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अविनाशी संगीत: कुमार गंधर्व की प्रतिभावान बेटी कलापिनी कोमकली की जीवंत प्रस्तुति, पिता की तीन रचनाओं से शुरुआत
Sun, 20 Oct 2024 06:04 AM IST
शुभम कुमार
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा
Published by: शुभम कुमार
Updated Sun, 20 Oct 2024 06:04 AM IST
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कुमार गंधर्व के अविनाशी संगीत
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विस्तार
एक वक्ता को मिलने वाला सबसे अच्छा उपहार वह है, जो उसे भाषण के बाद मिलता है। हालांकि ऐसे उपहार अक्सर भारी और बेकार होते हैं। उदाहरण के लिए, लकड़ी की ढलाई के साथ धातु की प्लेट पर अंकित मेजबान संस्थान का नाम और लोगो होता है। कभी-कभी ऐसे उपहार लुभावने भी होते हैं, जैसे कि फूलों का गुलदस्ता, हालांकि अगर बात बंगलूरू के अलावा किसी अन्य जगह की हो तो घर पहुंचने से पहले ही फूल मुरझा जाते हैं।सार्वजनिक जीवन के तीन दशकों में सबसे अच्छा ‘घर वापसी उपहार’ जो मुझे मिला, वह साल 2000 में मेरी मातृ संस्था दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संस्थान का था।
मैं यह तो भूल गया कि मुझे किस चीज के लिए अवार्ड मिला था, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि इसके खत्म होने के बाद मुझे मेजबान से क्या मिला था। यह कुमार गंधर्व के संगीत का आठ खंडों वाला सीडी सेट था। यह उपहार संस्थान की निदेशक प्रो. अनीता रामपाल ने मेरे लिए चुना था। उन्हें शायद याद होगा कि जब वह और मैं 1970 के दशक में छात्र थे, तब मैं अक्सर उनके प्रेमी (बाद में पति) भौतिक विज्ञानी विनोद रैना की कंपनी में होने वाले शास्त्रीय संगीत समारोहों में जाता था। इनमें से एक संगीत कार्यक्रम कुमार गंधर्व का भी था।
उनके साथ उनकी पत्नी वसुंधरा कोमकली भी थीं। यह कार्यक्रम मंडी हाउस के पास फिक्की ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया था। दोनों ने पूरे दो घंटे तक कुमार जी के लिखे भजन गाए और साथ ही लोक धुनें भी गाईं, जिन्हें उन्होंने संगीत कार्यक्रम के मंच के लिए तैयार किया था। यह कार्यक्रम अद्भुत था, बिल्कुल जादुई। हालांकि मैं अंतिम पंक्तियों में बैठा था, बावजूद इसके संगीत की मधुरता मुझ तक अच्छी तरह पहुंची।
अनीता रामपाल ने जो सीडी मुझे उपहार में दी थी, उसमें कुमार गंधर्व द्वारा उस दिन गाए गए कुछ भजनों के अलावा उनके द्वारा रचित रागों की कुछ शानदार लघु प्रस्तुतियां थीं। हमीर और शंकरा जैसे रागों में लंबे ख्याल थे। इसके अलावा उनसे विशिष्ट रूप से जुड़ी बंदिशें भी थीं, जैसे राग नंद में ‘राजन अब तो आ जा रे’। मुझे विशेष रूप से पटमंजरी में पंद्रह मिनट का शानदार ख्याल पसंद आया, जो आजकल कम ही गाया-बजाया जाता है। पहली बार इन्हें प्राप्त करने के बाद एक दशक तक मैंने इन सीडी को घर पर बार-बार सुना।
वर्ष 2010 में या उसके आसपास मैंने एक आई पॉड खरीदा और इन सभी गानों को उसमें संगृहीत कर लिया। अब इन्हें विशेष रूप से लंबी उड़ानों पर सुनता हूं। इनमें प्रसिद्ध निर्गुण भजनों सहित एक भी गीत ऐसा नहीं था, जिसे कुमार गंधर्व ने स्वयं नहीं लिखा था, लेकिन ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ गाने के साथ वे बेहद करीब से जुड़े हुए थे। मैं कुमार गंधर्व के सभी गायन से परिचित हूं, लेकिन ‘जमुना किनारे’ से मेरा एक व्यक्तिगत संबंध है। मेरा जन्म और पालन-पोषण देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के परिसर में हुआ। मेरे माता-पिता का घर परिसर के उत्तरी छोर पर टोंस नामक नदी के किनारे एक पहाड़ी की चोटी पर था। स्थानीय बोली में इस नदी को 'तांस' के रूप में उच्चारित किया जाता है।
