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चीन में आर्थिक मंदी का अंदेशा : नीतियों में बदलाव का असर, दूसरे देशों को भी करेगा प्रभावित

Sat, 03 Sep 2022 08:18 AM IST
P. S. Vohra पीएस वोहरा
Updated Sat, 03 Sep 2022 08:18 AM IST
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सार
अगर चीन में वास्तव में मंदी आती है, तो इससे विश्व के कई अन्य मुल्क भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था भी इससे बिल्कुल भी अछूती नहीं रह पाएगी। आज के समय में भारत का चीन के साथ करीब 65 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार है।
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Fear of economic slowdown in China: The effect of change in policies will affect other countries too
China Economic Crisis- China property Market - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

इन दिनों विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों में इस बात की चर्चा है कि चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी की सुगबुगाहट देखी जा रही है। हालांकि इस बात की आधिकारिक घोषणा कहीं भी नहीं है, फिर भी विभिन्न आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर अगर यह पूर्वानुमान सही साबित होता है, तो यह एक वैश्विक आर्थिक समस्या जरूर साबित होगी। चीन विश्व के विनिर्माण क्षेत्र का एक विशाल कारखाना है। 



पिछले कुछ समय से इसके आर्थिक विकास दर में गिरावट एक आर्थिक सबब का विषय बन रही है। इस स्थिति को चार भागों में समझा जा सकता है। प्रथम, कोरोना से पूर्व सब कुछ बिल्कुल ठीक था। दूसरी स्थिति, कोरोना के आगमन के बाद 2020 की जनवरी वाली तिमाही में अर्थव्यवस्था पर भारी चोट लगी तथा जीडीपी 6.8 प्रतिशत नकारात्मक रहा। तीसरी परिस्थिति के अंतर्गत कोरोना की प्रथम लहर के बाद अर्थव्यवस्था ने बड़ी अच्छी तरह से वापसी की। 


अंतिम परिस्थिति ही मंदी की घबराहट का मुख्य आधार बनकर सामने आ रही है, जिसके अंतर्गत जुलाई, 2021 से अब तक लगातार विकास दर में गिरावट देखी जा रही है। चीन की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार वहां का रियल एस्टेट व निर्माण क्षेत्र है। जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा यहीं से आता है। बैंकों की जमाओं का 40 प्रतिशत भाग भी वित्तीय सहायता के रूप में अचल संपत्ति व विनिर्माण क्षेत्र को मिलता है। 

इसके अलावा लगभग 70 प्रतिशत घरेलू बचत का निवेश भी इसी क्षेत्र में जाता है। इसी कारण चीन में हर जगह इमारतों व भवनों का जाल बिछा हुआ है। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से इस क्षेत्र में गिरावट दर्ज हो रही है। इस गिरावट का मुख्य कारण चीन की आर्थिक नीतियों में इसी दौरान हुआ एक परिवर्तन है, जिसके माध्यम से दो-तीन दशकों पूर्व निश्चित की गई नीतियों में बदलाव किया गया। 

अगस्त, 2020 में थ्री रेड लाइन पॉलिसी को चीन की अर्थव्यवस्था में लाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य अचल संपत्ति के विनिर्माण क्षेत्र को नियंत्रित करना था। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन बिंदुओं पर फोकस किया गया, जिसमें कंपनियों के पास उनकी चालू उधारियों के विरुद्ध अच्छे नकद का संग्रहण होना। दूसरा, वित्तीय ऋण व पूंजी (डेट टो इक्विटी रेश्यो) का 100 प्रतिशत से अधिक न होना। 

तीसरा, वित्तीय ऋण व निवेश (डेट टू इन्वेस्टमेंट) का 70 प्रतिशत से अधिक न होना। अब इन्हीं के आधार पर बैंकों से वित्तीय सहायता व ऋण संप्रेषित होता है। इसी कारण चीन में एकाएक पिछले कुछ समय से हाउसिंग सेक्टर के अंतर्गत वृद्धि रुक गई। बहुत सारे प्रोजेक्ट्स अब स्थगित हो गए हैं। लोगों में भी एक विरोध की भावना पैदा होने लगी, क्योंकि उन्हें उनके मकानों का स्वामित्व नहीं मिल रहा है। 

इस कारण वे अपने वित्तीय कर्ज का बैंकों को पुनर्भुगतान नहीं करना चाहते। चीन के मशहूर एवरग्रैंड रियल स्टेट समूह का दिवालिया हो जाना इसी से संबंधित एक कारण है। इस समूह पर करीब 300 अरब अमेरिकी डॉलर का वित्तीय कर्ज था। इसे तकरीबन वर्ष 2007 के अमेरिका के लेहमन ब्रदर्स की असफलता के जैसे ही देखा जा सकता है, जहां से अमेरिका में मंदी की शुरुआत हुई थी। 

अगर चीन में वास्तव में मंदी आती है, तो इससे विश्व के कई अन्य मुल्क भी बुरी तरह से प्रभावित होंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था भी इससे बिल्कुल भी अछूती नहीं रह पाएगी। आज के समय में भारत का चीन के साथ करीब 65 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार है। चीन की मंदी के कारण विभिन्न प्रकार के कच्चे पदार्थों की सप्लाई चेन बुरी तरह से प्रभावित होगी, जिससे भारत के घरेलू बाजार में इसका विपरीत असर देखने को मिलेगा तथा पदार्थों की पूर्ति में कमी होने के कारण घरेलू बाजार में महंगाई एकाएक बढ़ेगी। 

सकारात्मक पक्ष यह देखने को मिल सकता है कि कच्चे तेल के वैश्विक मूल्यों में कमी होगी, क्योंकि चीन विश्व का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है। अक्सर चीन के बारे में यह पाया जाता है कि वह सभी तरह के भ्रम को बड़ी जल्दी तोड़ देता है, क्योंकि उसके सामाजिक व आर्थिक आंकड़े विश्वसनीयता पर कम खरे उतरते हैं। यह सब आनेवाले भविष्य में और निश्चित हो जाएगा। (-लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

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