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समाज : कट्टरपंथी और मजहबी समूहों के नापाक इरादों का खामियाजा भुगततीं महिलाएं

Mon, 10 Apr 2023 06:48 AM IST
taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 10 Apr 2023 06:48 AM IST
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सार
इस आधुनिक दौर में भी कुछ कट्टरपंथी और मजहबी समूह अज्ञान और अंधविश्वास का अंधेरा फैला रहे हैं, जिसका नतीजा महिलाओं को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है। बांग्लादेश इसका ज्वलंत उदाहरण है।
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Even in modern era some fanatics and religious groups spreading darkness of ignorance and superstition
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सभी धर्मों, संस्कृतियों और समाजों में परिवर्तन आता है। परिवर्तन के बगैर धर्म, संस्कृति और समाज-सब बंद जलाशय की तरह हो जाते हैं। जैसे जलाशय के पानी को सड़ने से बचाने के लिए उसे खुला रखना होगा, उसी तरह पुरानी मानसिकता को भी बदलने की जरूरत पड़ती है। सोच को आधुनिक बनाने के लिए उसे विचारों की छोटी परिधि से निकालकर खुला आकाश देने की आवश्यकता है। पृथ्वी के सभी समाजों में हमने व्यापक बदलाव देखा है। लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सभी समाजों में कुछ न कुछ लोग ऐसे हैं, जो परिवर्तन के विरोधी हैं। जिस समाज में बदलाव-विरोधी लोग कम हैं, वह समाज तेजी से प्रगति करता है। पर जिस समाज में बदलाव-विरोधी लोग ही ज्यादा हैं, वह समाज आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए बार-बार बाधाग्रस्त होता है।



एक समय यूरोप के ईसाई पादरी ईश्वर के बारे में सवाल करने वाले लोगों को फांसी पर चढ़ा देते थे। आज वही पादरी मनुष्यता को महत्व देकर अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। उन पादरियों का वैसा महत्व और वर्चस्व अब नहीं है। हिंदू समाज में एक समय सती प्रथा अस्तित्व में थी। उस दौर में पति की मृत्यु के बाद पत्नी के जीने का कोई औचित्य नहीं था। लेकिन आगे बढ़ने की प्रक्रिया में हिंदू समाज में सती प्रथा खत्म हो गई।


मुस्लिम समाज एक समय बहुत सारे मामलों में अग्रणी था। आज कम ही लोग इस पर विश्वास करेंगे। लेकिन एक समय आया, जब इस समाज ने खुद को बंद कर लिया। इसका नतीजा यह है कि आज यह समाज बहुत पिछड़ा हुआ है। प्रगति के पहिये को रोककर रखने से समाज का जितना नुकसान होता है, व्यक्ति का नुकसान उससे कम नहीं होता। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी पृथ्वी आधुनिक सभ्यता की ओर अग्रसर है। लेकिन आज भी कट्टरपंथी और कुछ मजहबी समूह अज्ञानता और अंधेरा फैला रहे हैं।

मनुष्यों को अज्ञान के अंधकार में रखना ही इन लोगों और समूहों की मंशा है। इन्हें थोड़ी भी रोशनी बर्दाश्त नहीं। मैंने पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में बात करते सुना था। उन्होंने कहा था, 'हिंदू-मुस्लिम एकता में बाधा खड़ी की जा रही है, क्योंकि कुछ लोगों को लगता है कि हिंदू और मुसलमान अलग हैं। असल में ये एक हैं। इनका डीएनए एक है। ये सभी भारतीय हैं।' मैं सोचती हूं कि क्या बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी या हिफाजत-ए-इस्लाम जैसे संगठन हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में ऐसी बात कर सकते हैं! क्या वे यह कह सकते हैं कि 'बांग्लादेश एक लोकतांत्रिक देश है, जहां किसी मुस्लिम का वर्चस्व नहीं होगा, किसी हिंदू का भी वर्चस्व नहीं होगा। विधर्मी कहकर जो लोग अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाते हैं, वे वास्तविक मुसलमान नहीं हैं। जो लोग कहते हैं कि हिंदू इस देश के नहीं हैं, वे भी मुसलमान नहीं हैं।'

