फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   From Dhaka to Durham crisis demands foresight from politicians pain of citizens paramount question

ढाका से डरहम तक: संकट की छाया के कारण राजनीतिज्ञों में दूरदर्शिता जरूरी; नागरिकों के दर्द का सवाल सबसे अहम

Tue, 13 Aug 2024 04:55 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 13 Aug 2024 04:55 AM IST
विज्ञापन
सार
ब्रिटेन और बांग्लादेश दो अलग-अलग संस्कृतियां, अर्थव्यवस्थाएं और लोकतंत्र हैं। लेकिन ये प्रतीक हैं कि जलवायु, प्रौद्योगिकी एवं जनसांख्यिकी कैसे दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं और जो लोग असमर्थ हैं, उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा कैसे अपने समान अन्य कमजोर लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए भड़काया जा रहा है।
 
loader
From Dhaka to Durham crisis demands foresight from politicians pain of citizens paramount question
बांग्लादेश में हिंसा और पूर्व पीएम शेख हसीना - फोटो : ani

विस्तार

बहुत पुरानी बात नहीं है, जब बांग्लादेश को सफलता की एक शानदार कहानी के रूप में पेश किया गया था। राष्ट्र की 50वीं वर्षगांठ पर राजनीतिक पंडितों ने इतिहास, भूगोल और परिस्थितिगत चुनौतियों वाले राष्ट्र में लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का जश्न मनाया। भारत में इस बात पर बहस चल रही थी कि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक है, जिस पर हमारे देश में नाराजगी भरी टिप्पणियां सामने आती थीं। लेकिन हाल में बांग्लादेश इससे इतर गलत कारणों से सुर्खियों में आया, जो थे- भ्रष्टाचार, कोटा राजनीति, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और असमानता।



लोकतंत्र में सीखने की अवस्था एक तानाशाही शासन के नैरेटिव को समझने की सीमाओं को दर्शाती है। बांग्लादेश में मुद्रास्फीति 9.72 फीसदी के साथ दहाई अंकों के करीब पहुंच गई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। करीब 45 दिनों के आंदोलन के दौरान 400 से ज्यादा लोगों की मौत, शासन में परिवर्तन और शेख हसीना के घर का सामान लेकर भागते प्रदर्शनकारियों की तस्वीरों ने बांग्लादेश की ब्रांड छवि को ध्वस्त कर दिया। बांग्लादेश में अस्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा प्रभावित तो हुई ही है, सीमापार आतंकवाद के साथ घुसपैठ व शरणार्थियों की समस्या में भी वृद्धि हो सकती है।


ढाका से 7,900 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी पर बसा है ब्रिटेन का खूबसूरत शहर डरहम, जहां व्यवसायों को तबाह करने के लिए कारों का इस्तेमाल किया गया। पूरे ब्रिटेन में हिंसक प्रदर्शन और नफरती अपराध ने बीस अन्य शहरों को हिलाकर रख दिया, जिससे 2011 के बाद से सबसे बड़ा कानून-व्यवस्था का संकट पैदा हो गया। बांग्लादेश के विपरीत उन्नत अर्थव्यवस्था माने जाने वाले ब्रिटेन में प्रतिस्पर्धी राजनीति मजबूत है। ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में आए कीर स्टार्मर की सरकार को मुश्किल से छह हफ्ते बाद ही गृहयुद्ध का सामना करना पड़ रहा है। अराजकता का एक दिलचस्प पहलू एक्स (पहले ट्वीटर) के मालिक एलन मस्क और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के बीच टकराव है। एलन मस्क ने ट्वीट किया था कि गृहयुद्ध अनिवार्य है, जबकि स्टार्मर ने प्रदर्शन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा देने वालों को चेतावनी दी थी। विरोध प्रदर्शन के पीछे यह अवधारणा है कि प्रवासी रोजगार के अवसरों को हड़प रहे हैं और स्थानीय लोगों की अनदेखी हो रही है।

