बना रहे सामाजिक ताना-बाना
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बीते दिनों मुजफ्फरनगर दंगों की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय एकता परिषद की 16वीं बैठक हुई। इसमें सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए प्रस्ताव में अन्य बातों के अलावा यह भी संकल्प लिया गया कि सांप्रदायिक सौहार्द में खलल डालने के लिए किसी भी रूप में की जाने वाली हिंसा की निंदा की जाए और इसे अंजाम देने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाए। पार्टी की सीमाओं से ऊपर उठकर बहुत से लोगों और खासतौर पर धर्मनिरपेक्ष स्वर वालों ने बेशक यह हैरानी जताई कि इस तरह के बड़े शुद्ध और पवित्र लगने वाले प्रस्तावों का सांप्रदायिक दंगों तथा खून-खराबे की पृष्ठभूमि में शायद ही कोई असर हो। इसके अलावा तकरीबन सभी ने इस बात की आलोचना की कि राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक हर साल बुलाने का वायदा किया गया था, लेकिन उसे कभी पूरा ही नहीं किया गया। दरअसल, सांप्रदायिक हिंसा हो जाने के बाद होने वाली इस तरह की बैठकें तो पोस्टमॉर्टम की कसरत ही बनकर रह जाती हैं। एक बार फिर सरकार ने वही जाने-पहचाने आश्वासन दिए हैं, हालांकि अतीत के अनुभवों के चलते इन पर भरोसा होना मुश्किल है।
इस सिलसिले में यह याद रखना भी जरूरी है कि भाजपा-नीत एनडीए के छह साल के शासन के दौरान तो एक बार भी राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक नहीं हुई। यहां तक कि गुजरात में हुए दंगों के बाद भी इसकी जरूरत नहीं महसूस की गई। वैसे खुद को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने में व्यस्त गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो इस बैठक में भाग लेना भी जरूरी नहीं समझा। भाजपा अध्यक्ष भी इस बैठक में नहीं थे। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के मुख्यमंत्रियों में अपवादस्वरूप, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ही इसमें शिरकत की। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी प्रतिनिधि भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने चर्चा के आरंभ में वही बातें कहीं, जो सांप्रदायिक ताकतें दिन-रात कहती रहती हैं। उन्होंने आग्रह किया कि सेक्यूलरिज्म के अर्थ में हिंदी में ‘धर्मनिरपेक्षता’ की जगह पर, ‘पंथनिरपेक्षता’ का ही प्रयोग किया जाए। धर्मनिरपेक्षता की संज्ञा में निहित अर्थ यह है कि विभिन्न धर्मों के बीच भेदभाव न किया जाए या राज्य सभी धर्मों को बराबरी की नजर से देखे, लेकिन वह खुद किसी भी धर्म को न अपनाए। उसकी जगह पर उनकी मांग ऐसी संज्ञा की है, जो सिर्फ राज्य की तरफ से भिन्न-भिन्न पूजा-पद्धतियों के बीच भेदभाव न किए जाने की द्योतक हो। इसके पीछे एक और प्रबल संदेश है कि सिर्फ हिंदू धर्म ही धर्म कहलाने का हकदार है, बाकी सबको ज्यादा से ज्यादा ‘पंथ’ कहा जा सकता है।
राष्ट्रीय एकता परिषद में शामिल धार्मिक अल्पसंख्यकों के जाने-माने प्रतिनिधियों ने इस बात का जिक्र किया कि 2014 के आम चुनाव के नजदीक आते ही इस तबके को बढ़ते तनाव का सामना करना पड़ रहा है। जाने-माने न्यायविद, फाली एस नारीमन ने तो यह सवाल ही पूछ लिया कि क्या भारत एक धार्मिक राज्य बनने की ओर जा रहा है? इस बैठक से भारतीय उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति भी ध्यान खींचने वाली थी। ऐसा करके उन्होंने इसी आशंका की पुष्टि की है कि उन्हें तो सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब है, फिर भले ही हमारी बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था तहस-नहस ही क्यों न हो जाए। ऐसा लगता है कि उन्होंने जो नया-नया ‘मसीहा’ खोजा है, उसके ख्याल ने ही उन्हें इस बैठक से दूर ही रहने के लिए प्रेरित किया होगा, कि कहीं अपने सुनहरे भविष्य की उनकी उम्मीदें धुंधली न पड़ जाएं। यह याद दिलाता है कि किस तरह कॉरपोरेट दुनिया ने, जर्मनी में हिटलर तथा फासीवाद के उभार का भी समर्थन किया था। इन हालात में यह स्पष्ट है कि गुजरात के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए आगे करने के बाद आरएसएस और भाजपा 2014 के आम चुनाव की तैयारियों के क्रम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ाने में तथा इसके आधार पर चुनावी लाभ बटोरने की अपनी कोशिश में जुटी हैं। पर किसी को भी राजनीतिक फायदे के लिए देश के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।