बांग्लादेश के ये संगठन, जाहिर है, ऐसी बात नहीं कर सकते, क्योंकि वे बदलाव के आकांक्षी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बांग्लादेश के समाज में इसी तरह अशिक्षा, पिछड़ेपन और कट्टरवाद का बोलबाला रहे। वहां की बहुसंख्यक आबादी धार्मिक ही नहीं है, बल्कि वहां अति धार्मिक लोगों की संख्या भी आजकल बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरवाद बढ़ने का नतीजा यह है कि अल्पसंख्यक आबादी लगातार निशाने पर है। और सिर्फ अल्पसंख्यक आबादी ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश में उदार सोच वाले सभी लोग निशाने पर हैं। जाहिर है, वहां जब तक बहुसंख्यक कट्टरवादियों की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक वास्तविक बदलाव की उम्मीद नहीं है।

धर्मनिरपेक्ष या वैज्ञानिक चेतनासंपन्न लोग धार्मिक कट्टरवाद के खात्मे के साथ-साथ स्त्रियों को उनका अधिकार दिलाने के भी आकांक्षी हैं। यह समान नागरिक संहिता के जरिये ही हो सकता है। मैं अगर बांग्लादेश की बात करूं, तो वहां मुस्लिम पारिवारिक कानून में महिलाओं के साथ भेदभाव बहुत है। ऐसे ही, हिंदुओं के सिविल कानून हिंदू शास्त्रों पर आधारित हैं, नतीजतन वहां की हिंदू महिलाओं को भी वास्तविक अधिकार नहीं हैं। समान अधिकार की बुनियाद पर नागरिक संहिता वहां पहले ही लागू हो जानी चाहिए थी। लेकिन किसी भी सरकार ने इस दिशा में ध्यान ही नहीं दिया।

मुश्किल यह है कि बांग्लादेश में आज धार्मिक कट्टरवाद का ऐसा बोलबाला है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए नागरिक संहिता बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती। जबकि कुछ दशक पहले तक यह संभव हो सकता था। इससे साफ है कि समाज में कट्टरवाद बढ़ता है, तो उसका सर्वाधिक खामियाजा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। ऐसे ही बांग्लादेश की हिंदू महिलाएं तलाक का अधिकार चाहती हैं। वहां उन्हें इसका अधिकार नहीं है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों के बारे में जो संगठन सक्रिय हैं, वे भी अपने समाज की महिलाओं के हितों की बात नहीं करते। दूसरी ओर, भारत और नेपाल में बहुसंख्यक हिंदू महिलाओं को तलाक देने और विधवा होने पर विवाह करने का अधिकार है। इसी से समझा जा सकता है कि बांग्लादेश में कट्टरवाद का खामियाजा सभी महिलाएं भुगत रही हैं, यह किसी एक समाज तक सीमित नहीं है।

बांग्लादेश में तमाम महिलाओं के शोषित होने का बड़ा कारण यह है कि कट्टरवाद का वहां सभी समाज और वर्ग की लड़कियों, स्त्रियों पर असर पड़ा है। जिस समाज में महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर होती हैं, उस समाज में तलाक के मामले बढ़ते हैं, क्योंकि ऐसी महिलाओं में आत्मसम्मान की भावना बढ़ती है और वे पुरुषवर्चस्ववाद की प्रवृत्ति को सहन नहीं करतीं। यह बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन अस्वाभाविक यह है कि शिक्षित पुरुष वर्ग इतना सजग नहीं हो पा रहा कि स्त्रियों के अधिकारों के पक्ष में खड़ा हो, महिलाओं को गरिमा और प्रतिष्ठा दे सके। उनके लिए सड़कों पर उतर सके। जबकि अतीत में स्त्रियों को उनका हक दिलाया गया, तो वह पुरुषों की पहल से ही संभव हो सका था।

आज समाज में बढ़ती कट्टरता महिलाओं के लिए घातक साबित हो रही है। वह दिन कब आएगा, जब स्त्रियों को पुरुष दासी नहीं, सहयात्री समझेगा! जब तक वह दिन नहीं आएगा, तब तक स्त्रियों की मुक्ति संभव नहीं है।

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