नाकेबंदी के बावजूद सरहद पार हिंदी
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हर साल हिंदी दिवस पर हम अपने देश में राजभाषा की स्थिति पर आंसू बहाते हैं, लेकिन उसका कोई सकारात्मक असर आज तक दिखाई नहीं पड़ा है। इसके बावजूद यदि हिंदी आगे बढ़ रही है, तो अपने बाजार की वजह से। और बाजार का असर सरहदों के पार भी दिखाई देता है। हमारा मीडिया हिंदी को देश के कोने-कोने तक ही नहीं, पड़ोसी मुल्कों में पहुंचाने में भी कामयाब हुआ है। क्या नेपाल, क्या पाकिस्तान और क्या बांग्लादेश, वहां के लोगों के मन से हिंदी के प्रति द्वेष अब गायब हो रहा है। यह हिंदी के लिए गौरव की बात है, लेकिन यहीं से चिंता की भी शुरुआत होती है। क्योंकि यदि वहां की जनता हिंदी को अपनाना चाहती है, तो सरकारें हिंदी की इस बढ़त से घबराई हुई हैं।
पिछले दिनों पाकिस्तान के इंटरनेट अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने एक खबर चलाई, ‘क्या हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा बन चुकी है? दरअसल दक्षिणी वजीरिस्तान के कैडेट कॉलेज के लिए बच्चों की भर्ती हो रही थी। एक फौजी अफसर बच्चों से उर्दू में सवाल पूछ रहा था, तुम फौज में भर्ती होना क्यों चाहते हो? एक कबाइली बच्चा बोला, सर, मैं अपने देश की रक्षा करना चाहता हूं। उसका जवाब सुन अफसर सन्न रह गया। उसे समझ में नहीं आया कि एक पश्तो भाषी बच्चा इतनी शुद्ध हिंदी, वह भी एकदम सहज-स्वाभाविक अंदाज में, कैसे बोल गया? वास्तव में यह हिंदी मीडिया, हिंदी फिल्म, हिंदी क्रिकेट कमेंटरी और कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों का कमाल था।
मुझे इसका एहसास 1999 के दिसंबर में हुआ, जब एक समाचार चैनल के न्यूजरूम में बैठा मैं कंधार हवाई अड्डे से खैबर नाम के एटीसी को हिंदी में जवाब देते सुन रहा था। दरअसल पिछले 10-15 वर्षों में हमारा टेलीविजन पश्चिमी पाकिस्तान का एकमात्र मनोरंजन-माध्यम बनकर उभरा है। फ्री टु एयर चैनलों में दिखाए जाने वाले कार्टून वहां के बच्चों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं। हिंदी इसी तरह गैर उर्दूभाषी पाकिस्तानी इलाकों में घर-घर में पैठ बना रही है। हालांकि वे समझते हैं कि शायद यही उर्दू है। पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू जरूर है, लेकिन पश्तो या बलोची या सेरायकी भाषी इलाकों में उर्दू के प्रचार-प्रसार की कोई खास कोशिश नहीं हुई। इसलिए उर्दू जैसी लगने वाली हिंदी भारतीय चैनलों के जरिये पाकिस्तान के इन इलाकों में पहुंची। चूंकि यह किसी दबाव में नहीं हुआ, लिहाजा लोगों ने इसे दिल खोलकर अपनाया।
आज पाकिस्तानी युवाओं में उर्दू के बजाय हिंदी ज्यादा लोकप्रिय हो रही है। वे हिंदी और उर्दू को मिलाकर ‘हमारी बोली’ नाम की नई भाषा गढ़ने की वकालत करने लगे हैं। इसे लेकर पाकिस्तान की सरकार, आईएसआई और कट्टरपंथी ताकतें खासी परेशान हैं। गौरतलब है कि आजादी से पहले जो लाहौर हिंदी का गढ़ था, आज वहां हिंदी पढ़ना जुर्म जैसा है। वहां के एकमात्र राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी में डिप्लोमा की पढ़ाई होती है। लेकिन उसमें आम आदमी दाखिला नहीं ले सकता, केवल आईएसआई या अन्य खुफिया एजेंसियों के मुलाजिम ही यह पढ़ाई कर सकते हैं।
पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश में हिंदी का प्रचार-प्रसार कम रहा है। पर अब वहां भी नई पीढ़ी में हिंदी अपनी पैठ बना रही है। हिंदी के कार्टून चैनल वहां भी घर-घर में देखे जा रहे हैं। हालांकि ये चैनल या तो पश्चिमी या जापानी कार्टूनों की नकल होते हैं या हिंदी में डब किए होते हैं, इसलिए इनमें भारतीय आत्मा गायब होती है। लेकिन कार्टून चैनल वालों के लिए बिना ज्यादा खर्च किए पूरे उपमहाद्वीप में यदि किसी एक भाषा के जरिये आप बच्चों के मन-मस्तिष्क पर राज कर सकते हैं, तो वह हिंदी ही है। बांग्लादेश में डोरेमोन नाम का कार्टून बच्चों को दीवाना बना रहा था। उसे देखते हुए वहां की सरकार को उस कार्टून पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करनी पड़ी। खास बात यह है कि ढाका ने ‘हिंदी' में डब किए हुए डोरेमोन पर प्रतिबंध लगाया, अंग्रेजी वाली पर नहीं, क्योंकि हिंदी से उन्हें खतरा था कि कहीं यह उनके घरों में न घुसने लगे। वहां हिंदी टीवी सीरियलों का भी विरोध हो रहा है।
हमारे तीसरे पड़ोसी नेपाल की स्थिति एकदम भिन्न है। वहां हिंदी की जड़ें काफी गहरी हैं, फिर नेपाली भी हिंदी की एक उपभाषा के रूप में ही देखी जाती है। इसके बावजूद वहां हिंदी विरोध जब-तब सियासी मुद्दा बन जाता है। नेपाल के राष्ट्रपति द्वारा हिंदी में शपथ लेने और वहां के अन्य दलों द्वारा उन्हें रोकने की जिद हो या रितिक रोशन के नाम पर हिंदी फिल्मों का विरोध, कब वहां हिंदी-विरोध का तवा गरम हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता।
यानी हमारे इन तीन पड़ोसी देशों में हिंदी को उसी तरह देखा जा रहा है, जैसे कभी तमिलनाडु में देखा गया था। हिंदी अपनी सहज प्रवृत्ति के साथ इस उपमहाद्वीप की संपर्क भाषा के रूप में आगे बढ़ रही है, लेकिन वहां के सियासतदां उसमें साम्राज्यवाद की बू सूंघ रहे हैं। वे हमारे उस पड़ोसी देश से कुछ नहीं सीख रहे, जो हमारी उत्तरी सीमा पर हमें जब-तब धमकाता रहता है, लेकिन अपने देशवासियों को निरंतर हिंदी सीखने के लिए प्रेरित कर रहा है। जी हां, चीन में आजकल हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। इसलिए नहीं कि वे हिंदी से आतंकित हैं, बल्कि इसलिए कि हिंदी की ताकत का पल्लू थामकर वे भारतीय बाजार पर कब्जा जमाना चाहते हैं। यानी हमारे पड़ोसी देश हिंदी का या तो दोहन कर रहे हैं या उसे रोक रहे हैं। लेकिन यहीं सवाल उठता है कि हम क्या कर रहे हैं।