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रखाइन में विदेशी आतंकी!

Mon, 06 Nov 2017 08:58 AM IST
subir bhowmik सुबीर भौमिक
Updated Mon, 06 Nov 2017 08:58 AM IST
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Foreign militants in Rakhine !
रोहिंग्या

जबसे इस्लामिक दुनिया के कट्टरपंथियों ने 'म्यांमार उपनिवेशवाद के खिलाफ जेहाद' का आह्वान किया है, रखाइन में अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के लड़ाकों के अतिरिक्त कई विदेशी आतंकवादी लड़ रहे हैं, जिनमें ज्यादातर पाकिस्तानी और बांग्लादेशी हैं। भारतीय खुफिया अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने एआरएसए की ओर से लड़ रहे कई पाकिस्तानी आतंकवादियों की अपने आका और रिश्तेदारों से हो रही बातचीत पकड़ी है। इसके आधार पर रखाइन में लड़ रहे पाकिस्तानी आतंकवादियों की अनुमानित संख्या लगभग तीस से चालीस है, लेकिन ऐसी भर्ती प्रक्रिया निरंतर जारी रही, तो उनकी संख्या बढ़ सकती है।


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बांग्लादेश के खुफिया विभाग को ऐसे सबूत मिले हैं, जिसके मुताबिक चटगांव एवं अन्य इलाकों के कुछ स्वयंसेवक लड़ाके म्यांमार सेना के खिलाफ लड़ाई में शामिल हैं। ढाका से फोन पर बांग्लादेश के आतंकवाद विरोधी विभाग के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि 'ये स्वयंसेवक कौमी समूह के हैं, जो उत्तरी अराकान में एक इस्लामी गणराज्य के लिए चल रहे संघर्ष का समर्थन करते हैं। उनमें से कुछ बांग्लादेशी आतंकी समूह जमात उल मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (जेएमबी) से संबद्ध हैं, जो बांग्लादेश में चले रही आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं और एआरएसए में शामिल होना सुविधाजनक मानते हैं।' वह अधिकारी अपना नाम उजागर करने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने बताया कि 'चूंकि अब एआरएसए के समर्थन में वृद्धि हुई है, इसलिए जेएमबी के लिए एआरएसए की आड़ लेना सुविधाजनक हो गया है।' कम से कम 80 से 100 बांग्लादेशी एआरएसए की समर्थक भूमिका में काम कर रहे हैं, लेकिन उनमें से कुछ संभवतः सशस्त्र कार्रवाई में संलिप्त हैं।

बांग्लादेश में जो पत्रकार एआरएसए की पनाहगाह तक पहुंचे हैं, उनका कहना है कि विद्रोही टेक्नाफ-कॉक्स बाजार के इलाके में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं और पत्रकारों को भी म्यांमार के क्षेत्र में ले जाते हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलावा, उज्बेक, अरब और अफगान के छोटे-छोटे दल भी अराकान जेहाद में शामिल होने के लिए दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश पहुंचे हैं। खुफिया अधिकारियों का कहना है कि न सिर्फ रखाइन में, बल्कि वे म्यांमार में कहीं भी आतंकी हमलों के लिए तैयार हैं और उनकी अनुमानित संख्या तीस से पैंतीस के बीच है।

भारत की रक्षा खुफिया एजेंसी के पूर्व उप प्रमुख मेजर जनरल गगनजीत सिंह कहते हैं कि यह खतरनाक है। आईएसआई एक और जेहाद का मैदान तैयार कर रही है, क्योंकि उनके लिए यह एक व्यवसाय है । भारत, म्यांमार और बांग्लादेश को मजबूती से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रखाइन दूसरा अफगानिस्तान नहीं है।

