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वैश्विक सियासत: क्या राजनीति में वंशवाद खत्म हो रहा है? सीरिया-US-पाकिस्तान जैसे देशों की घटनाओं से उपजे सवाल

Tue, 24 Dec 2024 04:36 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Tue, 24 Dec 2024 04:36 AM IST
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सार
सीरिया में 50 साल बाद अल-असद के शासन का अंत हो गया है। श्रीलंका में पहली बार कोई खानदानी परिवार सत्ता में नहीं है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने अपने बेटे को दोषमुक्त कर दिया है, तो ट्रंप ने समधी को एंबेसडर नियुक्त किया है। ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई राजनीति से परिवारवाद समाप्त हो रहा है?
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Global Politics examples from Syria US Pakistan asking question whether dynasty politics coming to an end
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सीरिया में अल-असद परिवार के पचास वर्षों के शासन का अंत उस वक्त हो गया, जब राष्ट्रपति बशर अल-असद ने देश छोड़कर रूस में शरण ले ली। उनका निष्कासन एक तरह से बांग्लादेश की शेख हसीना की तरह रहा, जो अगस्त में ढाका छोड़कर दिल्ली आ गई थीं। आंखों के दक्ष सर्जन बशर अपनी प्रैक्टिस कर भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन हसीना सोशल मीडिया के जरिये अपने प्रतिद्वंद्वियों पर लगातार हमलावर हैं। हसीना की प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया जेल से बाहर हैं और राजनीति जिस तरह का रूप ले रही है, और उनके बेटे तारिक जिया के खिलाफ दर्ज मामलों को जल्द निपटाया जा रहा है, उससे उन्हें बढ़ावा मिलने के ही संकेत मिलते हैं। जाहिर है कि इससे तारिक की राजनीति में वापसी का रास्ता खुल गया है। इससे यह सवाल फिर से मौजूं हो गया है कि क्या राजवंशों या परिवारवादी शासकों के शासन का वाकई अंत हो रहा है?



अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जाने से पहले अपने बेटे हंटर को गंभीर अपराध में दोषमुक्त कर दिया है, जबकि निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने समधी को फ्रांस में एंबेसडर नियुक्त करने की घोषणा की है। इस वर्ष श्रीलंका में हुए चुनाव में उसकी स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब भंडारनायके, प्रेमदासा, जयवर्धने या राजपक्षे, जैसे प्रमुख राजनीतिक परिवारों में से कोई भी सत्ता में नहीं है। नेपाल में कोइराला परिवार लंबे समय से सत्ता में नहीं है। नेपाल में कई परिवार राजनीतिक रूप से बेशक जीवित हैं, लेकिन सत्ता मार्क्सवादियों और माओवादियों के हाथों में है।


पाकिस्तान में प्रतिद्वंद्वी शरीफ और भुट्टो-जरदारी परिवार, इमरान खान को सत्ता से बाहर रखने के लिए एक हो गए हैं, जो कहते हैं कि उनका मकसद अपने परिवार को सत्ता में बनाए रखना नहीं है। फिर भी, अर्ध-सामंती समाज में सत्ता चलाने वाले कई परिवार हैं। शक्ति के बंटवारे के तहत, आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति हैं, तो प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भतीजी मरियम (पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी) शक्तिशाली पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री बनी हुई हैं। राजनीतिक राजवंश कई लोकतंत्रों में राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण का एक प्रचलित रूप है। क्या राजशाही शासन देश के विकास में बाधक है? इस पर कई देशों में काफी अध्ययन और लेखन हुआ है। मसलन, पाकिस्तान की शिक्षाविद आयशा अली का 2016 में किया गया अध्ययन बताता है कि वर्ष 2010 में पाकिस्तान में आई भीषण बाढ़ के दौरान वंशवादी राजनेताओं वाले क्षेत्रों में विकास कार्यों पर 10.9 फीसदी व्यय कम हुआ।

