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फलस्तीन पर सरकार की बेरुखी

Tue, 22 Jul 2014 06:54 PM IST
मणि शंकर अय्यर
मणि शंकर अय्यर Updated Tue, 22 Jul 2014 06:54 PM IST
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Government ignorance about Palestine crisis

फलस्तीन में इस्राइली हमले के विरोध में विपक्ष चाहता था कि राज्यसभा में इसकी निंदा की जाए और एक प्रस्ताव लाया जाए। मगर सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई, जिससे तकरीबन पूरे विपक्ष को नाराजगी जताते हुए सदन से बाहर जाने को मजबूर होना पड़ा। वास्तव में सदन नियमों की तकनीकी जटिलताओं को दरकिनार कर इसके लिए तैयार भी दिख रहा था, मगर अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और उनके साथी नेताओं ने सदन को किसी रचनात्मक नतीजे पर पहुंचने से रोक दिया। इस अफसोसनाक वाकये पर टी एस इलियट की पंक्तियां दिमाग में बरबस ही कौंध गईं, दुनिया का अंत ऐसे ही होता है, धमाके के साथ नहीं, धीमी आवाज के साथ।

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दरअसल इसके संकेत तभी मिल गए थे, जब पिछले हफ्ते लगातार तीन दिनों तक फलस्तीन पर बहस को लेकर भाजपा का टालमटोल वाला रवैया रहा था। और इसके बाद जब बहस शुरू हुई, तो सुषमा स्वराज ने यह कहकर कि सरकार को जो भी कहना था ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान कहा जा चुका है, सरकार की मंशा को लेकर सारी आशंकाओं को सही ठहरा दिया। सवाल यह भी है कि जब सभापति इस मुद्दे पर बहस को तैयार थे और इसे सूचीबद्ध भी किया गया था, तो भाजपा ने बहस क्यों नहीं होने दी?
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दरअसल सदन में इस कहानी की शुरुआत अनिल माधव दवे ने की, जिन्हें भाजपा की ओर से सदन को सबसे पहले सरकार का पक्ष समझाने का दायित्व सौंपा गया। सरकार की नीति बयां करते हुए उन्होंने 'नमाज' और 'जन्नत' जैसे शब्दों का गैरजरूरी इस्तेमाल किया, साथ ही यह भी बताया कि गाजा पट्टी पर इस्राइल के हमले की प्रमुख वजह इस्लामी आतंकवाद है। हालांकि सुषमा स्वराज कहती आई हैं कि भाजपा का किसी धर्म विशेष से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी भावनाओं से भरे दवे के भाषण को जिस तरह उनके साथियों की तालियों का साथ मिला, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि भाजपा के लिए फलस्तीन कोई राष्ट्रीय या मानवाधिकार का मुद्दा नहीं, महज मुसलमानों से जुड़ा मुद्दा है।
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फिर संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू का सदन के बाहर पत्रकारों से यह कहना कि विपक्ष इस मुद्दे पर ऐसा बर्ताव कर रहा है, मानो यह भारत के अल्पसंख्यकों से जुड़ा कोई मुद्दा हो, उनकी संघवादी सोच को ही दर्शाता है। नायडू इतने पर नहीं रुके, उन्होंने आगे कहा, 'भारत को आखिर अंतरराष्ट्रीय पचड़ों में पड़ने की क्या जरूरत है, जबकि वहां तो उसके हित भी नहीं जुड़े हैं।'

सच तो यह है कि पश्चिम एशिया में भारतीय हितों को लेकर इतना बेतुका बयान मैंने आज तक नहीं सुना। तकरीबन आठ लाख भारतीय कामगारों की जान पश्चिम एशिया में अटकी है। नर्सों की वापसी इस वजह से मुमकिन हुई कि पिछले सात दशकों से भारत सभी अरब देशों और ईरान के साथ बेहतर रिश्ते बनाए हुए है। मगर अब भी सैकड़ों भारतीय वहां फंसे हुए हैं। मोदी सरकार भारत की उस छवि को दागदार बना रही है, जो हमारी ताकत है, और जिसकी बदौलत हम संकट में फंसे भारतीयों की वतन वापसी की राह आसान बना सकते हैं। भारत को विदेशी विनिमय से होने वाली आय का तकरीबन आधा हिस्सा दूर देशों में नौकरी कर रहे इन्हीं भारतीयों से मिलता है। इतना ही नहीं, अपने तेल आयात का 70 फीसदी हिस्सा हमें यहीं से मिलता है। इतना होने पर भी अगर केंद्रीय मंत्री कहें कि फलस्तीन से हमारे राष्ट्रीय हित नहीं जुड़े हैं, तो यह विडंबना ही कही जाएगी।

इन बेतुके बयानों की बात न भी करें, तो सुषमा स्वराज का यह कहना कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से भारत की विदेश नीति में एक तिल का भी फर्क नहीं आया है, कहां तक सही है। सच तो यह है कि इससे पहले जब भी इस्राइल ने फलस्तीन पर कोई जुल्म किया है, भारत ने हमेशा उसकी कठोर निंदा की है। यह पहली बार है कि फलस्तीन में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत 500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, और हजारों गंभीर तौर पर घायल हैं, फिर भी कड़े शब्दों में इस्राइल की निंदा करने में केंद्र सरकार को कठिनाई हो रही है। इससे भी बुरा विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का वह बयान है, जिसमें वह हमास द्वारा इस्राइल पर की जा रही बमबारी और जमीनी हमले को लेकर इस्राइल के साथ सहानुभूति जताते दिखे। जबकि फलस्तीन का कहना है, 'हम इस्राइल की बराबरी करने की सोच भी कैसे सकते हैं! उसके पास आधुनिक हथियारों का जखीरा है, और परमाणु ताकत भी, जबकि फलस्तीन ऐसा देश है, जिसे सेना तक रखने की इजाजत नहीं है।'


क्या नरेंद्र मोदी के पास इस्राइल के अत्याचार पर बोलने को कुछ भी नहीं है। इस संदर्भ में उन्होंने ब्रिक्स सम्मेलन में महज तीन बातें कहीं। पहली, 'इस्राइल और फलस्तीन के बीच चल रही हालिया हिंसा से भारत भी चिंतित है।' यह देखा जा सकता है कि किस तरह उन्होंने पीड़ित और हमलावर दोनों को एक साथ रख दिया। मोदी के इस बयान में 'निंदा' जैसा शब्द नहीं दिखता, और न ही उन्होंने संघर्ष विराम की बात उठाई। दूसरा, 'हम वार्ता के जरिये समाधान के पक्ष में हैं।' अब इस दूसरे बयान में नया क्या है? सभी वार्ता के जरिये हल चाहते हैं। मगर वार्ता की शुरुआत कैसे हो सकती है, जबकि एक पक्ष दूसरे पर लगातार अन्याय कर रहा हो। सच तो यह है कि जब हमास और अल-फतह ने हाथ मिलाए, तो यह फलस्तीन नहीं, इस्राइल था, जिसने एकाएक वार्ताओं के सारे रास्ते बंद कर दिए। फिर मोदी का तीसरा बयान, 'वार्ता की शुरुआत उम्मीद और भरोसे के माहौल को जन्म देगी।' बात फिर वहीं अटक गई। आखिर जब तक इस्राइल अपने पड़ोसी पर जुल्म नहीं रोकेगा, तब तक भरोसे की बात करना बेमानी है। सच तो यह है कि मोदी के भ्रम और सुषमा स्वराज के ढोंग ने हमारी विदेश नीति को संकट में डाल दिया है।

(लेखक कांग्रेस नेता और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य हैं)

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