फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   For uninterrupted and serene Ganga

अविरल और निर्मल गंगा के लिए

Wed, 11 Jul 2018 06:18 PM IST
सुरेश भाई
सुरेश भाई Updated Wed, 11 Jul 2018 06:18 PM IST
विज्ञापन
For uninterrupted and serene Ganga
सुरेश भाई
गंगा पुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद विगत 22 जून से मातृ सदन, हरिद्वार में आमरण अनशन पर हैं। लोहारीनाग-पाला और भैरोंघाटी (लगभग 900 मेगावाट) जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ इन्होंने 2008 में भी अनशन किया था। नतीजतन तत्कालीन यूपीए सरकार ने इन परियोजनाओं को हमेशा के लिए रोक दिया था।

loader

उसी दौरान केंद्र ने गंगा बेसिन प्रधिकरण बना दिया। यूपीए सरकार ने दिसंबर, 2012 में गंगोत्री से उत्तरकाशी तक संवेदी क्षेत्र घोषित कर यह संदेश दिया था कि भागीरथी घाटी की धरती में बड़े निर्माण कार्य सहन करने की क्षमता नहीं है। पर संवेदी क्षेत्र की घोषणा के छह साल बाद भी जन अपेक्षाओं के अनुरूप मास्टर प्लान नहीं बनाया जा सका। यदि यह बन गया होता, तो इस क्षेत्र में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के विकल्प के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा बनाई गई लघु पनबिजली नीति को लागू किया जा सकता था।

अब गंगा बेसिन प्राधिकरण की बैठक भी नहीं हो पा रही। जबकि एनडीए सरकार द्वारा नमामि गंगे योजना लांच करने के बाद लोगों में उत्साह देखने को मिला था। स्वामी सानंद ने भी आईआईटी के आधा दर्जन वैज्ञानिकों के साथ मिलकर गंगा की अविरलता और निर्मलता से संबंधित एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। पर उन्हें इसका जवाब नहीं मिला।

उपवास पर बैठने के पूर्व भी प्रधानमंत्री को उन्होंने पत्र भेजा था। बेशक 30 जून को उपवास समाप्त करने की अपील के साथ जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने उन्हें एक पत्र लिखा, जिसमें सूचित किया था कि कानपुर में शीशमउ से गंगा में प्रवाहित हो रही 140 एमएलडी प्रदूषित पानी में से 80 एमएलडी सीवर टीटमेंट प्लांट में जाने लगा है। बेशक यह उपलब्धि है, पर जिन बातों की तरफ स्वामी सानंद इशारा कर रहे हैं, उन्हें सरकार कब सुनेगी?

गंगा न अविरल हो पा रही है, न निर्मल, क्योंकि दोनों के हल के लिए एक ही नजरिया पेश किया जा रहा है। जबकि हिमालय और मैदानी क्षेत्रों की गंगा में अंतर है। पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा ने बड़े बांधों का विरोध करते समय हिमालय का घोषणा पत्र प्रस्तुत किया था, जिसमें हिमालयी भू-भाग की विशिष्ट भौगोलिक संरचना के आधार पर गंगा की अविरलता के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे। तब मुरली मनोहर जोशी से लेकर स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह, नीतीश कुमार आदि का उन्हें समर्थन मिला था।

स्वामी सानंद की मांगों पर गौर क्यों नहीं हो रहा? गंगा के उद्गम क्षेत्र चारधाम में देवदार एवं अन्य दुर्लभ प्रजाति के पेड़ काटे जा रहे हैं, जबकि नमामि गंगे में कहा जा रहा है कि इसके कैचमेंट एरिया में पेड़ों का सघन रोपण किया जाना है। यहां के हजारों गांवों को अभी तक खुले में शौच से मुक्त नहीं किया जा सका है। ग्लेशियरों से लेकर गंगा घाटों की सफाई में स्थानीय भागीदारी लगभग शून्य है।

जिन्हें काम मिला है, वे सफाई कर चले जाते हैं और कूड़ा नगर पालिकाओं को सौपते हैं, जो कूड़ा गंगा में फेंक देते हैं। गंगा की अविरलता रोकने पंचेश्वर की शक्ल में नए-नए बांधों की फाइलें बन रही हैं। इसके विरोध में नदियों के संरक्षण की आवाज उठा रहे अनेक लोग सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। 2008 में इन्हीं मुददों को लेकर उत्तराखंड नदी अभियान प्रारंभ हुआ था, और उत्तराखंड की तत्कालीन सरकार ने भविष्य में बड़े बांधों की स्वीकृति न देने का वायदा किया था, पर अब उन्हें भुला दिया गया है। इन ज्वलंत मुददों पर सरकारें कब तक चुप्पी साधे रखेंगी?

-लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed