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पर्यावरण: स्थायी समाधान की दरकार, जरूरी है प्रदूषण की जड़ पर वार
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विस्तार
दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण के खिलाफ जो अभियान शुरू किया है, उसको किसी न किसी रूप में महत्व मिलना ही चाहिए। एक माह तक चलने वाला यह एंटी डस्ट अभियान विभिन्न तरह के आयोजनों के माध्यम से दिल्ली के प्रदूषण पर नियंत्रण करने की एक कोशिश है। इस पहल में सरकार ने करीब 591 टीमों को लगाया है। नई खोजों और वैज्ञानिक तौर-तरीकों से प्रदूषण के खिलाफ मोर्चा खोलने की कोशिश की जा रही है। करीब 82 मैकेनिकल रोड स्वीपर होंगे, 530 वाटर स्प्रिंकलर होंगे, 258 एंटी स्मॉक गन होंगी और ऐसे ही कुछ अन्य प्रयोग किए जाएंगे, जिनकी मदद से दिल्ली के प्रदूषण पर काबू पाने का प्रयास किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि यह वर्ष का वह समय है, जब हमेशा दिल्ली पर प्रदूषण के बादल छाने लगते हैं। दिल्ली के भीतर प्रदूषण के खिलाफ शुरू हो रहे युद्ध में दिक्कत यह है कि इसके चारों ओर की परिस्थितियों पर दिल्ली का कोई नियंत्रण नहीं है। मिसाल के लिए, यदि पराली किन्हीं कारणों से दिल्ली, उत्तर प्रदेश या पंजाब में जलाई जाती है, तो उसका धुआं दिल्ली की आबोहवा में घुलेगा ही। फिर, बीच में दशहरा और दिवाली भी पड़ेगी। पिछले वर्ष भी तमाम कोशिशों और सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद लोगों ने दशहरे व दिवाली में धुआं तो उड़ाया ही था, जिससे दिल्ली की हवा और उसके चारों ओर के हालात गंभीर हो गए थे।
ऐसे में, दिल्ली सरकार का ये प्रयोग अगर कुछ दम दिखा सके, तो इससे दिल्लीवासियों को कुछ राहत तो जरूर मिलेगी। इसके अलावा, यह वही समय है, जब ठंड बढ़ेगी तथा कोहरा भी आएगा और अगर कोहरे में जरा भी धुआं शामिल हुआ, तो इससे वायु प्रदूषण बढ़ेगा। कोहरा और धुएं में दरअसल फर्क होता है। प्राकृतिक ढंग से पैदा कोहरा सब जगह व्याप्त होता है। लेकिन मानवजनित धुआं कहीं पर ज्यादा, तो कहीं कम भी हो सकता है। जब कोहरा और धुआं मिलता है, तो फॉग बनता है, जो वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।
हमें अब वायु प्रदूषण के प्रति इसलिए भी गंभीर होना पड़ेगा कि दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण के कारण रोगियों की संख्या में बड़ा इजाफा हो गया है। दुनिया भर में 32.3 लाख मौत अकेले सीओपीडी यानी क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज से हुई, जो फेफड़ों से जुड़ी एक बीमारी है। यूरोपियन रेस्पिरेट्री पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, वायु संकट जलवायु परिवर्तन के कारण भी बढ़ेगा और अगर ऐसा हुआ, तो इससे सीधे हमारे फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। शोध के अनुसार, इसका बड़ा जोखिम पहले ही किसी न किसी रूप में श्वसन तंत्र की बीमारियों से गुजर रहे लोगों, बच्चों और वृद्धों को है।
दिल्ली और उसके चारों तरफ पहले ही लंबे समय से जिस तरह से वायु प्रदूषण रहा है, अस्थमा के मरीजों की संख्या काफी बढ़ी है। 2019 में अकेले 4.55 लाख मौतें अस्थमा के कारण हुईं। दिल्ली में प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में सड़कों पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या और विकास कार्य भी हैं। इसके अलावा, वनाग्नि, लू और सूखे की वजह से भी वायु प्रदूषण बढ़ता है।
विश्व मौसम संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड और ओजोन परत का दुश्मन मानी जाने वाली मिथेन गैस भी लगातार बढ़ रही है। इसका कारण यह भी है कि हमने अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके नियंत्रण के लिए बहुत प्रतिबद्ध निर्णय नहीं लिए हैं। दिल्ली या दूसरे बड़े शहरों में हमारी जीवनशैली में गैजेट्स व अन्य आधुनिक उपकरण इतने बढ़ गए हैं कि यदि हम इनकी निर्भरता पर अंकुश नहीं लगाएंगे, तो वायु प्रदूषण का स्थायी हल भी नहीं खोज पाएंगे।
फिर भी दिल्ली सरकार के इस प्रयोग को हम नकार नहीं सकते। स्वच्छ वायु की जरूरत दिल्ली को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को है। लेकिन स्थायी हल तभी निकलेंगे, जब हम अपनी जीवनशैली को बेहतर बनाएंगे। लेकिन यह तभी संभव होगा जब इसमें राष्ट्रीय संकल्प जुड़ जाएं कि कितना मोटर-गाड़ी का इस्तेमाल होना चाहिए, हम ढांचागत विकास में कहां तक जाएं या प्रकृति पर अतिक्रमण की सीमा क्या होगी? जब तक हम इन विषयों की गंभीरता नहीं समझेंगे, तब तक प्रदूषण की समस्या के स्थायी समाधान से दूर ही रहेंगे।