फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Festival lights or pollution ash? Learn the truth about green firecrackers

दूसरा पहलू: ग्रीन पटाखे कितने ‘ग्रीन’? त्योहार की चमक बनाम सांसों का धुआं

Thu, 16 Oct 2025 07:30 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Thu, 16 Oct 2025 07:30 AM IST
विज्ञापन
सार
सामान्य पटाखों में बैरियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्युमीनियम व पोटैशियम नाइट्रेट जैसे रसायन होते हैं, जो जहरीली गैसें छोड़ते हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पटाखों पर रोक लगाकर केवल ‘ग्रीन पटाखों’ को अनुमति दी थी। सीएसआईआर और नीरी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में बिके करीब 70 प्रतिशत ग्रीन पटाखे असली नहीं थे।
 
loader
Festival lights or pollution ash? Learn the truth about green firecrackers
दुकान पर रखे ग्रीन पटाखे। सोशल मीडिया

विस्तार

दीपावली नजदीक आते ही सांसों पर संकट छा जाता है, लेकिन यह भी कड़वा सच है कि दिल्ली और उसके आसपास वायु प्रदूषण तो पूरे साल रहता है। लोग अपनी आदतें बदलने के बजाय आतिशबाजी, तो कभी पराली पर दोष मढ़ते हैं। फिलहाल, उच्चतम न्यायालय ने ग्रीन पटाखों की अनुमति दे दी है। सवाल यह है कि ये पटाखे कितने ग्रीन हैं। सच यह है कि ग्रीन पटाखे भी उतने ‘ग्रीन’ नहीं जितना नाम से लगते हैं।



सामान्य पटाखों में बैरियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्युमीनियम और पोटैशियम नाइट्रेट जैसे रसायन होते हैं, जो जहरीली गैसें छोड़ते हैं। ग्रीन पटाखों में इन्हीं रसायनों की मात्रा कम रखी जाती है। इन्हें भारत सरकार के वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान सीएसआईआर व नीरी (वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान) ने विकसित किया था, ताकि पटाखों से 30 प्रतिशत तक कम प्रदूषण हो। ग्रीन पटाखे तीन किस्म के विकसित किए गए थे। पहली श्रेणी है ‘स्वास’ या ‘सेफ वाटर रिलीजर’। ये जलने पर जल वाष्प छोड़ते हैं, जो धूल के कणों को दबाने में मदद करते हैं। इनमें सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट का उपयोग नहीं होता। ‘स्टार’ को ‘सेफ थरमाइट क्रेकर’ कहा जाता है। इनमें पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर नहीं होता। ये कम शोर के साथ पीएम कणों को कम उत्सर्जित करते हैं। तीसरे ‘सफल’ पटाखे, इनमें पारंपरिक पटाखों में इस्तेमाल एल्युमीनियम की मात्रा को काफी कम रखा जाता है, या मैग्नीशियम जैसे विकल्प का उपयोग होता है।


2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पटाखों पर रोक लगाकर केवल ‘ग्रीन पटाखों’ को अनुमति दी थी। सीएसआईआर और नीरी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में बिके करीब 70 प्रतिशत ग्रीन पटाखे असली नहीं थे। एक किलो ग्रीन पटाखे के जलने से कोई डेढ़ किलो कार्बन डाइऑक्साइड, 200 ग्राम नाइट्रस ऑक्साइड और अमोनिया व क्लोराइड गैसें निकलती हैं, जो हवा में जाकर अम्ल वर्षा की संभावना बढ़ा देती हैं, यानी ‘ग्रीन’ होने के बावजूद ये गैसें जलवायु परिवर्तन में भूमिका निभाती हैं। दरअसल, ग्रीन पटाखे बनाना महंगा होता है। बाजार में ज्यादातर सिर्फ ‘ग्रीन’ का लेबल लगाकर पारंपरिक पटाखे बेचे जाते हैं, तो कुछ लोग अधिक हानिकारक और तेज आवाज वाले पटाखे भी फोड़ते हैं। ऐसे में सरकार और समाज, दोनों को इस दिशा में जागरूक होना होगा कि त्योहार की उजास भी बनी रहे और सांसों पर संकट भी न आए। बीते साल दीपावली के दिन और उसके बाद एक्यूआई पांच सौ के पार पहुंच गया था।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed