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अपने जाल में उलझती सरकार

Wed, 29 Oct 2014 06:26 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Wed, 29 Oct 2014 06:26 PM IST
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Government has fallen into self made ditch

विदेश में अवैध बैंक खाते रखने वाले भारतीयों के नाम के खुलासे के मुद्दे पर भाजपा सरकार उसी जाल में उलझ गई है, जो बड़ी मशक्कत से उसने कांग्रेस के लिए बिछाया था। दरअसल, सत्ता में आने के सौ दिन के भीतर काले धन की देश वापसी और दोषियों के नाम उजागर करने का चुनावी वायदा भाजपा ने बड़े जोर-शोर से किया था, मगर अब आलम यह है कि अपना चेहरा छिपाने के लिए सरकार को आड़ नहीं मिल रही है।

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अटॉर्नी जनरल की दलील कि अवैध विदेशी बैंक खाते रखने वाले तकरीबन 700 लोगों की पूरी सूची को तब तक प्रकट नहीं किया जा सकता, जब तक जांच पूरी न हो जाए, को खारिज कर सर्वोच्च अदालत ने सरकार को और शर्मिंदा किया है। सर्वोच्च न्यायालय के कड़े हस्तक्षेप के बाद आखिरकार सरकार को इन नामों की पूरी सूची एक सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपनी पड़ी।
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गौरतलब है कि यह सूची सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) को भी उपलब्ध कराई जाएगी, जिसका गठन हाल ही में भारत और विदेश में काले धन से जुड़े सभी मामलों की तहकीकात करने के लिए किया गया है।
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दिलचस्प है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश सरकार के लिए भले ही लज्जित करने वाला है, मगर सुब्रमण्यम स्वामी जैसे वरिष्ठ भाजपाई नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर इसका स्वागत किया है। इतना ही नहीं, काले धन के मुद्दे पर अभियान चलाने वाले राम जेठमलानी तक को यह कहना पड़ा कि न्याय के लिए अब केवल सर्वोच्च न्यायालय का ही आसरा है।

अभी पिछले हफ्ते वित्त मंत्री अरुण जेटली एक टेलीविजन चैनल को यह बताते देखे गए कि कुछ नामों का खुलासा किया जाएगा, जो कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी का सबब बनेंगे। मगर गोवा की जिस खनन कंपनी का नाम सामने आ रहा है, 2004 से अब तक वह भाजपा को नौ बार धन मुहैया करा चुकी है। जितना पैसा इस कंपनी ने कांग्रेस को दिया है, उसका दोगुना वह भाजपा को उपलब्ध करा चुकी है।

दरअसल काले धन के पूरे मसले के साथ यही कठिनाई है। गोवा की खनन कंपनी ने भाजपा को महज एक करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा धन उपलब्ध कराया है। मगर इस खेल में कहीं ज्यादा बड़ी मछलियां शामिल हैं, जो हर वर्ष अरबों डॉलर का कालाधन पैदा करती हैं, और नियमित तौर पर बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को चुनाव फंडिंग के नाम पर नकद मुहैया कराती हैं।

बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा सरकार चुनावों में नकद फंड उपलब्ध कराने वाली इन बड़ी कंपनियों को जांच के दायरे में लाएगी? शायद 'नहीं'। यही वजह है कि केंद्र में आने वाली हर सरकार कालेधन की पहेली को उलझाए रखना चाहती है। इसके अलावा इन दिनों कुछ नेताओं को उनके चमचों द्वारा 'निजी तौर पर स्वच्छ छवि' वाले राजनेता की उपमा देने का नया चलन शुरू हुआ है, भले ही उनके नाम पर ऐसे तमाम संगठन क्यों न चल रहे हों, जिन्हें हजारों करोड़ों का फंड मिल रहा हो।

