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वो रो नहीं सकते, पिता हैं..

Sun, 19 Jun 2016 05:21 PM IST
रीवा सिंह/अमर उजाला
रीवा सिंह/अमर उजाला Updated Sun, 19 Jun 2016 05:21 PM IST
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father's day special

मैं चिराग दिल्ली की ओर कहीं जा रही थी। आते-जाते रास्ते में कई लोग और कई तरह के लोग मिलते हैं, मिलने का मतलब दिख जाते हैं। कुछ को देखते ही हम आगे बढ़ते हैं और कुछ को पीछे मुड़कर भी देखते रह जाते हैं। उस दिन मैंने एक पिता को देखा था, वो कुछ ऐसे थे कि मैं आज भी उन्हें याद कर के एक ही पल में पहले जम जाती हूं और फिर पिघल जाती हूं। 

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मेरी गाड़ी के ठीक बगल से उनकी स्कूटर गुज़री। 'हमारा बजाज' की उस पुरानी स्कूटर पर सवार हो वो बड़ी तल्लीनता से आगे बढ़ रहे थे। उनके माथे पर शिकन थी, तनाव था पर उस तनाव के साथ जो आवेश हममें स्वतः ही आ जाता है, वह न था। उन्हें कहीं जाना था, जाने की जल्दी भी थी पर स्कूटर की गति वैसी ही, करीब 30-40 किमी प्रति घंटे। बदन का रंग देखकर लगता था कि कभी गोरा रहा होगा पर ज़िम्मेदारियों भरी चार दशक की धूप ने उन्हें जलाकर ही परिपक्व बनाया और इसलिए अब उनका रंग गेहुएं से भी थोड़ा गाढ़ा ही है। सफेद रंग की शर्ट के साथ काले रंग की पैंट में वो अच्छे लग रहे थे। हां, उन पर वो स्कूटर थोड़ी कम जम रही थी।
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हम में से कई लोग उन्हें देखकर ये भी सोचते कि कोई सरकारी बाबू होंगे और कंजूसी में स्कूटर पर चल रहे हैं; बैंक बैलेंस बनाकर न जाने कहां ले जाएंगे जो ऐसे घूम रहे हैं। मैं उनके हाव-भाव देखकर ऐसा नहीं सोच पायी। उनके चेहरे की झुर्रियां उनके कर्तव्य की गठरी का बोझ बता रही थीं। कभी-कभी झुंझलाकर या वक्त से हारकर उनका भी मन करता ही होगा कि ये सब छोड़कर चले जाएं, पर परिवार को असहाय छोड़कर वो ये भी नहीं कर सकते थे। ये भी कितनी अजीब बात है कि पिता का जन्म ही सहारा देने के लिए होता है। उनके पीछे सबको बहुत यातनाएं होंगी ये सोचकर वो हमेशा आगे खड़े रहते हैं। मुझे उनकी स्थिति देखकर लगा कि ज़रूर ही उनका बेटा किसी कॉलेज से बी. टेक. कर रहा होगा या बिटिया की शादी में उन्हें कार देनी पड़ेगी इसलिए पैसे जोड़ते हुए वे आजतक स्कूटर पर ही रह गए।
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हमें आज स्कूटर दिया जाए तो शायद हम न लें, पर उन्हें उसमें कोई दिक्कत नहीं है; परिवार की हर इकाई को खुश और संतुष्ट रखने की कोशिश में वो खुद की पसंद-नापसंद भूल जाते हैं। भूल ही तो जाते हैं, एक वक्त के बाद दुनिया के हर पापा को लगता है कि ये लाल शर्ट और वो काली शर्ट दोनों ही अच्छी हैं, इनमें से वो कोई भी पहन सकते हैं। ये वही पापा हैं जो दो दशक पहले दो लाल शर्ट में भी पचास तरह के चेक, बॉर्डर और कॉलर की बातें किया करते थे। स्कूटर पर सवार उस पिता का चित्त शांत था, कभी चंचल भी रहे होंगे पर घर की साग-सब्ज़ी के बाद बच्चों के स्कूल-कॉलेज की फीस और फिर उनकी शादी के बीच वो हंसी-मज़ाक से दूर हो गए होंगे; ये सब इतनी धीमीगति में होता है कि न उन्हें ठीक से पता चलता है और न हम ही इसपर ध्यान देते हैं। हम सबके पापा ऐसे ही तो होते हैं।

