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कर्ज पर टिका भविष्य
Sun, 23 Dec 2018 06:35 PM IST
Raman Singh
नारायण कृष्णमूर्त
नारायण कृष्णमूर्त
Published by: Raman Singh
Updated Sun, 23 Dec 2018 06:35 PM IST
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कर्ज
वित्त वर्ष 2017-18 में पहली बार बैंक कर्जों में व्यक्तिगत ऋण की हिस्सेदारी सबसे उच्चतम स्तर पर थी। रिजर्व बैंक के क्षेत्रवार बैंक कर्ज के आंकड़ों के मुताबिक, व्यक्तिगत ऋण, जिसमें घर, वाहन, शिक्षा से संबंधित ऋण शामिल हैं, बढ़ते हुए गैर-खाद्य ऋण का 96 फीसदी था। इसका मतलब है कि कॉरपोरेट जगत के कर्ज लेने में कमी आई है और आज उधार बाजार ज्यादातर नागरिकों द्वारा अपने उपभोग के लिए कर्ज लेने पर टिके हैं। संक्षेप में कहें, तो हम एक ऐसे युग में पहुंच गए हैं, जब हम उधार लेकर अपने सपनों को पूरा करते हैं, जैसा कि अमेरिकी लोग वर्षों से करते आ रहे हैं।
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कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा नए निवेश में सुस्ती ने औद्योगिक ऋण मांग को बुरी तरह प्रभावित किया है, मुख्य रूप से इसलिए कि बैंक क्रेडिट में हाल की प्रवृत्ति के कारण कॉरपोरेट ने ऋण लेना लगभग बंद कर दिया है और अब बैंकों में खुदरा ऋण ही है, जो बढ़ रहा है। इस पृष्ठभूमि में भारतीय कर्ज अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही है और बहुत कम या नगण्य वित्तीय जागरूकता वाली युवा आबादी के कारण व्यक्तिगत ऋण में बढ़ोतरी समझ में आती है। एक नए टीवी सेट के लिए मात्र दस रुपये का तुरंत भुगतान (डाउन पेमेंट) और अगले बारह महीनों तक कुछ हजार रुपये के भावी भुगतान का प्रस्ताव इतना आकर्षक है कि उसे नजरंदाज करना मुश्किल है।
सभी तरह के ऋणों में से अल्पकालीन व्यक्तिगत ऋण को ज्यादा तवज्जो मिल रही है। ये कर्ज छुट्टियां बिताने, गैजेट्स और कार खरीदने, घर की मरम्मत करने, वेतन का एक हिस्सा एडवांस में लेने और कई मामलों में तो मौजूदा ऋण चुकाने के खातिर लिए जाते हैं। बैंक बैलेंस और भविष्य में होने वाली कमाई के आधार पर भारतीयों की एक पीढ़ी को आसान कर्ज दिया जा रहा है। इसके अलावा कम समय में उधार लेने की सुविधा ने आबादी के उस हिस्से की मदद की है, जो अपनी आकांक्षाएं पूरी करने के लिए बचत को जरूरी नहीं समझते।
फिनटेक, डिजिटल मार्केटिंग, बढ़ते रिटेल स्टोर नेटवर्क, आसान ऑनलाइन शॉपिंग और उधार का खतरा न समझने की प्रवृत्ति ही लोगों को कर्ज लेने के लिए प्रेरित कर रही है, जैसे कि कल होगा ही नहीं। उधारकर्ता का त्वरित मूल्यांकन कर लिया जाता है, जो कि तकनीकी दृष्टि से असुरक्षित है, जिसका अर्थ है कि ऋण का कोई आधार (कोलेटैरल) है ही नहीं; मूल्य टैग ज्यादातर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बजाय किस्त (ईएमआई) पर होते हैं। अगर राष्ट्रीय दैनिकों में ऑनलाइन स्टोर और नवीनतम गैजेट के विज्ञापन देखें, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वस्तुओं की कीमत के बजाय उसमें प्रमुखता से ईएमआई का उल्लेख होगा।