वैसे अगर कानूनी और तकनीकी नजरिये से देखें तो वित्त मंत्री का यह कहना बिल्कुल जायज है कि अंतरराष्ट्रीय संधियां भारत को फिलहाल इजाजत नहीं देतीं कि वह अमेरिका, यूरोप और एशिया भर में फैले तकरीबन दो दर्जन विदेशी बैंकों से अवैध खाता रखने वाले भारतीयों की सूची हासिल कर सके। इन संधियों के मुताबिक किसी खातेदार के नाम को उजागर करने पर विचार उसी सूरत में होगा, जब कि भारतीय जांच एजेंसियों के पास किसी कर या दूसरे आपराधिक कानून के उल्लंघन का स्पष्ट सबूत हो।

सरकार ने फिलहाल जिन नामों से पर्दा उठाया है, वे स्विट्जरलैंड में एचएसबीसी बैंक में खातेदारों की एक सूची से लिए गए हैं, जिसे 2006 में किसी कर्मचारी ने चुरा लिया था। साफ है कि इस सूची को पाने के लिए भारत को कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी।

एचएसबीसी की इस सूची में 600 से ज्यादा नाम हैं, जिनमें से ज्यादातर के उपनामों से साफ जाहिर होता है कि उनका ताल्लुक भारत के उस समृद्ध राज्य से है, जिसके सुशासन के मॉडल के कसीदे पढ़े जाते हैं! इनमें से ज्यादातर के खाते जीरो बैलेंस दर्शाते हैं। इसकी वजह है कि एचएसबीसी के कर्मचारी ने इस सूची को 2006 में एक खास दिन चुराया। इस दिन के पहले, या उसके बाद खाते की क्या स्थिति थी, किसी को नहीं मालूम। साफ है कि सूची से मिली जानकारी अपूर्ण है, और ऐसी सूची के आधार पर भारत का आयकर विभाग मामले दर्ज कर रहा है। ऐसा लगता है कि चूंकि सरकार पर कुछ नाम उजागर करने का दबाव था, और ऐसे में, एचएसबीसी की सूची ही उसके लिए सहारा बनी। वरना दूसरे देशों के साथ भारत की वर्तमान संधि के मुताबिक भारत ऐसी जानकारी पा ही नहीं सकता था। यह तभी संभव था, जब अलग से कोई संधि की जाए।

ध्यान रहे, यूपीए सरकार का यही पक्ष था, और ताज्जुब है, एनडीए सरकार का भी यही नजरिया है। दरअसल, भाजपा सरकार उस चुनावी वायदे का मखौल बनाती दिख रही है, जो चुनाव के समय गाजे-बाजे के साथ उसने किया था। अब वित्त मंत्री महोदय को क्या कहें, काले धन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के सामने उनकी आधिकारिक स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी यूपीए सरकार की थी। और यही वजह है कि संघ परिवार के सदस्य उन पर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, जिनकी नजर में विदेशों में जमा काले धन को येन-केन-प्रकारेण वापस लाना ही सबसे बड़ा पुण्य है।

इसी दौरान वित्त मंत्रालय का थिंक टैंक एक हजार पन्नों की दूसरी रिपोर्ट सामने लाया है, जिसके मुताबिक 1980 से 2007 के बीच भारत में हर वर्ष जो काला धन पैदा हुआ, वह सकल घरेलू उत्पाद का 45 से 70 फीसदी के बीच था। मतलब यह कि भारत में यह दर हर वर्ष दस खरब डॉलर या यों समझें, हर दिन तीन अरब डॉलर की रही है। आने वाले समय में जेटली की सबसे बड़ी चिंता यही है।


भारत के लिए सबसे अच्छा होगा कि वह ऐसी नीतियां बनाए कि काले धन के घरेलू उत्पादन पर रोक लग सके। साथ ही साथ, इस मामले में विदेशी सरकारों के साथ भी उसे समझौते करने की कोशिश करनी होगी, ताकि कर चोरी पकड़ी जा सके। इसकी एक नियत प्रक्रिया बनानी होगी। चुराई हुई एक अधूरी रिपोर्ट के आधार पर महज मंच सजाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।

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