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अर्थ-तंत्र: सुरक्षित हैं भारतीय बैंक, नियामक व्यवस्था से बरकरार है विश्वास

Thu, 23 Mar 2023 06:16 AM IST
Ajay Bagga अजय बग्गा
Updated Thu, 23 Mar 2023 06:16 AM IST
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सार
वैश्विक वित्तीय संकट के बीच भारतीय बैंक नखलिस्तान बने हुए हैं, क्योंकि भारत में नियामक तंत्र मजबूत है। जमाकर्ताओं को स्थिति में किसी भी बदलाव के लिए सतर्क रहना चाहिए, लेकिन अभी भारतीय बैंकों या उनके जमा धारकों के लिए किसी डर का कोई कारण नहीं दिखता है।
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global banking crisis Indian banks are safe us banking crisis impact on india
money - फोटो : iStock

विस्तार

पिछले दो हफ्तों में अमेरिका और यूरोपीय बैंकों में काफी तनाव देखा गया है। पिछले एक पखवाड़े की खबरों और बाजार की भावनाओं के उतार-चढ़ाव ने बैंक जमाकर्ताओं और निवेशकों, दोनों के मन में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है।



सबसे पहले अमेरिका में सिल्वरगेट कैपिटल से परेशान करने वाले संकेत मिले। इसे बंद कर दिया गया। फिर कैलिफोर्निया स्थित सिलिकॉन वैली बैंक विफल हो गया और इसकी पूर्व मूल कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। नियामकों ने न्यूयॉर्क के सिग्नेचर बैंक को बंद कर दिया। क्रेडिट सुइस बैंक के शेयरों के सर्वकालिक निम्न स्तर पर पहुंचने के बाद स्विस नेशनल बैंक ने उसे जीवनदान दिया। अमेरिकी बैंकिंग दिग्गजों ने फर्स्ट रिपब्लिक बैंक में 30 अरब डॉलर डाले। यह एक अन्य क्षेत्रीय अमेरिकी बैंक है, जिसने 70 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की जमाराशि वापस निकाली है। पिछले सप्ताहांत में स्विस सरकार और बैंकिंग नियामकों ने यूबीएस के साथ क्रेडिट सुइस को विलय के लिए मजबूर कर दिया। और यह सब लगभग 10 दिनों के भीतर हुआ।


अमेरिकी बैंकों को कुल 620 अरब डॉलर अप्राप्त घाटा होने का अनुमान है। इसकी तुलना 2022 में उनके 263 अरब अमेरिकी डॉलर के वार्षिक मुनाफे से करें। स्पष्ट रूप से, यह अमेरिकी और यूरोपीय बैंकों के लिए तरलता और लाभप्रदता का मुद्दा है। बाजार में उथल-पुथल के बावजूद यह बैंकिंग संकट की शुरुआत नहीं है। यह 1980 के दशक के बाद से ब्याज दर के सबसे तेज चक्र और मंदी के बढ़ते जोखिम के प्रति बाजार को जगाने वाला है।

वाल स्ट्रीट ने पिछले साल ही 2023 में मंदी की भविष्यवाणी की थी। इस क्षण का लंबे समय से अनुमान लगाया जा रहा था, और यह वर्षों बाद सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है, जिसमें पूंजी को गलत स्थानों पर भेजा गया हो। लेकिन कुछ हद तक दर्द अवश्यंभावी था, और जिन लोगों ने कम दरों और कम मुद्रास्फीति का सबसे अधिक लाभ उठाया, उन्हें सबसे अधिक नुकसान होगा। क्षेत्रीय अमेरिकी बैंक इस सूची में सबसे ऊपर हैं। सुरक्षा की चिंता में जमाकर्ता उनमें से पैसा निकाल कर बड़े अमेरिकी बैंकों में जमा कर रहे हैं।

सवाल उठता है कि बाकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अमेरिका और यूरोपीय बैंकों की समस्याएं कितनी हानिकारक होंगी। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में भारतीय जमाकर्ता और निवेशक पूछ रहे हैं कि क्या भारतीय बैंक सुरक्षित हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है-हां। भारतीय बैंक सुरक्षित हैं। इसके पांच प्रमुख कारण हैं-पहला कारण है कि भारत में मजबूत नियामक तंत्र है, जिसके तहत पिछले खराब ऋण संकट के बाद आरबीआई ने भारतीय बैंकों की बारीकी से निगरानी के लिए रूढ़िवादी उपाय किए हैं। दूसरा कारण है कि भारतीय बैंकों की जमा में खुदरा जमा का बड़ा हिस्सा है।

