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रईसों के घर से शहर नहीं बनते

Sat, 23 Mar 2013 10:26 PM IST
थॉमस हेदरविक/विख्यात डिजाइनर
थॉमस हेदरविक/विख्यात डिजाइनर Updated Sat, 23 Mar 2013 10:26 PM IST
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experiences of thomas heatherwick

भला ये भी कोई बात हुई कि एक डिजाइनर को ही अपने बनाए हुए डिजाइन पसंद नहीं हैं! लोग इस पर मुझसे सवाल पूछते हैं। वर्ष 2012 में हुए लंदन ओलंपिक में विजुअल्स और इंजीनियरिंग में अपने हुनर को जब मैंने दुनिया के सामने रखा तो लोग हैरान थे।

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लेकिन इस दौरान बनाई गई अपनी कुछ कलाकृतियों के डिजाइन से मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। तांबे से बनी 204 पंखुड़ियों वाली ‘ओलंपिक फ्लेम कॉल्ड्रन’ भी उन्हीं में से एक थी। इसकी हर पंखुड़ी ओलंपिक में शामिल हर देश के प्रतीक के तौर पर लगाई गई थी। ये पत्तियां कुछ इस तरह लगी थीं कि ओलंपिक फ्लेम की एकीकृत लौ ऊपर उठे, जिससे उम्मीद और शांति का संदेश दिया जा सके।  
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मुझे बचपन से ही यह जानने में बड़ी दिलचस्पी रहती थी कि आखिर ऊंची-ऊंची इमारतें कैसे बनती हैं और शहरों की योजना कैसे बनाई जाती है। 21 वर्ष की उम्र में पहली बार मैंने किसी बिल्डिंग पर अपने आइडिया को कलात्मक अंदाज में उकेरने की कोशिश की।
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‘मैनचेस्टर मैट्रोपलिटन यूनिवर्सिटी’ से 3डी डिजाइन और ‘रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट’ से फर्नीचर डिजाइन का अध्ययन मेरे बहुत काम आया। यहीं से कला की बारीकियां सीखने को मिलीं और कई नामचीन कलाकारों, डिजाइनरों और वास्तुशिल्प के जानकारों से मुलाकात भी हुई। इंग्लिश डिजाइनर सर टेरेन्स कॉनरेन भी उन्हीं में से एक हैं। मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपने बनाए गए डिजाइनों में इंजीनियरिंग और मैटेरियल्स का खास तालमेल पेश कर सकूं। शायद इन्हीं कारणों से कॉनरेन ने मुझे ‘अपने जमाने के लियोनार्डो द विंसी की संज्ञा दे डाली।’
 
1994 में जब मैंने ‘हेदरविक स्टूडियो’ की स्थापना की तो सिलसिलेवार काम होने लगा। इसके बाद 1997 में लंदन फैशन वीक के दौरान ‘हार्वी निकोल्स डिपार्टमेंट स्टोर विंडोज’ में मेरे काम को खूब सराहा गया। 2010 में ‘शंघाई एक्सपो’ में बने ‘यूके पैवेलियन’ से लेकर लंदन की नई ‘रूटमास्टर डबल-डैकर बसों’ को नया रंग-रूप देने के बाद आज मुझे काफी खुशी होती है।

मुंबई में आयोजित ‘डिजाइन फोरम’ में हिस्सा लेने के लिए मैं यहां आया हूं। इस शहर को देखने के बाद फिर से अपनी उसी बात को दोहराना चाहूंगा, जो पहले भी मैं कहता रहा हूं। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में व्यावहारिक सिटी प्लानिंग बेहद जरूरी है। अतीत को संजोए रखने और भविष्य के चरित्र को बनाए रखने के लिए यह अति आवश्यक है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘म्यूजियम्स और रईसों के आलीशान घरों के बजाय शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर ही उसे खास बनाता है। लेकिन कभी मिलों का शहर रहा मुंबई भी अब कांच के शीशे की बिल्डिंगों में ढलता जा रहा है।

अब लोगों के दृष्टिकोण में भी एक बदलाव आया है। खुद को एक से अधिक विषयों का मास्टर बताना आजकल फैशन हो गया है। आप जो कुछ भी सोचते हैं, उसे व्यक्त करने का आत्मविश्वास आपकी ट्रेनिंग से भी महत्वपूर्ण होता है।


एक धारणा बन गई है कि कोई भी कलाकृति बनाने से पहले डिजाइनर को कल्पना के धरातल पर उतरना पड़ता है। लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि एक अच्छा आइडिया कभी भी दिमाग में आ सकता है।

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