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अलविदा सर रिचर्ड एटनबरो
कुमार प्रशांत
Updated Wed, 27 Aug 2014 08:00 PM IST
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कुछ वक्त और ठहर कर, क्रिसमस में गए होते रिचर्ड एटनबरो, तो मैं मान लेता कि 2004 की सुनामी में, थाईलैंड में हुई अपनी बेटी जेन और उसकी बेटी लूसी की मौत की पूछताछ करने गए। इतिहास से पूछताछ करने की उनकी आदत तो थी ही। लेकिन नहीं, इस बार वह इतिहास से पूछताछ करने नहीं गए, बल्कि खुद ही इतिहास बन गए। किसी ने याद दिलाया कि यदि पांच दिन और रुक जाते सर एटनबरो, तो उम्र के 91 साल पूरे हो जाते। सोचता हूं, उससे क्या फर्क पड़ जाता?
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टाइम्स ऑफ इंडिया के धर्मयुग और धर्मयुग के धर्मवीर भारती ने हिंदी पत्रकारिता को क्या-क्या दिया, इसका कभी गंभीर आकलन किया जाना चाहिए। ध.वी.भा. या भारतीजी के बारे में बातें बहुत कही-सुनी जाती हैं, लेकिन पत्रकारिता का इतिहास यदि कुछ लिखेगा उनके बारे में, तो यही लिखेगा कि उन्होंने हिंदी भाषा और पत्रकारिता को वह संस्कार व संवार दिया, जिसकी तब कम लोग ही कल्पना कर पाते थे। उस रोज भी कुछ वैसा ही हुआ। उन्होंने एक पत्र मेरे सामने खिसका दिया और बोले, आपका ही यह काम है और आपकी तरह का ही होना चाहिए। मैंने वह पत्र देखना शुरू किया और उनका बोलना चलता रहा, कल का एप्वाइंटमेंट भी हो गया है। समय से पहुंच जाइएगा। मैंने पत्र से नजर उठाकर उनकी तरफ देखा, तो बोले, हमें गांधी की कहानी नहीं चाहिए। हमें यह एटनबरो महाशय गांधी पर जो फिल्म बना रहे हैं, उसकी कहानी चाहिए। आप यह सब तो देख ही लेना कि गांधी की कितनी समझ और भारत के उस वक्त की कैसी व कितनी पहचान है इन महाशय के पास। लेकिन फिर भी फिल्म पर लिखना है, यह मत भूलना।
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और अगली सुबह मैं फिल्म के निर्माता-निर्देशक सर रिचर्ड सैमुअल एटनबरो के सामने था। जैसा कि मुझसे कहा गया था, मैंने मुलाकात का दिन व वक्त तय करने वाला पत्र उन्हें दिया और दिए धर्मयुग के कुछ अंक। पत्र सरसरी निगाह से देखा उन्होंने और फिर धर्मयुग के अंक देखने लगे। जब तक वह यह सब देख रहे थे, मैं उन्हें और उनके कमरे को देखता रहा। उनका गोलाकार अंग्रेज चेहरा अपनी लालिमा में दमक रहा था, और वह इतना पारदर्शी था कि उस पर आते-जाते भाव पढ़ना कठिन नहीं था। मैं उनको ज्यादा कुछ जानता नहीं था सिवा इसके कि मैंने अगाथा क्रिस्टी की जासूसी कथा पर बनी द माउस ट्रैप देखी थी, जिसमें एटनबरो मुख्य जासूस थे। बाकी उनकी कोई फिल्म मैंने देखी नहीं थी। उनका अस्त-व्यस्त कमरा एकदम गांधीमय था। कितनी तो किताबें, फोटो आदि पड़े थे...लिखे-छपे कागजों का बेतरतीब अंबार लगा था। सब देखकर यह तो पता चल ही रहा था कि यह आदमी जो भी कर रहा है, पूरी संलग्नता से कर रहा है और इसे एक फिल्म बनाने वाला कहकर टाला नहीं जा सकता है।
