एक अच्छी पहल की खामियां

रीतिका खेड़ा Updated Thu, 05 Jan 2017 07:20 PM IST
flaws of a good initiative
रीतिका खेड़ा
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 में जबसे 'मातृत्व हक' को सार्वभौमिक अधिकार के रूप में चिह्नित किया गया है तबसे नई योजना पेश करने के लिए एक कानून की जरूरत है, ताकि इस अधिकार को लागू किया जा सके। हालांकि इस अधिनियम को पारित हुए तीन वर्ष बीत चुके हैं, पर इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। यह अनदेखी ऐसे नेता के नेतृत्व वाली सरकार की तरफ से हुई है, जिन्होंने इस अधिनियम पर चर्चा के दौरान तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कमजोर खाद्य सुरक्षा कानून लाने के लिए आलोचना की थी। उन्होंने तब कहा था, 'हमें कार्रवाई की जरूरत है, कानून की नहीं।'

वर्ष 2013 में पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) में सार्वभौमिक मातृत्व हक को कानूनी अधिकार बनाया गया। हालांकि इसमें प्रति बच्चे पर मात्र छह हजार रुपये देने का प्रावधान किया गया, जोकि बहुत कम है, लेकिन मातृत्व हक को कानूनी अधिकार की मान्यता देना महत्वपूर्ण है। इससे नियोजित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को सवैतनिक चार से छह महीने छुट्टी का अधिकार मिला है। इससे बहुत कम महिलाओं को लाभ मिलेगा, क्योंकि 90 फीसदी कार्यबल अनियोजित क्षेत्र में काम करता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मातृत्व हक को अनियोजित क्षेत्र में भी बराबरी से लागू किया जा सकता है। हर प्रसूता को सार्वभौमिक मातृत्व हक के तहत छह हजार रुपये देने पर करीब 16 हजार करोड़ रुपये खर्च आएगा, जो जीडीपी का 0.2 फीसदी है। कुछ लोगों का तर्क है कि इससे प्रजनन क्षमता में आ रही कमी प्रभावित होगी। दिलचस्प बात यह है कि जब नियोजित क्षेत्र की महिलाओं के लिए मातृत्व हक का कानून बनाया गया था, तो इस तरह का कोई तर्क नहीं दिया गया था।

जच्चा और बच्चा के पोषण के लिए मातृत्व हकों का कितना महत्व है, इस बारे में दस्तावेज उपलब्ध हैं, जिसमें बताया गया है कि इससे न केवल बाल मृत्युदर में कमी आएगी, बल्कि प्रजनन दर में भी कमी आएगी। जनसांख्यिकी विशेषज्ञ डायने कोफ्फी का अध्ययन बताता है कि भारत में नवजातों की मृत्युदर काफी ज्यादा है। वर्ष 2013 में जहां भारत में प्रति हजार बच्चों पर नवजात मृत्युदर 29 थी, वहीं चीन में यह आंकड़ा मात्र 7.7 था। नवजात बच्चों की उच्च मृत्युदर का एक बड़ा कारण कम वजन के बच्चों का पैदा होना है। पहले से ही कम वजन की भारतीय महिलाएं गर्भावस्था के दौरान बहुत कम वजन हासिल कर पाती हैं। नकद हस्तांतरण के रूप में मातृत्व हक देने से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि महिलाएं बेहतर भोजन करेंगी और गर्भावस्था के दौरान उनका वजन बढ़ेगा। जाहिर है, कुछ अन्य मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उचित स्वास्थ्य सुविधाएं, पोषक आहार, गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त आराम आदि।

इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना (आईजीएमएसवाई) के एक अध्ययन में यह पाया गया कि महिलाएं अवैतनिक कामों का भारी बोझ सहन करती हैं। अगर उन्हें उनके काम का मेहनताना नहीं मिलता है या समय पर नहीं दिया जाता है, तो गर्भावस्था के दौरान उनके काम के बोझ में कोई कमी नहीं आती। आईजीएमएसवाई को पॉयलट प्रोजेक्ट के तहत 53 जिलों में लागू किया गया था, जिसमें वर्ष 2010 से प्रति बच्चे पर चार हजार रुपये दिए जाते थे, जिसे 2013 में बढ़ाकर छह हजार रुपये कर दिया गया। हालांकि इसका कवरेज बहुत कम रहा और वर्ष 2013-14 के शुरू में मात्र 50 फीसदी लक्षित महिलाओं को ही नकद हस्तांतरण मिल पाया। इसके अलावा भुगतान में देरी, सबसे कमजोर महिलाओं को यह लाभ नहीं मिलने जैसी समस्याएं भी सामने आईं।

इस बीच दो राज्य सरकारों-तमिलनाडु और ओडिशा ने सार्वभौमिक मातृत्व हक लागू किया। तमिलनाडु में वर्ष 1987 से मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी मातृत्व लाभ योजना लागू की गई थी, जिसके तहत अब प्रति बच्चे पर 12,000 रुपये दिए जाते हैं और इसे बढ़ाकर 18,000 रुपये किए जाने की संभावना है। ओडिशा की ममता योजना के तहत वर्ष 2011 से प्रति बच्चे पर पांच हजार रुपये दिए जाते हैं। दोनों योजनाओं में मामूली शर्तें हैं, जैसे गर्भावस्था का पंजीकरण, प्रसव पूर्व जांच आदि।

इस तरह देखा जाए तो 31 दिसंबर को प्रधानमंत्री द्वारा मातृत्व हक लागू करने की घोषणा देर से की गई है, जो अस्पष्ट भी है, क्योंकि काफी काम होना बाकी है। हालांकि यह योजना कब कार्यरूप लेगी और इसका विवरण क्या होगा, यह महत्वपूर्ण है। सार्वभौमिक, बिना शर्त और महंगाई के अनुरूप नकद हस्तांतरण जरूरी है। नकद हस्तांतरण तय करने का आधार छह महीने का वेतन होना चाहिए, जैसा कि तमिलनाडु ने करने की कोशिश की है, ताकि प्रसव के कारण मजदूरी को होने वाले नुकसान का आंशिक मुआवजा मिल सके। इस तरह से देखें, तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और प्रधानमंत्री की घोषणा में प्रस्तावित छह हजार रुपये बहुत कम हैं। इसके अलावा, सरकार को इसे पिछली तारीख (वर्ष 2013 से सभी जन्म पर) से लागू करने पर विचार करना चाहिए। पिछले ढाई वर्षों में सामाजिक नीति के मामले में हमने सरकार के इतने यू-टर्न देखे हैं कि समझना मुश्किल है। यूपीए-दो के एनएफएसए मसौदे की आलोचना करने के बाद वर्ष 2015 की शुरुआत में शांता कुमार कमेटी ने एनएफएसए कवरेज में कमी का प्रस्ताव दिया था। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री ने कहा था कि मनरेगा कांग्रेस की विफलता का जीवंत स्मारक है, लेकिन 2016 में सरकार का सुर बदल गया-'यह हमारी सफलता का स्मारक नहीं है...इस योजना के क्रमिक विकास में सुधार लाना हमारी जिम्मेदारी है।' यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनावी राजनीति की जरूरतें भाजपा को मनरेगा, मातृत्व हक और अन्य सामाजिक सुरक्षा उपायों के महत्व की पहचान करने के लिए मजबूर करेंगी और भारत में एक मजबूत कल्याणकारी राज्य की जरूरत पर व्यापक आम सहमति बनाने में योगदान करेंगी!

लेखिका आईआईटी, दिल्ली से संबद्ध हैं

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