मुद्दा: मिटता जा रहा है ग्राम सभाओं का वजूद... गांव-समाज का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त; अब अस्तित्व महज प्रतीकात्मक
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विस्तार
लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक और सबसे बुनियादी इकाई कही जाने वाली ग्राम सभाओं का अस्तित्व धीरे-धीरे क्षरित होता जा रहा है। पंचायती राज व्यवस्था के इस प्राथमिक निकाय के लिए पांच वर्ष में एक बार चुनाव होते हैं, जिसमें ग्राम प्रधान और उसके सदस्य चुने जाते हैं। लेकिन ग्राम सभाओं का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। किसी परियोजना अथवा गांव के विकास के लिए ग्राम सभा के सदस्यों की कोई बैठक नहीं बुलाई जाती। ग्राम पंचायत सचिवालयों/भवनों का निर्माण तो करा दिया गया है, लेकिन उनके दरवाजे खुलते नहीं, न ही वहां ग्राम विकास अथवा ग्रामवासियों की किसी समस्या पर विमर्श संभव है। कई ग्राम सभाओं में निर्मित ऐसी इमारतों का ग्राम प्रधान की मनमर्जी से दुरुपयोग हो रहा है। वे ताश और जुआ खेलने के अड्डों अथवा निठल्लों की बैठक के केंद्रों में तब्दील हो चुके हैं।
ग्राम सभाओं का कार्य गांव के विकास और उसके वाशिंदों के कल्याण के साथ उनकी सुविधाओं को बढ़ाना और समस्याओं को हल करना है। उनका यह भी दायित्व है कि वे गांव के लोगों के आपसी विवादों का निपटारा सुलह-समझौते के आधार पर करें, जिससे ऐसे मामले पुलिस और अदालतों तक न पहुंचे और गांव का वातावरण सुखद बना रहे। लेकिन गांवों में आपसी विवाद इस कदर बढ़ गए हैं, जिनका समाधान न तो तहसील के राजस्व अनुभाग से संभव है और न ही कोई पुलिस या न्यायालय उनका निपटारा कराने में सक्षम हैं। ग्राम सभाएं नितांत निष्क्रिय और अकर्मण्य हो चुकी हैं।
ग्राम सभाओं पर उन सरकारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी निगरानी की भी जिम्मेदारी है, जिन्हें ग्रामवासियों की उन्नति के लिए बनाया गया है। ग्राम सभा का प्राथमिक प्रबंध ग्राम प्रधान और सरकारी सेवक कहे जाने वाले सचिव के नियंत्रण में होता है। यही कारण है कि ग्राम सभाओं की उन्नति और विकास के लिए आवंटित होने वाली सरकारी धनराशि को खर्च करने में ये दोनों संलग्न रहते हैं। अनेक बार कागजी खानापूरी कर और फर्जी कार्यों का निष्पादन दिखाकर भुगतान होते रहते हैं, जिनकी कानो-कान किसी को खबर नहीं होती।
ग्राम सभा में बड़ी लागत से बना सामुदायिक शौचालय का संचालन ऐसे सुविधासंपन्न व्यक्ति को सौंप दिया जाता है, जिसे बिना कुछ किए-धरे छह हजार रुपये मासिक मानदेय की प्राप्ति होती है। ये शौचालय कभी-कभार या कम समय के लिए खुलते हैं। अधिकांश शौचालय टूटे पड़े हैं, उनमें पानी और सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। इनके संचालन और मरम्मत के लिए प्रति माह प्राप्त होने वाली तीन हजार रुपये की धनराशि प्रायः ग्राम प्रधान, ग्राम सचिव और संचालक मिल-जुलकर डकार जाते हैं। यदि इन सामुदायिक शौचालयों की संचालिका कोई महिला हुई, तो उसका पति या परिवार का कोई पुरुष सदस्य ही फर्जी हस्ताक्षरों से बैंक के खातों का भी संचालन करता है, जो पूर्णतया बैंक अधिकारियों के संज्ञान में भी रहता है। गांव के अधिकतर चकरोड और सड़कें टूटी पड़ी रहती हैं, पर ग्राम प्रधान इन सबसे विमुख होकर अपनी संपत्ति के विस्तार में संलग्न रहते हैं। किसी भी प्रधान और पूर्व प्रधानों की धन-संपदा और उनके द्वारा खड़े आलीशान घरों तथा उनके द्वारा खरीदी गई कृषि भूमि अथवा कस्बों-शहरों में प्लाटों और बनाए गए मकानों की जांच कर ली जाए, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। सभी ग्राम प्रधान क्षेत्रीय विधायक से सांठ-गांठ रखते हैं।
ग्राम सभाएं दलीय राजनीति में फंस चुकी हैं और सत्ताधारी दल से जुड़कर ये अपना हित साधती हैं। डेढ़-दो दशक पहले ग्राम सभाओं की स्वतंत्र सत्ता होती थी। अब तो विधायक और सांसद भी इन ग्राम सभाओं से अपना हित साधने में लगे रहते हैं। उनका ध्यान गांव के विकास और उनकी समस्याओं को सुलझाना नहीं है। पांच किलो मुफ्त राशन के चलते अधिकांश आबादी ने श्रम से मुंह मोड़ लिया है। अब गांव में कृषि कार्य के लिए मजदूर नहीं मिलते। लंबे समय से चल रही मनरेगा योजना में ग्राम प्रधान की मर्जी के मुताबिक बार-बार चकरोडों पर मिट्टी डालने जैसे गैरजरूरी कार्य रोजगार सेवक से मिलकर संपादित किए जा रहे हैं। सच यह है कि इसमें कम समय के लिए उपस्थित अथवा पूरे समय के लिए फर्जी हाजिरी भरने वाले कामगारों का भुगतान भी हो रहा है। परंपरागत और पूरे समय जलमग्न रहने वाले तालाब खत्म किए जा रहे हैं, जबकि नए तालाब खोद कर ऐसी योजनाओं का पैसा हड़पा जा रहा है।
अब गांव का कोई ‘मुखिया’ नहीं रहा, जिसका ध्यान गांव के कल्याणार्थ हो, और जिसकी बात का वजन हो। ऐसे में गांव-समाज का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। एक समय गांव एक सशक्त इकाई थे। उनका अपना प्रबंधन और पंचायती न्याय व्यवस्था भी थी, जो पूरे समाज और उसके हितों को जोड़-संभाल कर रखती थी। अब ‘ग्राम सभाएं’ सिर्फ नाम भर की हैं।