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चुनौती: विकसित भारत के महानगर में बाढ़, शहरी नियोजन पर उठे सवाल

Fri, 21 Jul 2023 08:03 AM IST
Shivdan Singh शिवदान सिंह
Updated Fri, 21 Jul 2023 08:03 AM IST
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सार
बाढ़ के प्रति सरकारों की अगंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि दिल्ली में पिछले दो साल से बाढ़ नियंत्रण समिति की बैठक ही नहीं हुई।
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Floods in Metro cities of India questions raised on urban planning
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हमारा देश विकसित मुल्कों की सूची में शामिल होने वाला है। ऐसे में, राजधानी दिल्ली में बाढ़ और जलभराव के जो हालात बने, वे देश की छवि के लिहाज से अच्छे नहीं हैं। वैसे भी यह एक गंभीर विचारणीय प्रश्न है कि पिछले कुछ वर्षों से देश के प्रमुख राज्यों के ज्यादातर शहरों में सामान्य मानसून के मौसम में भी बाढ़ जैसे हालात क्यों बन जाते हैं। इंदौर का ही उदाहरण लें, जहां कभी 24 घंटों में 17 इंच और उससे भी अधिक पानी गिरने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया, फिर भी बाढ़ की स्थिति पैदा नहीं हुई। लेकिन आज उससे आधी बारिश होने पर भी शहरों में चारों तरफ जलभराव और बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि पिछले चार-पांच दशकों में देश के महानगरों में जो अकल्पनीय, अनियोजित और बेतरतीब विकास हुआ है, उसके कारण वर्षा के समय उसके दुष्परिणाम शहरी क्षेत्रों में बाढ़ के रूप में दिखने लगे हैं।



मुंबई में भी कुछ साल पहले जब एक दिन में करीब 30 इंच बारिश हुई थी, तब वहां हालात भयावह हो गए थे। ऐसी स्थिति पैदा होने का मुख्य कारण है नदी एवं जलभराव क्षेत्रों को लेकर निर्माण की राष्ट्रीय नीति का पालन न होना। सड़कों पर वर्षाजल की निकासी के लिए जो क्रॉसिंग होनी चाहिए या तो उसका निर्माण नहीं हुआ, और यदि कहीं पर हुआ भी, तो उसका आकार इतना छोटा है कि पानी की निकासी सही प्रकार से नहीं हो पाती। देखा गया है कि 1980 के बाद देश में जितनी भी शहरी कॉलोनियां बनी हैं, उनमें से ज्यादातर में कहीं भी बरसात के पानी की निकासी पर कोई योजनाबद्ध कार्य नहीं किया गया है। फिर शहरों में बिल्डरों तथा माफिया ने शासन-प्रशासन की मिलीभगत से डूब वाले इलाकों में बस्तियां बसानी शुरू कर दी हैं। दिल्ली के यमुना क्षेत्र में बसाई गई बस्तियां इसका उदाहरण हैं, जो इन दिनों जलमग्न हैं। ऐसे हालात देश के दूसरे शहरों में भी हैं। पहले शहरों में नदियों के किनारे जो खुले मैदान होते थे, अब वहां केवल भवन और गैरकानूनी बस्तियां दिखती हैं।


देश के नगरों-महानगरों में नगर विकास प्राधिकरण हैं, जिनकी जिम्मेदारी होती है भवन निर्माण, सड़क, जल निकासी तथा अन्य जन सुविधा के कार्यों की योजना बनाना तथा इनका निर्माण करवाना। परंतु इस बार की बाढ़ देखकर लगता नहीं कि दिल्ली विकास प्राधिकरण ने अपने कार्य क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से भवन निर्माण और पानी निकासी का कोई काम किया है। सर्वोच्च न्यायालय तथा उसके आसपास के पूरे क्षेत्र में पानी निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण वहां के निवासियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

बाढ़ के प्रति सरकारों की अगंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि दिल्ली में पिछले दो साल से बाढ़ नियंत्रण समिति की बैठक ही नहीं हुई! इस समिति में दिल्ली और केंद्र सरकार, सेना व केंद्रीय जल आयोग सहित विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय सुनिश्चित किया जाता है। इस उपेक्षा का नतीजा है कि दिल्ली के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भीषण जलभराव हुआ और गलियों में नावों के जरिये जरूरी सामान जनता तक पहुंचाने की नौबत आई। इस तरह के हालात हालांकि अन्य राज्यों में भी हैं।

जागरूक व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा के बाद वह इसकी जांच करे कि आखिर किन वजहों से इन आपदाओं ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। लिहाजा इस साल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत दूसरे शहरों में आई बाढ़ के बाद जरूरी है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक अध्ययन दल का गठन किया जाए, जो यह पता लगाए कि सामान्य से ज्यादा बारिश होने से शहरी इलाकों में बाढ़ की स्थिति क्यों पैदा हुई। यदि भारतीय सेना में इस प्रकार का कोई हादसा होता है, तो वहां जांच यह तय करती है कि इस हादसे को रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी और उसके बाद जिम्मेदारी तय कर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है। यदि प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यरत अधिकारियों के विरुद्ध भी ऐसे ही प्रावधान हों, तो भविष्य में दिल्ली, गाजियाबाद और आगरा जैसी बाढ़ की स्थिति देश के किसी भी शहर में पैदा नहीं होगी।
-लेखक सेवानिवृत्त कर्नल हैं।

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