ये भारत में जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम (डीसीआईजीसी) द्वारा प्रदान किए गए पांच लाख रुपये के जमा बीमा के तहत बीमाकृत हैं। इसलिए ये जमाकर्ता बैंक के विफल होने पर भी जमाराशि नहीं निकालेंगे, क्योंकि उन्हें पांच लाख रुपये के बीमा कवरेज से अपनी जमा राशि वापस मिलने का आश्वासन दिया गया है। इससे भारतीय बैंकों की बैलेंस शीट को काफी मजबूती मिलती है। तीसरा, भारतीय बैंकों में एसेट लायबिलिटी मैच्योरिटी (एएलएम) गैप बहुत कम है। इसका मतलब यह है कि भारतीय बैंक बारीकी से निगरानी करते हैं कि वे अपने ऋण और निवेश को कैसे वित्त पोषित कर रहे हैं और उनकी जमा राशि, उनके ऋण और उनके निवेश की परिपक्वता क्या है।

एक वर्ष से कम जमा बनाम एक वर्ष से कम धन का ऋण या निवेश में उपयोग की निगरानी यह सुनिश्चित करने के लिए की जाती है कि एएलएम से संबंधित कोई समस्या नहीं है, जिससे बैंकों को नुकसान हो सकता है। चौथा, भले ही पिछले साल से जारी रिजर्व बैंक की दरों में वृद्धि के कारण ब्याज दरों में 2.5 फीसदी की वृद्धि हुई है, पर भारतीय बैंकों की बॉन्ड होल्डिंग्स अपेक्षाकृत छोटी है, जो उनकी कुल संपत्ति के लगभग 18 फीसदी एसएलआर होल्डिंग्स तक सीमित है। इसका मतलब है कि, अमेरिकी बैंकों की बैलेंस शीट में भारी घाटे के विपरीत, भारतीय बैंकों को दरों में बढ़ोतरी के कारण बहुत कम नुकसान होता है। यह जमाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करता है कि कोई छिपा हुआ, अप्राप्त नुकसान नहीं है, जो इन बैंकों को विफल कर सकता है।

भारत की घरेलू बैंकिंग प्रणाली अपनी अंतर्निहित ताकत और रिजर्व बैंक के सख्त विनियमन के कारण अछूती रहती है। भारतीय बैंकों की ताकत का पांचवां कारण यह है कि खराब ऋण अनुपात, जिसे गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) कहा जाता है, ऋण के पांच फीसदी तक नीचे आ गया है। पिछले कुछ वर्षों से उच्च जोखिम या कम रेटिंग वाली संस्थाओं का जोखिम कम हो रहा है। खराब ऋणों के लिए प्रावधान बनाए गए हैं और इन्सोल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड प्रक्रिया के जरिये बैंकों का ऋण न चुकाने वाले उधारकर्ताओं के खिलाफ दिवालियापन प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जाता है। कुल मिलाकर, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र सुरक्षित है। हालांकि वित्त वर्ष 2024 में अर्थव्यवस्था की धीमी गति के कारण ऋण वृद्धि और मुनाफा मौजूदा स्तरों से थोड़ा कम होने की आशंका है, फिर भी भारतीय बैंक स्वस्थ बने रहेंगे। परिसंपत्ति गुणवत्ता संबंधी चिंताएं कम हुई हैं।

मॉर्गन स्टेनली ने हाल ही में लिखा कि, 'भारतीय बैंकों की बैलेंस शीट ऐतिहासिक रूप से पूंजी, परिसंपत्ति-गुणवत्ता और तरलता की दृष्टि से बहुत मजबूत हैं, कड़े नियमों से मदद मिली है-बड़े निजी बैंक अपने समकक्षों की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई देते हैं। पिछले एक दशक के विपरीत, हम भारतीय बैंकों की मजबूत कमाई की उम्मीद करते हैं।'

एस ऐंड पी ग्लोबल रेटिंग्स एजेंसी ने मंगलवार को कहा कि भारतीय ऋणदाता अमेरिकी बैंकिंग उथल-पुथल और संकटग्रस्त स्विस ऋणदाता क्रेडिट सुइस के यूबीएस के हाल के अधिग्रहण से उत्पन्न होने वाले किसी भी संभावित संक्रामक प्रभाव को सहन कर सकते हैं। एजेंसी ने कहा कि बढ़ती ब्याज दरों के कारण भारतीय बैंकों के पास अपने बड़े सरकारी प्रतिभूतियों के पोर्टफोलियो पर होने वाले नुकसान का सामना करने के लिए पर्याप्त बफर थे। वैश्विक वित्तीय संकट के बीच भारतीय बैंक नखलिस्तान बने हुए हैं। जमाकर्ताओं को स्थिति में किसी भी बदलाव के लिए सतर्क रहना चाहिए, लेकिन अभी भारतीय बैंकों या उनके जमा धारकों के लिए किसी डर का कोई कारण नहीं दिखता है।

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