिन पर अमेरिका ने बमबारी की थी। बांग्लादेश और ईस्ट तिमोर स्वतंत्र देश हैं, जो अमेरिकी मदद लेते हैं। चिली का नेतृत्व एक समाजवादी के हाथों में है, जिसकी रक्षामंत्री अलेंदे की पोती हैं।

आज दुनिया में अधिनायकवाद और आक्रामक राष्ट्रवाद की लहर चल रही है। यूक्रेन पर रूस के हमले और गाजा में इस्राइली आक्रमण के बीच अमेरिकी रवैया दुखद है। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के एक धड़े ने सत्ता तक पहुंचने को ही लोकतंत्र समझ लिया है।

इन सबके लिए हेनरी किसिंजर जिम्मेदार नहीं हैं। पर किसिंजर की विरासत हमें सावधान भी करती है। हमें समझना चाहिए कि लाओस के बच्चे भी अमेरिकी बच्चों की तरह गरिमापूर्ण जीवन के हकदार हैं, और चिली को भी स्वत: फैसले लेने का उतना ही अधिकार है, जितना अमेरिका को है। यही सिद्धांत अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार होना चाहिए। इसे भूलकर हमने जोखिम ही आमंत्रित किया।

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