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दुनिया का हर आठवां आदमी भूखा है

Mon, 04 Nov 2013 09:19 AM IST
कुमार विजय
कुमार विजय Updated Mon, 04 Nov 2013 09:19 AM IST
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every eighth man in world is hungry

पूरे विश्व में आज भी करोड़ों की संख्या में लोग भोजन जैसी जीवन की बुनियादी जरूरत वंचित हैं। वैसे पिछले दो वर्षों में भूख से हुई मौतों की संख्या में कमी आई है। लेकिन यह इतना कम भी नहीं है।

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संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में दुनिया की 84 करोड़ 20 लाख आबादी को पर्याप्त भोजन नहीं मिला है।

यानी मानव समाज के करीब 12 फीसदी लोगों को उसकी जरूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिल पा रहा। अन्य शब्दों में कहें, तो दुनिया का हर आठवां आदमी भूखा है।

इस भूख की वैसे तो कई वजहें हैं। लेकिन एक मुख्य वजह है, खाद्यान्न की बर्बादी। विगत 16 अक्तूबर यानी विश्व खाद्य दिवस पर संयुक्त राष्ट्र ने खाद्यान्न की बेइंतहा बर्बादी के प्रति चेतावनी जारी की।
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वैसे तो जनसंख्या का बड़ा हिस्सा विकासशील देशों में रहता है। लेकिन यह आंकड़ा कोई कम चौंकाने वाला नहीं कि विकसित देशों में 1 करोड़ 57 लाख लोग भूखे हैं।

भारत की बात करें, हमारे देश ने भूख को चुनौती देने के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है। लेकिन अभी लंबा सफर तय करना है। वर्ष 1990 में देश के 31.6 फीसदी लोग भूखे थे। इस साल यह आंकड़ा घटकर 21.3 प्रतिशत रह गया है।
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इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि दुनिया में जितना खाद्यान्न उत्पादन होता है, उसका एक तिहाई यानी करीब 1.3 अरब टन खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। जितना अनाज बर्बाद होता है, उससे तीन अरब लोगों का पेट भरा जा सकता है!

कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में खाद्यान्न बचाओ मुहिम या द जीरो हंगर चैलेंज की शुरुआत की, क्योंकि यहीं पर भूखे लोगों की सर्वाधिक संख्या है।

इस मुहिम की वजह है। दरअसल, 2008 में खाद्यान्न का मूल्य बढ़ जाने के कारण पूरी दुनिया को संकट का सामना करना पड़ा था।

वर्ष 2009 में दुनिया में भूखे लोगों की संख्या एक अरब से अधिक थी। दूसरी ओर, बढ़ती जनसंख्या और लोगों के बढ़ती आय के कारण खाद्यान्न की बढ़ती मांग पूरी करना, जिसमें मांस की मांग महत्वपूर्ण है, भी एक चुनौती है। आबादी बढ़ने के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ पहले से ही बढ़ता जा रहा है।

ऐसे में मांस की बढ़ती मांग पूरी करना कठिन है, क्योंकि पशुपालन के लिए चारा, पानी और जगह की आवश्यकता होती है। पशु जल्दी बड़ा हो, उससे अधिक मांस प्राप्त हो, उसके लिए उसे अनाज भी खिलाया जाता है। इंसानों को पेट भरने के लिए अनाज नहीं मिल रहा, लेकिन पशुओं को अनाज खिलाया जा रहा है।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का अनुमान है कि 2050 तक खाद्यान्न उत्पादन में 60 फीसदी तक बढ़ोतरी होगी। साथ ही, यह भी कहा गया है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद 2050 तक दुनिया में 45 करोड़ लोग भूखे होंगे।

ऐसे में भूख से लड़ने का एक बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि हम खाद्यान्न की बर्बादी और घाटे को रोकें। खाद्यान्न की बर्बादी कुदरती संसाधनों, जैसे पानी और जमीन की बर्बादी है। एक हद तक यह हमारे अक्षम खाद्यान्न तंत्र का भी प्रतीक है।

अपने यहां सरकारी स्तर पर भूख और कुपोषण से मुक्ति के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। हमारे देश में वैसे तो खाद्यान्न उत्पादन कम नहीं है, लेकिन जितना अनाज बर्बाद हो जाता है, उससे करोड़ों लोगों को साल भर खाना मिल सकता है।

दूध, फल, सब्जी और मांस के उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में खास स्थान रखता है। लेकिन यहां 18 से 40 फीसदी तक खाद्यान्न खेत और बाजार तक पहुंचाने के बीच बर्बाद हो जाता है।


इस बर्बादी को कैसे बचाया जाए? इसके लिए खेतों में हाथ से जो काम किया जाता है, उसमें दक्षता लाने की जरूरत है।

इसके अलावा खाद्यान्न संग्रह की बेहतर व्यवस्था हो। आज इस क्षेत्र में देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोल्ड स्टोरेज चेन और वातानुकूलित वाहनों की है।

हमारे पास केवल दो फीसदी कृषि उत्पादों को ही वातानुकूलित पर्यावरण में रखने की क्षमता है, जबकि उत्तरी अमेरिका और यूरोप के पास 85 प्रतिशत कृषि उत्पादों को वातानुकूलित पर्यावरण में रखने की क्षमता है।

अगर कोल्ड स्टोरेज चेन की बेहतर व्यवस्था हो, तो फलों और सब्जियों की बर्बादी में कमी आएगी।

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