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विश्लेषण: तमिल और हिंदी के बीच की लड़ाई पसंद-नापसंद पर छिड़ी जंग नहीं, यह सामने लाती है नजरिया

Sun, 23 Mar 2025 07:37 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 23 Mar 2025 07:37 AM IST
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सार
तमिल और हिंदी के बीच की लड़ाई हमारे सामने दो दलों के पसंद या नापसंद का मामला नहीं है। यह देश के दो नजरिए को सामने लाती है, जिनमें एक भारतीयों को अपनी इच्छानुसार जीने देने का पक्षधर है तो दूसरा उस पर प्रतिबंध लगाने का।
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fight between Tamil and Hindi is not a war of likes and dislikes, it brings out a point of view
भाषा विवाद। - फोटो : adobe stock/amar ujala

विस्तार

डीएमके और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बीच हुई कहासुनी को मीडिया में दो भाषाओं- तमिल और हिंदी के बीच की लड़ाई के रूप में पेश किया गया। गहराई से देखा जाए तो यह बहस भारत के दो अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व करती है- एक, जो संस्कृति के साथ-साथ राजनीति में भी विविधता और अंतर का स्वागत करता है और दूसरा, जिसका अघोषित आदर्श वाक्य है- ‘मानकीकरण, समरूपीकरण, केंद्रीकरण’।


तमिलनाडु में हिंदी लागू करने का विरोध बहुत पुराना है। 1930 के दशक के अंत में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस सरकार ने चरणबद्ध तरीके से स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य की। विडंबना यह रही कि तत्कालीन मद्रास के प्रधानमंत्री (जैसा कि तब नाम था) सी राजगोपालाचारी ने बाद में अपना रुख पूरी तरह बदल दिया। 1950 के दशक तक उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि यदि मातृभाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा पढ़ाई जानी है तो वह हिंदी नहीं अंग्रेजी होनी चाहिए। इसका विरोध करने वाले राम मनोहर लोहिया के लिए उनका कहना था कि अंग्रेजी बोलचाल और व्यवहार में पूरी तरह भारतीय भाषा बन चुकी है। 1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अंग्रेजी के बजाय हिंदी को केंद्र और राज्यों के बीच संवाद की भाषा बनाने की पहल की। इसका मद्रास में कड़ा विरोध हुआ, जिसका फायदा डीएमके ने उठाया। शास्त्री जी द्वारा फैसला वापस लिए जाने के बावजूद कांग्रेस को खामियाजा भुगतना पड़ा और वह राज्य में सत्ता से वंचित हो गई। 1967 के बाद से तमिलनाडु में केवल एक या दूसरी द्रविड़ पार्टी ही सत्ता में रही है। एमके स्टालिन और उनके सलाहकार इस इतिहास को जानते थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि जब 1967 में मात्र हिंदी का विरोध करने पर सत्ता चली गई थी तो आज भी इसका विरोध खतरे से खाली नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जोर-शोर से ‘काशी तमिल संगम’ का प्रचार, नए संसद भवन में ‘सेंगोल’ की स्थापना का तमाशा और तमिलनाडु के हिंदुत्व उद्धारक के रूप में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी को खड़ा करने के बारे में विचार किया जाए तो यही लगता है कि भाजपा तमिलनाडु में अपनी पैठ बनाने के लिए बेकरार है।


डीएमके का भाषा पर बहस छेड़ना चुनाव के नजरिए से सही है, लेकिन यह तमिल अस्मिता से भी जुड़ा है। इसके कई आयाम हैं। सांस्कृतिक रूप से देखा जाए तो उनकी भाषा में कालजयी साहित्य की रचना हुई है। वहीं, सामाजिक तौर पर जाति और लिंग भेद के विरुद्ध आंदोलन भी हुए हैं, जिनका प्रभाव हिंदी भाषी राज्यों की तुलना में वहां अधिक दिखाई दिया। सबसे महत्वपूर्ण, आर्थिक दृष्टि से हिंदी पट्टी के राज्यों की तुलना में तमिलनाडु औद्योगिक रूप से कहीं अधिक विकसित है और वहां प्रति व्यक्ति आय भी हिंदी भाषी राज्यों की तुलना में अधिक है। तमिलों को भी आत्मसम्मान उतना ही प्यारा है, जितना कि गुजरातियों को अपनी अस्मिता।