विडंबना देखिए कि जिस ब्रेग्जिट को समाधान बताया गया था, उसने व्यापार, निवेश और विकास के नुकसान के बाद स्थितियों को और बदतर बना दिया है। सोशल मीडिया पोस्ट के जरिये गुस्से को भड़काया जा रहा है। गलत सूचना ने समाज को बांट दिया है। दुखद है कि जो लोग अपने हालात बदलने में असमर्थ हैं, उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा अपनी ही तरह के अन्य कमजोर लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए भड़काया जा रहा है। आम तौर पर प्रासंगिकता और सत्ता के आकांक्षी लोग ‘एक' राय को ‘सार्वभौमिक' राय के रूप में पेश करने में प्रेरक होते हैं और शोध से पता चलता है कि युद्ध हो या सामाजिक संघर्ष, दोनों में समीकरण कुछ इस तरह बन जाते हैं, जो ध्रुवीकरण और गलत सूचनाओं को बढ़ावा देते हैं।

पहली नजर में ब्रिटेन और बांग्लादेश दो अलग-अलग संस्कृतियां, अर्थव्यवस्थाएं और लोकतंत्र हैं। लेकिन दोनों की साझा समस्या युवा बेरोजगारी है। ब्रिटेन में 18 से 24 वर्ष के युवाओं के बीच बेरोजगारी दर 12 फीसदी है और पांच लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हैं। बांग्लादेश में 3.2 करोड़ से ज्यादा युवा बेरोजगार या शिक्षा से वंचित हैं। 1970 के दशक में, येल के प्रोफेसर और लिंडन जॉनसन के सलाहकार आर्थर ओकुन ने 'दुख सूचकांक' की अवधारणा पेश की थी। सूचकांक की गणना वार्षिक बेरोजगारी दर और वार्षिक मुद्रास्फीति दर को जोड़कर की जाती है। दुख का बढ़ना आंदोलन और अराजकता को बढ़ावा देने वाला सामान्य कारक है। आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में दुख का एक नया नाम है, जीवन-यापन की लागत का संकट। और यह पूरे ब्रिटेन में स्पष्ट है, जहां किश्तों का भुगतान करने में असमर्थ लोगों के घरों पर बैंकों द्वारा कब्जा करने की घटनाएं पांच साल के उच्चतम स्तर पर हैं।

यह सिर्फ बांग्लादेश और ब्रिटेन की बात नहीं है, बल्कि इस दुख ने दुनिया भर में राजनीतिक लामबंदी को बढ़ावा दिया है। कार्नेगी एंडोमेंट के ग्लोबल प्रोटेस्ट ट्रैकर से पता चलता है कि 2017 से अब तक 258 देशों में आर्थिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। बांग्लादेश में, कई लोगों की कीमत पर कुछ लोगों के अधिकारों के खिलाफ यह दुख, गुस्से में बदल गया, जबकि ब्रिटेन में यह नफरती हिंसा में बदल गया है, जो नस्ल और संस्कृति के मामले में बाहरी माने जाने वाले लोगों को निशाना बनाता है। असमानता से उपेक्षा की भावना बढ़ जाती है, जो अवसरों की कमी से और बदतर हो जाती है, जिससे आय का अंतर भी बढ़ जाता है।

असमानता एक जटिल आर्थिक मुद्दा है, जो राजनीतिक आक्रोश को कई गुना बढ़ाने वाला कारक है। वैश्विक स्तर पर ट्रैक किए गए ग्रेट गैट्सबी कर्व से पता चलता है कि समाज के समृद्ध तबके के पास धन इकट्ठा होने से गतिशीलता अवरुद्ध होती है। जनरेटिव एआई की विघटनकारी क्षमता पहले से ही काम कर रही है और अब तो आईएमएफ का भी अनुमान है कि वैश्विक रोजगार का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण खत्म हुआ है। डिजिटलाइजेशन ने मानव रोजगार को कम कर दिया है, खासकर बैंकिंग और खुदरा क्षेत्र में। जलवायु, प्रौद्योगिकी एवं जनसांख्यिकी जैसे व्यवधानों की तिकड़ी अनिश्चितता बढ़ाती है। जैसे-जैसे व्यवसाय बंद होने से रोजगार कम होते हैं, बेरोजगार लोगों को फिर से कौशल प्राप्त करने और रोजगार तलाशने में मदद की जरूरत होती है। प्रभावित क्षेत्रों और व्यक्तियों को आय सहायता प्रदान करने के लिए परिसंपत्तियों की बिक्री या उच्च करों के माध्यम से संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता है। इस संकट की छाया के कारण राजनीतिज्ञों में दूरदर्शिता की आवश्यकता है। राजनीति चुनावी चक्रों से जुड़ी है। सवाल यह है कि देश नागरिकों के दर्द को कम करने के लिए कितने तैयार हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed