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प्रतिबंध की राजनीति
नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Sun, 06 Jul 2014 07:52 PM IST
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यह पत्रकार, पटकथा लेखक, फिल्मकार और लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्म शताब्दी का वर्ष है। उनकी जन्म शताब्दी से जुड़े एक सेमिनार में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक व्याख्यान भी दिया था। उसमें उन्होंने रेखांकित किया कि आधुनिक भारत के एक बेहद चुनौती भरे दौर में काम करते हुए भी ख्वाजा साहब विचारों की अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण वाहकों में से थे।
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ख्वाजा अहमद अब्बास को पाठक एक ऐसे पत्रकार के रूप में जानते होंगे, जिनका कॉलम लास्ट पेज (आखिरी पन्ना) अंग्रेजी ब्लिट्ज, हिंदी ब्लिट्ज और उर्दू के आजाद कलाम में चालीस वर्षों तक छपा, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में एक रिकॉर्ड है।
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लेकिन आज के पाठक अब्बास साहब को उस फिल्मकार के तौर पर ज्यादा जानते होंगे, जिन्होंने अमिताभ बच्चन को सात हिंदुस्तानी में ब्रेक दिया था। बाद में द नक्सलाइट्स फिल्म में अपने दौर के सुपर हीरो मिथुन चक्रवर्ती को भी उन्होंने नायक की भूमिका दी। वह एक बेहतरीन पटकथा लेखक भी थे। नया संसार, नीचा नगर, धरती के लाल और डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी जैसी फिल्मों की कहानी उन्हीं की थी। आवारा, श्री 420, जागते रहो, मेरा नाम जोकर और बॉबी जैसी राज कपूर की चर्चित फिल्मों की पटकथा भी उन्होंने लिखी थी। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां सआदत हसन मंटो, कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, अहमद नदीम कासमी और राजिंदर सिंह बेदी जैसे अदीबों के साथ लगातार छपती थीं।
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दिल्ली स्थित अब्बास मेमोरियल ट्रस्ट ने, जिसने उपराष्ट्रपति के भाषण का आयोजन किया था, इस अवसर पर उन पर केंद्रित सेमिनारों का प्रबंध करने के अलावा उनकी कुछ रचनाओं को प्रकाशित करने का फैसला लिया था। इसी संदर्भ में ट्रस्ट ने पिछले साल हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह, हिंद पॉकेट बुक्स, से भी संपर्क किया था। जब प्रकाशक ने ख्वाजा साहब का कहानी संकलन हिंदी में छापने में रुचि दिखाई, तो ट्रस्ट ने उनकी कुछ उर्दू कहानियों के हिंदी में अनुवाद का काम शुरू कर दिया। मुझे कुछ कहना है-शीर्षक से ख्वाजा साहब की करीब बीस अनूदित कहानियों का प्रकाशन होना था, जिसका सात जून को उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर लोकार्पण तय था। उस समारोह से कुछ दिन पहले प्रकाशक ने ट्रस्ट को सूचित किया कि वह इस किताब को उसके मौजूदा कलेवर में छापने में असमर्थ हैं। संग्रह की तीन कहानियों-मेरी मौत, नीली सदी और पिंजरा-को छापने में उनकी आपत्ति थी। मेरी मौत कहानी सरदारजी नाम से भी छपी है। ओम बुक्स ने अंग्रेजी में ख्वाजा साहब का जो कहानी संग्रह छापा है, उसका शीर्षक ही है, सरदारजी ऐंड अदर स्टोरीज। खुद मैंने भी इस संदर्भ में हिंद पॉकेट बुक्स के मालिक शेखर मल्होत्रा से बात की कि आखिर उन्होंने यह फैसला क्यों लिया है। उनका कहना था कि ये कहानियां आज के माहौल में उचित नहीं, और इन्हें न छापने का निर्णय उनके पिता दीनानाथ मल्होत्रा से परामर्श करने के बाद ही लिया गया है। भारत में पेपरबैक किताबों की शुरुआत करने वाले दीनानाथ जी ख्वाज साहब के मित्र रहे हैं और हिंद पॉकेट बुक्स ने उनकी कई किताबें उनके जीवित रहते छापी थीं।
किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े न होने के बावजूद मल्होत्रा परिवार ने इन कहानियों को छापने से इन्कार किया। जबकि उर्दू अकादमी ने अपने संकलन में यह कहानी छापी है। अनेक समालोचक सरदारजी को विभाजन की पृष्ठभूमि पर श्रेष्ठतम कहानियों में मानते हैं। यह एक बुजुर्ग सिख की कहानी है, जो एक पाकिस्तानी नागरिक को बचाने की कोशिश में उन्मादी भीड़ के हाथों मारा जाता है। वर्ष 1948 में यह कहानी भारत और पाकिस्तान, दोनों जगह प्रकाशित हुई थी। इस कहानी के कारण उन्हें अदालत में भी खींचा गया, लेकिन मामला सुलझ गया था। खुशवंत सिंह ने एक अंग्रेजी कथा संकलन में सरदारजी को अनूदित कर छापा था। पर आज के दौर में प्रकाशक नहीं चाहते कि खतरा उठाकर इस तरह की कहानियां छापें और बाद में स्वयंभू निगरानी समूहों के दबाव में उन्हें किताब बाजार से वापस लेनी पड़े। ये समूह ही आजकल तय करने लगे हैं कि लोगों को क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं। ऐसे समूहों के दबाव में ही पिछले दिनों प्रख्यात भारतविद वेंडी डॉनिगर की किताब पेंगुइन को वापस लेनी पड़ी थी।
किताबों पर प्रतिबंध लगाने की तरह फिल्मों का प्रदर्शन रोकने की प्रवृत्ति भी अब दिखाई देने लगी है। ऐसा क्यों हो रहा है? लोग अपने सिद्धांतों से समझौता करने को आखिर क्यों तैयार हैं? हमारा संविधान अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार देता है। इसी कारण लेखक, फिल्मकार, कलाकार, शिक्षाविद और पत्रकार बिना किसी भय से अपना काम बखूबी अंजाम दे पाते हैं। कहानियों को छापने से इन्कार कर हिंद पॉकेट बुक्स ने तकनीकी तौर पर कुछ गलत नहीं किया है। पांडुलिपियों को प्रकाशित करने या न करने का अधिकार प्रकाशक को है। बल्कि शेखर मल्होत्रा जैसे प्रकाशकों या दीनानाथ बत्रा जैसे आंदोलनकारियों को, जिनकी शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने ही हाल में पेंगुइन समेत कई प्रकाशकों से लोहा लिया है, दोष देने के बजाय उस राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव बनाने की जरूरत है, जिससे बत्रा जैसे लोगों को ताकत मिलती है।
सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के तौर पर भारत की छवि अगर बरकरार रखनी है, तो संघ परिवार और केंद्र सरकार को चाहिए कि वह खुली बहस को प्रोत्साहित करे और रचनात्मक कामकाज को बाधित न करे। भारत जैसे देश में प्रकाशकों के लिए किताबें छापने का पैमाना सिर्फ पांडुलिपियों की रचनात्मक गुणवत्ता ही होना चाहिए।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)