तमिलनाडु में हिंदी का विरोध राजनीति और संस्कृति के आधार पर है और यह संविधान के अनुरूप भी है। 1976 के पहले तक शिक्षा राज्य का विषय होती थी। आपातकाल के समय इसे समवर्ती सूची में डाल दिया गया। इसे तानाशाही माना गया। अब उसी का उपयोग केंद्र तमिलनाडु सरकार को अपने नियंत्रण में रखने के लिए कर रहा है और यह धमकी दे रहा है कि यदि उसने नई दिल्ली के आदेश का पालन नहीं किया तो उसे मिलने वाली धनराशि वापस ले ली जाएगी। जो तमिलनाडु सरकार के रवैये का विरोध कर रहे हैं, वे सालों से अलग-अलग आयोगों द्वारा अनुशंसित ‘त्रिभाषा फॉर्मूला’ का हवाला दे रहे हैं। इसमें यह प्रस्ताव रखा गया कि मातृभाषा और अंग्रेजी के साथ तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी पढ़ाई जा सकती है। हालांकि हिंदी भाषी राज्यों में व्यवहार में हमेशा से तीसरी भाषा संस्कृत रही है। जहां दूसरे राज्यों ने इस त्रिभाषा फॉर्मूले को अपनाया, तमिलनाडु ने ऐसा नहीं किया। व्यवहार में इसका जो नतीजा निकला, उससे उसकी आपत्तियां सही साबित होती हैं। त्रिभाषा फॉर्मूला राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के बजाय राज्य प्रायोजित हिंदी विस्तारवाद का एक उपकरण रहा है, फिर भी वर्तमान शासन इसे बढ़ावा दे रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री इस विषय पर चुप रहे हैं, लेकिन गृहमंत्री इस बात पर जोर देते रहे हैं कि हिंदी और सिर्फ हिंदी ही दूसरे राज्यों के लोगों से संवाद की भाषा होनी चाहिए। 

आधी सदी, लगभग 1965 से 2014 तक केंद्र सरकार ने गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया। इसके बाद भी लोगों के एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाने और फिल्म तथा टेलीविजन के माध्यम से हिंदी का प्रसार हुआ। इसने हिंदी सिनेमा और टेलीविजन सीरियल को सरल हिंदी दी, न कि राज्य प्रचार और आकाशवाणी की अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ हिंदी।

पिछले महीने मोहन भागवत ने हिंदुओं से अंग्रेजी को छोड़ने की बात की, जिस तरह से एक बार लोहिया ने किया था। संघ प्रमुख ने भी अंग्रेजी को अभिजात वर्ग की भाषा बताया। उन्होंने उम्मीद जताई की भारत में जल्द ही यह भाषा खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं। अगर पीछे देखें तो 1990 के दशक से अंग्रेजी का प्रसार अधिक तेजी से हुआ है। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में तेजी इसलिए आई, क्योंकि हमारे प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेज अंग्रेजी में पढ़ाते थे।

कई साल पहले से विचारक चंद्रभान प्रसाद तर्क देते रहे हैं कि दलितों को आधुनिक व्यवसायों में प्रवेश पाने के लिए अंग्रेजी सीखनी चाहिए। उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर का उदाहरण देते हुए कहा, “अंग्रेजी शेरनी का दूध है, इसे पीने वाले ही दहाड़ेंगे।” जब प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक अपनी भाषा पर गर्व करते हुए कह रहे थे कि स्कूलों में अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जानी चाहिए, तब दलित बुद्धिजीवियों ने जवाब दिया था- पहले आपने हमें संस्कृत से दूर रखा, अब अंग्रेजी के लिए कर रहे हैं। ये सब आपके (उच्च जाति के) विशेषाधिकार को बनाए रखने के लिए है।

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाएं पूरे भारत में व्यापक रूप से जानी जाने लगीं, भले ही इनमें से एक या दोनों भाषाओं को समझने वाले बहुत से भारतीय उन्हें आसानी से पढ़ या बोल नहीं पाते थे। गैर-हिंदी भाषियों द्वारा हिंदी और भारतीयों द्वारा अंग्रेजी को अपनाया जाना स्वैच्छिक और स्वतःस्फूर्त था। इसका देश पर राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी प्रभाव पड़ा। इस जैविक प्रक्रिया को और विकसित होने देने के बजाय संघ परिवार राज्य की शक्ति का उपयोग करके अंग्रेजी को धीरे-धीरे खत्म करने और हिंदी को आक्रामक रूप से बढ़ावा देना चाहता है। यह उसकी संकीर्ण सोच है कि जिस प्रकार केवल हिंदू ही भारत के स्वाभाविक और प्रामाणिक नागरिक हैं, उसी प्रकार भाषा के क्षेत्र में केवल हिंदी ही राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का काम कर सकती है।

कोई भी धर्म या भाषा दूसरे से बड़ा नहीं है। इसी संदर्भ में तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार के बीच वर्तमान तनातनी को देखा जा सकता है। मैं किसी भी सूरत में डीएमके का पक्षधर नहीं हूं, जिसका परिवारवाद के प्रति झुकाव कांग्रेस से मिलता-जुलता है। हमारे सामने दो दलों के पसंद या नापसंद का मामला नहीं है, यह देश के दो नजरिए का चुनाव है, जिनमें एक भारतीयों को अपनी इच्छानुसार जीने देने का पक्षधर है तो दूसरा उस पर प्रतिबंध लगाने का।
 
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