म्यांमार के प्रतिष्ठित मीडिया समूह मिज्जिमा ने पहले ही एआरएसए और पाकिस्तान के लश्कर-ए तैयबा और सैन्य खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच घनिष्ठ संबंध का सबूत प्रस्तुत किया था। कहा जाता है कि आईएसआई अपने बाहरी प्रचार प्रभाग के माध्यम से रोहिंग्या नेटवर्क को नियंत्रित करता है, जो 1980 के दशक के अफगानी जेहाद की तरह अराकान में जेहाद के लिए वैश्विक मुस्लिम समर्थन बढ़ाने के लिए प्रचार अभियान चला रहा है।

रोहिंग्या विद्रोह को पुनर्जीवित करने वाला प्रमुख व्यक्ति अब्दुस कदूस बर्मी है, जो पाकिस्तानी रोहिंग्या समुदाय का वंशज है और जिसने सबसे पहले हरकत उल जेहाद इस्लामी-अराकान की शुरुआत की थी और फिर इसे हाराका अल यकीन यानी फेथ मूवमेंट के रूप में इस्तेमाल किया। अंत में उसने इन सभी समूहों को नव सृजित एआरएसए में मिला दिया, जिसका नेतृत्व पाकिस्तान में जन्मा रोहिंग्या अब्दुल्ला जुनूनी करता है। एआरएसए की सैन्य शाखा का प्रमुख हाफिज तोहार रखाइन गांव का है, जहां उसे कदूस बर्मी ने भर्ती किया था। उसी ने लश्कर-ए तैयबा और उसकी राजनीतिक शाखा जमात उद दावा के साथ करीबी संबंध स्थापित किए। ये दोनों संगठन पाकिस्तान में प्रतिबंधित हैं, लेकिन कमोबेश खुलेआम अपना काम करते हैं।
 
जून, 2012 में हिंसा की पहली घटना के तुरंत बाद लश्कर-ए तैयबा और जमात उद दावा ने रोहिंग्या मुद्दे को उठाने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत की थी, जिसे दिफा-ए मुसलमान ए-अराकान कहा गया। उसी वर्ष अगस्त में जमात उद दावा के दो वरिष्ठ कार्यकर्ता-शाहिद महमूद और नदीम अवान खुफिया एजेंसी द्वारा पहचाने गए, जो म्यांमार सीमा के निकट कैंप में रोहिंग्या के संपर्क करने के लिए गए थे। कहा जाता है कि रोहिंग्या को धार्मिक और कुछ सैन्य शैली का प्रशिक्षण दिया गया। उसी समय लश्कर-ए तैयबा के कुछ कार्यकर्ता थाईलैंड के मेई सोट क्षेत्र में गए थे, जहां उन्होंने कुछ संभावित आतंकियों को प्रशिक्षण दिया था। अब लश्कर-ए तैयबा और एआरएसए ने आईएसआई के निर्देशों और भारी वित्तीय सहायता के बल पर अराकान जेहाद के समर्थन के लिए सोशल मीडिया नेटवर्क तैयार किया है। इस सोशल मीडिया नेटवर्क से झूठी और भड़काऊ तस्वीरें जारी की जाती हैं।

ह्यूमैन राइट्स वाच (एचआरडब्लू), जिसने अराकान प्रांत में जलाए गए गांवों की वास्तविक तस्वीर जारी की है, उसे काल्पनिक और यथार्थ से जुड़ी तस्वीरों को अलग करते हुए सावधान रहना होगा। पंद्रह वर्षों से मानवाधिकार उल्लंघन को कवर करने वाले डेविड मैथिजन के अनुसार, उन्हें भेजे गए कई फोटो नकली थे। लिंटेनर कहते हैं कि ऐसा करके कुछ रोहिंग्या समर्थक समूह वास्तव में एचआरडब्लू जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के काम को कमजोर कर रहे हैं। मैथिजन कहते हैं कि एक खराब रिपोर्टिंग मानवाधिकार से संबंधित गंभीर और पेशेवर रिपोर्टिंग को बदनाम करने के लिए सरकार को हथियार मुहैया कराती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जटिल मानवाधिकार मुद्दों की जानकारी भेजते हुए सोशल मीडिया का दुरुपयोग किया जा सकता है।

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