आसान उधार के अलावा, कम वेतनवृद्धि और अनुबंध पर नौकरी का मतलब है कि लोगों के पास बहुत कम पैसे बचते हैं, जिससे कि वे बचत होने तक खरीदारी को टालें। युवाओं की एक पीढ़ी लगातार गैजेट्स अपग्रेड करती है और निर्माताओं के साथ-साथ दुकानें भी उन्हें लगातार आकर्षक प्रस्ताव देते हैं, जो शायद ही कभी किसी को अपनी खरीदारी के वित्तीय प्रभाव पर सोचने के लिए बाध्य करता हो। इसके अलावा बाइक, कार या गृह ऋण जैसे दीर्घकालीन कर्ज चुकाने में औसत भारतीय की कमाई का 50 से 60 फीसदी खर्च हो जाता है।
आज वर्ष 2000 के आसपास जन्मे लोग ही उपभोक्ता खर्च के वाहक हैं, क्योंकि कामकाजी आबादी में 47 फीसदी हिस्सेदारी उनकी ही है और वे कमाऊ लोगों का एक बड़ा तबका हैं। उन पर किसी तरह का कर्ज न होने के कारण उनमें से कई असुरक्षित कर्ज लेते हैं और उनके कर्ज इतिहास का बहुत कम ध्यान रखा जाता है। इसके अलावा अधिकांश व्यक्तिगत ऋण एनबीएफसी (गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं) द्वारा बांटे जाते हैं , जो फिनटेक और अन्य मोड का उपयोग कर रहे हैं, जो उधार देने के लिए एक आसान और तात्कालिक कवायद करता है। ये उधारकर्ता अपेक्षाकृत आसान ऋण देने वाले मॉडल का उपयोग करते हैं, जो कर्ज वितरण को तेज और आसान बना देता है।
डिजिटल माध्यम युवाओं के बीच सहज कर्ज विश्लेषण, अनुमोदन और संवितरण के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और यहां तक कि संग्रह का तरीका भी युवाओं को तत्काल संतुष्टि प्रदान करता है। इसलिए कर्ज के लिए आवेदन करने और टीवी खरीदने के लिए कुछ हफ्तों तक प्रतीक्षा करने के बजाय दुकानों में एक मॉडल पसंद करने पर भी उन्हें ऋण मिल जाता है। डिजिटल माध्यम का सबसे बड़ा लाभ बड़ी संख्या में ग्राहकों के आंकड़े और जानकारी तक पहुंच है। बिग डाटा और एनालिटिक्स के इस युग में इन आंकड़ों को एक बड़े समुदाय के साथ साझा किया जाता है, जो उपभोक्ताओं को एक ऋण से दूसरे ऋण देने के लिए उपयोग किया जाता है। उधार लेते समय अनजाने में फोन नंबर, मेल आईडी और सामाजिक स्थिति साझा करने का मतलब है कि उधार लेने वाले ने अपना डिजिटल पदचिह्न छोड़ दिया है, जिसका इस्तेमाल किया जा सकता है। कई बार तो इन जानकारियों को उधार लेने वालों के खिलाफ भी बिना उनकी जानकारी के इस्तेमाल किया जाता है।
इस तरह की प्रवृत्तियों के साथ चिंता की बात यह है कि अर्थव्यवस्था विकास की तुलना में कर्ज पर चलती है। इस ऋण चक्र का प्रभाव हमारी बचत दर में दिखाई देता है, जो पिछले एक दशक से धीरे-धीरे कम हो रही है। लागत के निहितार्थ को समझे बिना उधार के पैसे से जीने की बढ़ती संस्कृति गंभीर चिता का विषय है। हम वास्तव में एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जहां एमआरपी कोई ज्यादा मायने नहीं रखता और खरीद के फैसले ईएमआई पर आधारित होते हैं। ईएमआई आधारित जीवन तब लाभदायक है, जब व्यक्ति अपने संसाधनों के भीतर रहकर ही उसे अच्छी तरह प्रबंधित करता है, परेशानी तब होती है, जब कोई चादर से बाहर अपने पैर फैलाने लगता है। अर्थव्यवस्था पर भी ऐसे ऋण का असर पड़ता है।