पानी भी पहले कितना चंचल होता है, फिर उसमें चीनी मिलाई जाती है। चीनी की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे ही पानी में बहाव कम हो जाता है और एक वक्त के बाद वो मीठी चाश्नी बन जाती है; पर इस मीठी चाश्नी में वैसा बहाव नहीं रहता। इसमें इतनी चीनी घुल चुकी होती है कि अब वह चाहे भी तो आसानी से बह नहीं सकती, चीनी का गाढ़ापन उसे रोकता रहता है। उसके बाद उसमें मिठास रह जाती है, पर उस चाश्नी में पानी का अस्तित्व खो जाता है।

जब भी ममता की बात होती है तो मां सर्वोपरि मानी जाती हैं। पापा को हम अक्सर तभी याद करते हैं जब कोई ऐसा काम हो जिसके लिए उनकी सहमति चाहिए। बाहर से घर लौटकर हम मां से सामान्य तौर पर बात करते हैं और शाम को जब पापा पूछते हैं कि दिन कैसा रहा तो सबकुछ ठीक-ठीक बताते हुए भी थोड़े-बहुत औपचारिक हो जाते हैं। हम सभी परिवार के दुलारे होते हैं और इसलिए पिता को अपने आप ही थोड़ा कठोर बनने की नसीहत दी जाती है। उनसे अक्सर तभी परामर्श भी लिया जाता है जब बात पैसे की हो। पापा से शिकायत की जाएगी ये कहकर पूरा परिवार डराता है और इसलिए चाहकर भी हम पिता पर उतना प्यार नहीं उड़ेल पाते जितना कि महसूस करते हैं, सब मन में ही धरा रह जाता है।

वो खुलकर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त नहीं कर सकते। वो रो नहीं सकते, पिता हैं.. समाज ने उन्हें ऐसा बने रहने की हिदायत दी है। हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं पिता को गले लगाकर ये कहना भी भूलने लगते हैं कि हम उनसे बहुत-बहुत प्यार करते हैं। उन्हें जब बहुत प्यार आता है तो भी वो सबकुछ कह डालने की कोशिश में थोड़ा ही कहकर चल देते हैं और अकेले में रुमाल के पोर से अपनी आंखें पोंछ लेते हैं। खुद में ज़िम्मेदारियों की चीनी घोलते-घोलते वो इतने गाढ़े हो जाते हैं कि हमारे सामने खुलकर बह भी नहीं पाते और हम ये मानने लगते हैं कि पापा सीरियस इंसान हैं, वो सबकुछ कह नहीं पाते पर महसूस करते हैं। उनका न कह पाना उनकी पीड़ा और बढ़ा देता है और हमारा ये मान लेना कि वो गंभीर हैं, जाने कैसा महसूस कराता होगा। 


पापा की उंगलियां थामने के बाद एक बच्चे में अपार आत्मविश्वास होता है। उसे पता होता है कि आगे कुछ भी हो पापा संभाल ही लेंगे। हम बड़े होकर भी पापा को उम्मीद भरी नज़रों से देखते हैं, उनकी नज़रों में प्रेम के साथ-साथ आश्वासन भी होता है। ज़रूरत है कि हम नज़रों में थोड़ा और प्यार घोल लें, आसमां को ये बताया जाए कि हमारे ऊपर उसकी छाया है तभी धरती हसीन लग रही है। उस माथे की सिलवटों को होठों पर लाने की कवायद होनी चाहिए। हमारी ये चाहत लाख चाहने के बाद भी पीछे छूट जाती है, पर पिता हमारा सबकुछ समेटे हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

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