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जरूरी सवाल: कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका पर राष्ट्रपति के सवाल अभूतपूर्व; शासन के अंगों के बीच कुछ सीमा जरूरी

Fri, 16 May 2025 05:31 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 16 May 2025 05:31 AM IST
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सार
शीर्ष अदालत के तमिलनाडु में राज्यपाल की अनुमति के बगैर ही विधेयकों को पारित करने के फैसले पर अभूतपूर्व प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो 14 सवाल उठाए हैं, वे बेहद जरूरी हैं और न्यायपालिका की भूमिका के मद्देनजर शासन के अंगों के बीच कुछ सीमाओं की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।
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executive vs judiciary President Murmu questions unprecedented boundaries between organs of governance vital
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू - फोटो : ANI

विस्तार

तमिलनाडु के राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए राज्य के विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले पर अभूतपूर्व प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत से जो 14 सवाल पूछे हैं, वे सांविधानिक शक्तियों के संतुलन को लेकर गहन बहस को तो जन्म देते ही हैं, साथ ही, विधायी प्रक्रिया में कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।



उल्लेखनीय है कि संविधान का अनुच्छेद 143 (1) राष्ट्रपति को कानूनी और सार्वजनिक महत्व के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की राय लेने की अनुमति देता है। भारत का संविधान राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों की समीक्षा और मंजूरी के लिए कुछ विवेकाधीन शक्तियां देता है, ताकि वे यह सुनिश्चित कर सकें कि विधायी प्रक्रिया परिसंघीय और सांविधानिक मूल्यों के अनुरूप हो। ऐसे में, राष्ट्रपति का यह सवाल बिल्कुल तार्किक है कि क्या न्यायिक आदेशों के जरिये राष्ट्रपति या राज्यपालों के विवेकाधीन अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।


दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि राज्यपाल की तरफ से भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। इस पर राष्ट्रपति की यह आपत्ति बिल्कुल जायज है कि क्रमश: राज्यपालों और राष्ट्रपति पर लागू होने वाले संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 में ऐसी किसी समय-सीमा का उल्लेख नहीं है। विधेयकों को मंजूरी देने में विलंब कोई आज की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही समस्या है, खासकर उन राज्यों में, जहां केंद्र से भिन्न दलों की सरकारें रही हैं।

सर्वोच्च अदालत का तीन महीने की समय-सीमा वाला फैसला इस समस्या के समाधान का प्रयास बताया जा रहा था, लेकिन राष्ट्रपति के सवाल उचित ही इशारा करते हैं कि इस तरह के समाधान सांविधानिक ढांचे के भीतर होने चाहिए, न कि न्यायिक हस्तक्षेप के जरिये। तमिलनाडु के मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ ने अनुच्छेद-142 की विशेष शक्तियों को आधार बनाते हुए राज्यपाल की अनुमति के बगैर ही जिस तरह से विधेयकों को मंजूरी दी थी, वह न्यायपालिका के कार्यपालिका से टकराव का स्पष्ट उदाहरण है।

राष्ट्रपति मुर्मू के 14 सवाल उन सीमाओं की जरूरत को इंगित करते हैं, जो इस टकराव की आशंकाओं के मद्देनजर जरूरी हो जाती हैं। इस संदर्भ में अब इन सवालों के जवाब देने के साथ यह भी जरूरी है कि नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई एक ऐसा रास्ता निकालें, जो संविधान के सिद्धांतों का सम्मान करे और विधायी प्रक्रिया में भी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करे। 

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