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किसान भी पेंशन के हकदार
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भारत डोगरा
कुछ समय से किसान आंदोलनों में नया उभार आया है, नई ऊर्जा आई है, जिसका स्वागत होना चाहिए। देश में कई स्थानों पर किसानों ने अपनी मांगें सरकारों के सामने रखी हैं।
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इतना तो स्पष्ट है कि हमारे देश में किसान इस समय विभिन्न स्तरों पर गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि कृषि के समक्ष न केवल अल्पकालीन संकट, बल्कि दीर्घ-कालीन संकट भी है, जो और भी अधिक व्यापक व गंभीर है। कृषि के जो सबसे बुनियादी आधार हैं, उपजाऊ मिट्टी व पानी तथा नमी की उपलब्धि, वे दोनों ही गंभीर संकट में हैं। देश में अधिकांश स्थानों पर भूजल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है और जहां यह समस्या नहीं है, वहां बाढ़, भूमि-कटाव तथा जल-भराव की अन्य गंभीर समस्याएं हैं।
इसके साथ एक अन्य समस्या जुड़ी हुई है कि अधिकांश महत्वपूर्ण खाद्यों की गुणवत्ता व उनके स्वास्थ्य गुणों में तेजी से गिरावट आ रही है। उचित गुणवत्ता के खाद्य न मिलने से लोगों में अनेक स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं।
ये तीनों समस्याएं अपने स्तर पर गंभीर हैं तथा सबसे उचित राह यह होगी कि ऐसी नीतियां अपनाई जाएं, जिनसे इन तीनों समस्याओं का समाधान एक साथ प्राप्त हो। दूसरे शब्दों में हमें ऐसी समग्र नीतियां अपनानी चाहिए, जिससे न केवल किसानों व कृषि मजदूरों का आर्थिक संकट दूर हो, अपितु कृषि व ग्रामीण विकास में ऐसा टिकाऊ सुधार आए, जिससे मिट्टी व पानी की स्थिति ठीक रह सके और सही गुणवत्ता के खाद्यों का उत्पादन हो सके।
यदि सरकारें अपनी नीतियों को इस समग्रता के आधार पर तय करें तथा किसान आंदोलन भी अपनी मांगों को इस समग्र दृष्टिकोण के आधार पर तैयार करे, तो सरकारी नीति व किसानों की मांगें एक दूसरे के नजदीक आ सकती हैं। इससे टिकाऊ तौर पर किसानों व खेती-किसानी की भलाई होगी, साथ ही पर्यावरण की रक्षा भी होगी।
सरकार को गांवों में जल-संरक्षण करने व स्थानीय प्रजातियों के पेड़ों की हरियाली बढ़ाने, चरागाह सुधारने के लिए भारी निवेश करना चाहिए। जल संरक्षण व बढ़ती हरियाली वह बुनियाद है, जिससे कृषि व पशुपालन में टिकाऊ सुधार संभव होगा। इसी तरह पशुपालन बढ़ाने, कंपोस्ट व जैविक खाद तैयार करने, परंपरागत बीजों को एकत्र करने पर सरकार को अधिक ध्यान देना चाहिए। फसल-चक्र मिट्टी के उपजाऊपन की रक्षा व जल संरक्षण के अनुकूल होना चाहिए। वैज्ञानिकों व किसानों के आपसी सहयोग से पर्यावरण की रक्षा वाली व स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित खाद्य का उत्पादन करने वाली कम खर्चीली कृषि विकसित करने के लिए गांवों में किसान विज्ञान केंद्र स्थापित करने चाहिए। अच्छी गुणवत्ता के खाद्य उत्पादन को किसानों से उचित मूल्य पर स्थानीय मिड-डे मील, आंगनवाड़ी व सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकार को खरीदना चाहिए।
सभी किसानों, खेत-मजदूरों व उनसे जुड़े दस्तकारों (पुरुषों व महिलाओं दोनों) को वृद्धावस्था में कम से कम 3,000 रुपये प्रति माह की पेंशन मिलनी चाहिए। गांव के भूमिहीनों को कुछ न कुछ कृषि भूमि उपलब्ध करवाने का यथासंभव पूर्ण प्रयास होना चाहिए।
दस्तकारों के रोजगार बचाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। परंपरागत व आधुनिक, दोनों तरह के रोजगारों को महत्व मिलना चाहिए। कस्बों व शहरों में ऐसे लघु उद्योग लगाने चाहिए, जो प्रदूषण न फैलाएं। किसानों व खेती-किसानी की सहायता के लिए सरकार को बजट बढ़ना चाहिए।