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कांवड़ यात्रा: आस्था और अनुशासन, प्रशासन-समाज और श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयासों से पूरा होगा यह उद्देश्य

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सार
कांवड़ यात्रा, जो अटूट श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, में कांवड़ियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी तरह से चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
 
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Faith and discipline This objective achieved through joint efforts of administration, society and devotees
कांवड़ यात्रा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में धार्मिक आस्थाएं और उनसे जुड़ी परंपराएं अनादि काल से हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण परंपरा कांवड़ यात्रा है, जो भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। लाखों श्रद्धालु, जिन्हें कांवड़िए कहा जाता है, हर साल सावन के महीने में गंगाजल लेने और उसे शिवलिंग पर अर्पित करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। यह यात्रा आस्था और भक्ति का प्रतीक है और श्रद्धालुओं के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव होती है।



हर साल कांवड़ यात्रा में शामिल होने वाले भक्तों की संख्या बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। हरिद्वार प्रशासन के अनुसार, कांवड़ यात्रा में पिछले साल लगभग पांच करोड़ लोग हरिद्वार पहुंचे। यह कांवड़ यात्रा लगभग 12 दिन तक चलती है। इन 12 दिनों में पांच करोड़ लोगों का हरिद्वार आना बहुत आश्चर्यचकित करता है, इस हिसाब से देखें, तो इन 12 दिनों में औसतन 40 लाख कांवड़िए हर रोज हरिद्वार पहुंचे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि 40 लाख लोगों के हरिद्वार पहुंचने पर हरिद्वार और उसके आसपास लगभग 30-40 किलोमीटर के क्षेत्र में उत्सव-सा माहौल रहता है।


इस उत्सव से स्थानीय लोगों के लिए अस्थायी रोजगार का सर्जन तो होता ही है, वहीं कांवड़ियों की बेतहाशा भीड़ के कारण व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। इसके बावजूद स्थानीय लोग पूरी तन्मयता के साथ कांवड़ यात्रा में अपना सहयोग देते हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में एक अलग-सा ट्रेंड देखने को मिल रहा है, कांवड़ यात्रा के नाम पर कुछ अराजक और उपद्रवी तत्व भी आ जाते हैं। उनके अराजक व्यवहार, नियमों के उल्लंघन और उद्दंडता से विघ्न खड़ा हो जाता है। श्रद्धा की भावना को इससे भारी चोट पहुंचती है।

कांवड़ यात्रा का प्रारंभिक उद्देश्य भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए गंगाजल लाना है। यह यात्रा मुख्य रूप से उत्तर भारत में की जाती है और इसमें हर उम्र और वर्ग के लोग शामिल होते हैं। श्रद्धालु अपने कंधों पर कांवड़ रखकर यात्रा करते हैं, जिसमें दो तरफा बर्तन होते हैं, जिनमें गंगाजल भरा जाता है। यह यात्रा किसी तपस्या से कम नहीं होती और इसमें शामिल होने वाले श्रद्धालु अपनी आस्था और भक्ति को प्रदर्शित करते हैं। आज भी अधिसंख्य कांवड़िए वही हैं, जो सदियों पुरानी स्वस्थ परंपरा का निर्वहन करते हैं। समस्या तो उन  चंद लोगों के कारण उठ खड़ी हुई है, जिनकी संख्या तो थोड़ी है, लेकिन उनका उत्पात और उपद्रव मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ जाता है। ऐसी घटनाओं से न केवल धार्मिक यात्रा का पवित्र उद्देश्य खंडित होता है, बल्कि भय और असुरक्षा का माहौल भी बनता है।

कांवड़ यात्रा के दौरान प्रशासन और पुलिस की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है। उन्हें श्रद्धालुओं की सुरक्षा और यात्रा की सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करनी होती है। जरूरत है संतुलित दृष्टिकोण की, जिससे कांवड़ियों की आस्था का सम्मान भी हो और कानून व्यवस्था भी बनी रहे। कांवड़ यात्रा के नाम पर उपद्रवियों को रोकने में समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन उससे महत्वपूर्ण है, कांवड़ियों का सहयोग। समाज के अन्य वर्गों को भी कांवड़ियों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य और सद्भाव बना रहे। इसके लिए कांवड़ियों और समाज के अन्य वर्गों के बीच संवाद और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे दोनों पक्ष एक-दूसरे की भावनाओं और समस्याओं को समझ सकें। कांवड़ यात्रा के दौरान स्वयंसेवी संगठनों की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए, जो श्रद्धालुओं की मदद कर सकें और व्यवस्था को बेहतर बना सकें।

जलवायु परिवर्तन आज एक वैश्विक समस्या है, पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। बेतहाशा भीड़ के कारण हुए कचरे का निस्तारण भी बड़ी समस्या हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार, केवल हरिद्वार में ही पिछले साल 12 दिन की कांवड़ यात्रा के दौरान लगभग 30 हजार मीट्रिक टन कूड़ा पैदा हुआ था। जब केवल हरिद्वार में ही 12 दिनों में इतना कूड़ा एकत्र हो गया, तो यात्रा-पथ के आसपास की चुनौती का अनुमान लगा सकते हैं। इसके लिए सामूहिक प्रयास से प्लास्टिक के उपयोग को कम करना, कचरा प्रबंधन और ध्वनि प्रदूषण का समाधान निकाला जाना जरूरी है। कांवड़ यात्रा एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जो श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का प्रतीक है। आस्था और अनुशासन एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रशासन, समाज और श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयासों से ही इस पवित्र उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।

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