अभिव्यक्ति का धर्म और जाति
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अभिव्यक्ति की आजादी के आगे धर्म की बंदूकें और जाति की तलवारें तन गई हैं। एक तरफ उदारता भयभीत है, तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति, धर्म और जाति की कट्टरताएं अपनी-अपनी दलीलों की तलवार और ताकत की ढाल लेकर खड़ी हो गई है। इस महाभारत में पश्चिमी राज्य और एशियाई राज्य की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। ईसाई आदर्शों से निकले पश्चिम के कथित सेक्यूलर राज्य जहां अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े होने का दावा कर रहे हैं, वहीं एशियाई राज्य धर्म और जाति की ताकतों के आगे विचित्र किस्म के समझौते कर रहे हैं। पेरिस के कार्टून वाले पत्र शार्ली एब्दो से लेकर भारत के तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के उपन्यास, माथोरुभगन, और डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा राम रहीम की फिल्म, मैसेंजर आफ गॉड, पर मचे घमासान इसके उदाहरण हैं।
पेरिस में जिस तरह से चालीस देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एकजुट होकर शार्ली एब्दो के दफ्तर पर हुए आतंकी हमले का विरोध किया और बाद में शार्ली एब्दो ने धार्मिक कट्टरता पर हंसने की उसी परंपरा को जारी रखते हुए उन्हीं पात्रों पर केंद्रित अपना अंक फिर से प्रकाशित किया, उससे लगता है कि पश्चिम में राज्य और समाज अभिव्यक्ति की पूर्ण आजादी के लिए समर्पित हैं। लेकिन कई बार उनकी यह लड़ाई धर्म के विरुद्ध उसी प्रकार अतिवादी दिखती है, जिस तरह की लड़ाई धर्म के अतिवादी लड़ते हैं। धर्म की जिस आजादी को यूरोप से निकले साम्यवाद ने प्रतिबंधित किया, बाद में यूरोप ने उसी आजादी के लिए साम्यवाद को ध्वस्त कर दिया। यूरोप ने पहले विचारधारा से धर्म को नष्ट करने की कोशिश की और बाद में धर्म से विचारधारा को नष्ट कर दिया। इसी अंतर्संघर्ष में आज की अभिव्यक्ति की जंग और जेहाद और उसके विरुद्ध संघर्ष छिड़ा हुआ है।
अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक इसमें उलझे हुए हैं और भारत जैसा बहु सांस्कृतिक देश भी इस विवाद में लपेटा जा रहा है। अगर हम सोच रहे हैं कि हमारे यहां अभिव्यक्ति पर खतरे यूरोप से कम हैं, तो यह हमारी बड़ी भूल है। भारत में अभिव्यक्ति की जितनी विविध संभावना है, उतने ही खतरे भी हैं। जिस पूंजीवाद से अभिव्यक्ति की आजादी के विस्तार की उम्मीद की जा रही थी और जिसके बारे में हमारे वित्त मंत्री अरुण जेटली दावा कर रहे हैं कि प्रौद्योगिकी के विस्तार के साथ अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना संभव नहीं है, उसी ने इस आजादी पर अंकुश लगाने की सबसे ज्यादा आशंका पैदा की है। नब्बे के दशक में शुरू हुई वैश्वीकरण, सांप्रदायिकता और अस्मिताओं की राजनीति ने देश के बौद्धिक, अकादमिक और मीडिया जगत को विमर्श के नए आयाम दिए। धर्म और जाति के बारे में वे तमाम बातें उभर कर आईं, जो या तो ग्रंथों में थीं या फिर ग्रामीण समाज के भीतरी पर्तों में थीं। इसी दौरान दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य के विविध आयाम विमर्शों में आए और लोगों की संवेदना और समझ में वृद्धि हुई। लेकिन इसी के साथ अस्मिताओं के इस विमर्श का इस्तेमाल पश्चिम के योजनाकारों और भारत के संकीर्ण बौद्धिकों और नेताओं ने भारत की एकता के साथ ही समाजवाद की उस विचारधारा पर चोट करने के लिए किया, जो अस्मिताओं को खंडित विमर्श मानता था। पेरुमल मुरुगन का मामला ठीक यही है। वह तो पश्चिमी तमिलनाडु के कोंगू वेल्लाना समुदाय के हैं और उन्होंने पिछली सदी की जिस प्रथा का शोधपूर्ण तरीके से जिक्र किया है, वह तो उन्हीं की अपनी स्त्रियों के बारे में है। लेकिन चूंकि वह वामपंथी रहे हैं और इन दिनों तमिलनाडु में दक्षिणपंथी दल को अपने उभार के लिए मध्यजातियों की जरूरत है, इसलिए मुरुगन के विरुद्ध कोंगू वेल्लाना जाति का आंदोलन खड़ा कर उन्हें खामोश कर दिया गया।
अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद भारतीय समाज भगवान और देवी, देवताओं के मानवीकरण का समाज रहा है। इसीलिए यहां राम, कृष्ण और शिव को लेकर लोकजीवन में जितनी हंसी-मजाक की बातें हैं, उतनी किसी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बारे में नहीं हैं। पर आज हम मानवीकरण की उस प्रक्रिया को पलट रहे हैं और नए-नए ईश्वर बना रहे हैं। यहीं ईशनिंदा का अपराध नया रूप लेता है। इसकी शुरुआत नब्बे के दशक से शुरू हुए वैश्वीकरण ने किया है। मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी के बहाने जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और कुपोषण की खबर लेने और दाभोलकर जैसे लोगों की मदद करने के बजाय आर्थिक रूप से निराश लोगों का भयादोहन कर अंधविश्वास के आधार पर कमाई करने वालों की ही मदद की है।
ऐसे में सवाल यह है कि हम कैसा विमर्श करें, जिससे बहुसांस्कृतिक समाज में टकराव कम से कम हो और बात भी चलती रहे? स्पष्ट तौर पर अब समय आ गया है कि अगर लोकतंत्र को उसके मूल अधिकारों के साथ लंबे समय तक चलाना है, तो अस्मिताओं के विमर्श और उसकी राजनीति को व्यापक मानवीय विमर्श और हितों की राजनीति में विलीन करना होगा। हमें अपने बारे में ही सोचने के बजाय पराए हितों के बारे में सोचना होगा।