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'तो आपकी यह पत्रिका फिल्मों की पत्रिका नहीं है...' उनकी आवाज से मेरा ध्यान फिर उनकी तरफ लौटा। मैंने धर्मयुग का परिचय दिया और यह भी बताया कि यह हिंदी भाषा की सबसे प्रतिष्ठित और सबसे लोकप्रिय पत्रिका है। वह बोले, लोकप्रिय भी और प्रतिष्ठित भी। यह तो कुछ टेढ़ी-सी बात है, जैसा अक्सर नहीं होता है। अपने व्यंग्य पर वह होठों-होठों में ही हंसे। मैंने कहा, यही इसकी विशेषता है। वह बोल, आप इसमें काम करते हैं? मैंने कहा, नहीं, मैं इसके लिए लिखता हूं। काम तो मैं गांधी का करता हूं... और यह बात सीधी उनकी कलेजे को लगी। फिर कितनी ही बातें पूछीं, कहीं उन्होंने, गांधी का काम करने वालों से मेरा खास नाता है, क्योंकि मैं यह जो फिल्म बना रहा हूं, यह नहीं बनाता, अगर मुझे यह भरोसा नहीं होता कि यह जो मैं कर रहा हूं, यह गांधी का ही काम है। मैं बात टाल गया, क्योंकि मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि फिल्म बनाना भी गांधी का काम हो सकता है- भले गांधी पर ही बनाना। वह तब तक जयप्रकाश से मिल चुके थे। विनोबा को जानते थे। गांधी के जीवन का इतिहास, तारीखों और वर्षों के जिक्र के साथ वह जिस तरह बता रहे थे, उससे दो बातें साफ उभरती थीं -गांधी उनके लिए फिल्म के विषय नहीं थे, गहरे विश्वास के विषय थे। वह बोले भी, मैं गांधी पर फिल्म नहीं बना रहा हूं, बल्कि फिल्म में गांधी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं। और दूसरी बात यह कि वह खुद सिद्ध अभिनेता थे, तो जो सोचते थे, उसे करके भी देखते थे, मन की आंखों से।
एटनबरो ने 20 साल अपने इस सपने के पीछे होम कर दिए। कितनी बार भारत आए। जिसने जिससे कहा, उससे मिले। जवाहरलाल नेहरू से कई-कई मुलाकातें कीं। एटनबरो ने धैर्य नहीं खोया, क्योंकि उन्होंने अपना गांधी-मन बना लिया था। जिस स्तर का वह फिल्म बनाना चाहते थे, वह खासा पैसा चाहता था। उन्होंने लंदन का अपना घर गिरवी रख दिया; कलाकृतियों का अपना संग्रह बेच दिया। सब कुछ बेचकर उन्होंने वह सपना खड़ा कर ही दिया, जिसे सब गांधी कहते हैं। 'अब मेरे पास अपने गैस का बिल देने को भी पैसा नहीं बचा था...' यह कहते हुए एटनबरो की आंखों में थोड़ी भी तकलीफ नहीं थी। वह जैसे अपनी किसी फिल्म की कहानी सुना रहे थे।
जब एटनबरो की फिल्म पर्दे पर आई, तो गांधी का पुनर्जन्म हुआ। एटनबरो ने बेहद सफलता से गांधी की उस सामान्यता को पकड़ा, जो उन्हें असामान्य बनाती थी। जॉन ब्राइली की पटकथा इतनी शानदार थी कि उसे पकड़कर ही कोई चलता, तो एक शानदार फिल्म बना लेता। बेन किंग्सले जैसे एक अनाम-से अभिनेता को उन्होंने जिस तरह गांधी का जामा पहना दिया, उसे सिनेमा का चमत्कार ही कहा जा सकता है।
पिछले साल ही यह खबर आई थी कि उन्होंने अपना लंदन का बेशकीमती घर बेच दिया है और एक वृद्धाश्रम जैसी जगह में रहने आ गए हैं। क्यों भला? तो फिर पता चला कि वहां उनकी पत्नी सिम पहले से रहती हैं, जो मानसिक क्षीणता की बीमारी की शिकार हैं। जीवन में साथ और जीवन ढलने पर हाथ पकड़ने की यह कोशिश भी, सोचें तो गांधी से ही जाकर मिलती है। एक ऐसे आदमी का अवसान शोक की नहीं, सोचने की घड़ी देता है हमें कि किसी का पागलपन भी जमाने को राह दिखाता है, यदि वह गांधी जैसे आदमी से जुड़ा हो।