भारत में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई परिवार सत्ता में आए और गए। जैसे-पंजाब में बादल, जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला, हरियाणा में लाल और चौटाला, उत्तर प्रदेश व बिहार में यादव, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, कर्नाटक में गौड़ा परिवार तथा महाराष्ट्र में पवार, चव्हाण और शिंदे आदि। नेहरू-गांधी खानदान ने अनेक वर्षों तक देश पर शासन किया। वंशवाद को जारी रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी लगातार उन पर निशाना साधती रहती है। हालांकि सत्तारूढ़ दल में भी कुछ नेता हैं, जो राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में परिवारवाद का अनुसरण कर रहे हैं। प्रियंका गांधी ने हाल ही में लोकसभा चुनाव जीतकर नेहरू-गांधी परिवार को और राजनीतिक मजबूती प्रदान की है। इसमें स्वर्गीय संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी और उनके पुत्र वरुण गांधी भी शामिल हैं। क्या परिवारों में सत्ता रहना लोकतंत्र के खिलाफ है? इसको लेकर अलग-अलग मत हैं।

कई पश्चिमी लोकतंत्र, जो दूसरों के अनुसरण के लिए लोकतांत्रिक शासन के अपने विचारों का प्रचार करते हैं, उनका नेतृत्व या तो वंशानुगत राजघरानों या प्रभुत्वशाली परिवार के पास होता है। अमेरिका में अब तक चार राजनीतिक परिवार-एडम्स, हैरिसन, रूजवेल्ट और बुश-में से प्रत्येक परिवार के दो सदस्य अमेरिका के राष्ट्रपति रहे। यदि इस बात के स्पष्टीकरण हैं कि कुछ परिवार राजनीतिक जीवन की ओर क्यों आकर्षित होते हैं, तो यह कम स्पष्ट है कि मतदाता पीढ़ी दर पीढ़ी अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्हीं परिवारों के सदस्यों को क्यों चुनते हैं? यह एक प्रकार का मतदान व्यवहार है, जिसके लिए टेलीविजन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अमेरिका के राजनीतिक राजवंश औपनिवेशिक काल से चले आ रहे हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार, दुनिया के 43 संप्रभु राज्यों में, जिनका प्रमुख राजा होता है, 41 पर लंबे समय से चले आ रहे राजवंशों द्वारा शासन किया जा रहा है। प्रमुख राजनीतिक परिवारों में अमेरिका में कैनेडी, उत्तर कोरिया के किम, लेबनान के अर्सलान परिवार, हयोतमस, जिन्हें जापान का ‘कैनेडी’ कहा जाता है, फिलीपीन के एक्विनोस और इंडोनेशिया के सोएकरनोस शामिल हैं। म्यांमार में आंग सान सू की को निर्वाचित होने के बावजूद सत्ता बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

वास्तविकता यह है कि राजनीतिक राजवंश लंबे समय से लोकतंत्रों में मौजूद हैं, जिससे यह चिंता बढ़ गई है कि राजनीतिक शक्ति के वितरण में असमानता लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में खामियों को प्रतिबिंबित कर सकती है। फिर भी, जैसे व्यवसायों व फिल्मों में कामयाब परिवार अपनी आने वाली पीढ़ियों को आगे करते हैं, क्या राजनीति उनसे अलग है? कई राजनेता अपने बच्चों की शादी अपने ही वर्ग में करते हैं, क्योंकि उनका एक ही सामाजिक दायरा होता है। राजनीति में यह भी दिखता है कि किसी नेता की असमय मृत्यु के बाद उसकी पत्नी से बचे हुए कार्यकाल को पूरा करने की उम्मीद की जाती है। सार्वजनिक जीवन में भाईचारे को प्रोत्साहन मिलना स्वाभाविक दिखता है।

लोकतांत्रिक संगठनों में भी अघोषित कानून यह है कि नेतृत्व एक बार निर्वाचित होने के बाद खुद को सत्ता में स्थापित कर लेगा और समान अवसर के लोकतांत्रिक सिद्धांत को कमजोर कर देगा। इस पर कोई भी कानून रोक नहीं लगाता है। इस पर टेलीविजन पर भी कोई बहस नहीं होती, क्योंकि वहां ‘तेरी भी चुप-मेरी भी चुप’ है। यह सार्वभौमिक है और शायद आश्चर्य की बात नहीं कि इतने सारे राजनेताओं के बच्चे राजनीति में जाते हैं। आखिर यही उनके पिता का व्यवसाय है। ठीक उसी तरह, जैसे कई डॉक्टरों के बच्चे चिकित्सा क्षेत्र में जाते हैं। संसद का मार्ग कोई अलग थोड़े है।

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