गरीबों पर बोझ न बने जीएसटी
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मीडिया के एक वर्ग की नासमझी से यह भ्रम फैला है कि तीन अगस्त को राज्यसभा ने जीएसटी विधेयक पास कर दिया। इस संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भारतीय संविधान में जो मौजूदा व्यवस्था है, उसके तहत केंद्र सरकार वस्तुओं और सेवाओं पर कोई केंद्रीय कर नहीं लगा सकती। इसलिए किसी केंद्रीकृत वस्तु व सेवा कर की व्यवस्था का कानून बनाने से पहले, देश के संविधान में संशोधन करना जरूरी है। राज्यसभा ने एक संविधान संशोधन का ही अनुमोदन किया है, जो केंद्र सरकार के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीसीएटी) से संबंधित कानून लाने का रास्ता खोलता है।
संविधान में संशोधन की यह कोशिश पहले लोकसभा से शुरू हुई थी और उसके द्वारा स्वीकृत संशोधन प्रस्ताव, अनुमोदन के लिए राज्यसभा में भेजा गया था। राज्यसभा ने अपने विवेक से यह महसूस किया कि लोकसभा द्वारा पारित संशोधन प्रस्ताव नाकाफी था और उसमें सुधार की जरूरत थी, ताकि संघीय ढांचे की रक्षा की जा सके तथा हमारे संविधान में राज्य सरकारों को जो अधिकार दिए गए हैं, उनकी हिफाजत की जा सके।
भारत में विकास का पूंजीवादी रास्ता अपनाए जाने के बाद से ही भारत के शासक वर्ग लगातार इसकी कोशिशों में लगे रहे हैं कि देश भर में एक एकीकृत बाजार हो तथा सरलीकृत कर व्यवस्था हो, ताकि वे अपने मुनाफे अधिकतम कर सकें। 1991 में हमारे देश में नवउदारवादी सुधारों के अपनाए जाने के बाद से एकीकृत बाजार और केंद्रीय स्तर से सरलीकृत कर व्यवस्था की मांग का शोर कई गुना बढ़ गया। इन्हीं कोशिशों के चलते, बिक्री कर के जरिये संसाधन जुटाने के राज्य सरकारों के अधिकार पर पहला अतिक्रमण हुआ, वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) लादे जाने के साथ। इसके फौरन बाद भारत के शासक वर्ग ने जोर-शोर से यह मुहिम छेड़ दी कि वैट की व्यवस्था को आगे बढ़ाकर, एक केंद्रीकृत वस्तु तथा सेवा कर तक ले आया जाए और इस प्रकार सेवाओं को एक केंद्रीकृत कर ढांचे के तहत लाया जाए। इस तरह जीएसटी के लिए प्रयास शुरू हो गए।
पिछले दो दशकों के दौरान राज्य सरकारों के साथ चर्चा के फलस्वरूप, इन मुद्दों पर विचार करने तथा उन पर ठोस कदम सुझाने के लिए, राज्य के वित्त मंत्रियों की अधिकारसंपन्न कमेटी का गठन किया गया था। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री इस कमेटी के अध्यक्ष हैं।
यह अधिकारसंपन्न कमेटी ही जीएसटी विधेयक की जांच-पड़ताल करेगी। इसके बाद इस विधेयक को कानून के रूप में मंजूरी के लिए संसद के सामने लाया जाएगा। लेकिन इसके लिए पहले मौजूदा सांविधानिक व्यवस्था में संशोधन किए जाने की जरूरत थी। संसद ने फिलहाल इसी को अंजाम दिया है। यह विधेयक राज्यसभा और लोकसभा से पारित हो चुका है। अब इसे देश की आधी या उससे अधिक राज्यों की विधानसभाओं से दो तिहाई बहुमत से पारित होना है। उसके बाद ही संविधान में संशोधन को अधिसूचित किया जाएगा। इसके बाद ही केंद्र सरकार संसद में विचार के लिए जीएसटी विधेयक ला सकती है।
जब जीएसटी विधेयक विचार के लिए संसद के सामने आएगा, तभी इस मुद्दे पर विभिन्न सदस्यों द्वारा रखी गई चिंताओं पर बहस होगी। संविधान संशोधन विधेयक पर बहस के दौरान मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपनी प्रमुख चिंताएं रखी थीं और संसद को आगाह किया था कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर उसका कड़ा विरोध रहेगा। इस क्रम में जताई गई पहली चिंता तो राज्यों के अतिरिक्त राजस्व जुटाने के अधिकार से जुड़ी है, ताकि राज्य सरकारें उन्हें चुनने वाली जनता के कल्याण की बेहतर व्यवस्था कर सकें। यह कैसे किया जाता है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।
दूसरी बात यह है कि जीएसटी व्यवस्था के लागू होने के लिए, संसद से तीन कानूनों का पारित होना जरूरी होगा। ये कानून होंगे- पहला, केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी), दूसरा, अंतर्राज्यीय जीएसटी (आईजीएसटी), और तीसरा, राज्य जीएसटी (सीटीएसटी)। इन पर संबंधित राज्य विधानसभाओं का अनुमोदन भी हासिल करना होगा।
तीसरे, जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है और सभी अप्रत्यक्ष कर, अपनी परिभाषा से ही आम जनता पर बोझ डालते हैं, जिसे कर के दायरे में आने वाली वस्तुओं की खरीद या उपभोग पर, यह कर चुकाना पड़ता है। एक ओर जहां प्रत्यक्ष कर का राजस्व मुख्यत: अमीरों से बटोरा जाता है, वहीं अप्रत्यक्ष कर का राजस्व आम जनता पर ही बोझ बढ़ाकर वसूल किया जाता है। भारत में पहले ही केंद्रीय राजस्व में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा लगातार घट रहा है, जबकि परोक्ष करों का हिस्सा उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है। इस समय केंद्रीय राजस्व का करीब दो-तिहाई हिस्सा, अप्रत्यक्ष करों से ही आता है।
अप्रत्यक्ष कर का हिस्सा बढ़ने और प्रत्यक्ष कर का हिस्सा कम होने का अर्थ है, अमीरों को और अमीर तथा गरीबों को और गरीब बनाना। अगर जीएसटी विधेयक में समुचित अंकुशों व बचावों की व्यवस्था नहीं जोड़ी जाएगी, तो मुमकिन है कि यह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) हमारे देश में पहले ही बढ़ रही आय की असमानताओं को और बढ़ाने का ही काम करे। अगर ऐसा होता है, तो यह दो अलग-अलग भारत पैदा करने की प्रक्रिया को और मजबूत ही कर रहा होगा-अमीरों के लिए किलकता इंडिया और जनता के विशाल बहुमत के लिए बिलखता भारत। आखिरी बात यह है कि उक्त विधेयकों के मामले में भाजपा सरकार की चालाकियां करने तथा राज्यसभा को दरकिनार करने की कोशिशें भी हो रही हैं। केंद्र सरकार जीएसटी विधेयकों को लोकसभा के स्पीकर से 'मनी बिल' घोषित करने का आग्रह कर सकती है, ताकि राज्यसभा को दरकिनार कर दिया जाए, जहां उसका बहुमत नहीं है। इसलिए जनता को अपनी रोजी-रोटी पर और ज्यादा बोझ डालने वाले इस तरह के नवउदारवादी सुधारों का संसद में भी और संसद के बाहर भी, प्रतिरोध करने के लिए तैयार रहना चाहिए।