पश्चिमी उत्तराखंड में कई नदियों के लिए यह नाम इस्तेमाल किया जाता है। वैसे भी, एफआरआई में मेरे घर से दिखने वाली टोंस नदी पश्चिम की ओर बहती हुई आसन नदी से मिलती है, जो कुछ मील आगे पश्चिम में यमुना नदी से मिलती है। इसलिए मैं क्षमा योग्य अतिशयोक्ति के साथ यह दावा करूंगा कि ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ है। मेरा गांव इस महान और अत्यधिक प्रिय नदी की एक सहायक नदी के तट पर स्थित है और जिस पारिवारिक यात्रा ने हमें सबसे अधिक खुशी दी, वह पवित्र सिख तीर्थस्थल पांवटा साहिब की यात्रा थी, जहां से जमुना तेजी से बहती हुई पहाड़ियों से मैदानों की ओर उतरती है।
कुमार गंधर्व का ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ का गायन यूट्यूब पर आसानी से उपलब्ध है। मुझे एक मुश्किल बैठक में भाग लेने से ठीक पहले इसे सुनना पड़ा। कभी-कभी मैं कुमार गंधर्व की जगह उनके बेटे को सुनना अधिक पसंद करता हूं। मुकुल शिवपुत्र ने ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ को अलग-अलग तरीकों से गाया है। यह लंबा, धीमा और अधिक ध्यान देने योग्य है। मुकुल जी का काफी संगीत यूट्यूब पर उपलब्ध है, जो उनकी अपनी अनोखी, अथाह और शायद अदम्य प्रतिभा को उजागर करता है। मैं उनके ‘जयजयवंती’, ‘केदार’ और ‘खमाज’ से भी बहुत प्रेम करने लगा हूं।
इस महीने की शुरुआत में मैंने ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ लाइव सुना, जिसे कुमार गंधर्व की बेहद प्रतिभाशाली बेटी कलापिनी कोमकली ने गाया था। बंगलूरू में उनका संगीत कार्यक्रम उनके पिता के जन्म शताब्दी समारोह का हिस्सा था। कार्यक्रम की शुरुआत कुमार जी के जीवन के विभिन्न चरणों और संदर्भों में ली गई तस्वीरों के एक संक्षिप्त स्लाइड शो के साथ हुई। इसमें मुझे सबसे अधिक जिसने प्रभावित किया, वह 1991 में धारवाड़ में मल्लिकार्जुन मंसूर के साथ उनकी एक तस्वीर थी।
मल्लिकार्जुन मंसूर बॉम्बे कर्नाटक घराने की सांस्कृतिक राजधानी धारवाड़ में एक-डेढ़ दशक के भीतर जन्मे गायकों के समूह में सबसे बड़े थे। कुमार गंधर्व इस समूह में सबसे छोटे थे। इसके अन्य सदस्य गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी और बसवराज राजगुरु थे। जब उनके दोस्त और साथी संगीतकार बिना बताए उनके दरवाजे पर पहुंचे तो मल्लिकार्जुन जी ने सोचा कि वह आखिरी बार अपने ‘अन्ना’ (बड़े भाई) से मिलने आए हैं। वे कुमार जी से उम्र में बहुत बड़े थे और उन्हें धूम्रपान की लत थी। कुमार जी के देहांत के कुछ ही समय बाद मल्लिकार्जुन जी की भी मृत्यु हो गई।
कलापिनी ने अपने बंगलुरू संगीत कार्यक्रम की शुरुआत राग ‘भीमपलासी’ में अपने पिता की तीन रचनाओं के साथ की। यह एक गंभीर, विद्वतापूर्ण राग है और प्रस्तुतिकरण ने उन विशेषताओं को उनका उचित हक दिया। इसके बाद उन्होंने कुमार गंधर्व द्वारा बनाए गए रागों में से एक ‘श्री कल्याण’ में एक छोटी रचना गाई। इसके बाद मध्य प्रदेश के मालवा का एक लोकगीत प्रस्तुत किया गया। कुमार गंधर्व मुंबई में प्रशिक्षित कन्नडिगा थे। छाती की गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के बाद वे मालवा में रहने लगे थे।
जैसे-जैसे संगीत कार्यक्रम आगे बढ़ रहा था, मुझे उम्मीद थी कि इसमें ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ भी शामिल होगा। जब मैं छोटा था तो अपनी फरमाइश चिल्लाकर कहता था या कागज के टुकड़े पर लिखकर भेज देता था। बढ़ती उम्र के साथ अब मैं थोड़ा जागरूक हो गया हूं, इसलिए चुप रहता हूं। खुशी की बात यह रही कि कलापिनी ने कार्यक्रम का अंत कुमार गंधर्व से जुड़े गीत के साथ कर न सिर्फ मेरा, बल्कि अधिकांश दर्शकों का भी मन मोह लिया। उन्होंने अपने पिता की शैली में बड़े भाव से ‘जमुना किनारे मोरा गांव’ गाया। जैसे ही उन्होंने गाना शुरू किया, मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं और जमुना के जल क्षेत्र के जंगलों और रास्तों में खो गया।
अगली सुबह मैं यूट्यूब पर गया और ‘कुमार गंधर्व/वसुंधरा कोमकली भजन कॉन्सर्ट, नई दिल्ली-1978’ टाइप किया। पूरे एक घंटे और पचास मिनट लंबे संगीत कार्यक्रम का एक लिंक मेरे सामने आया, जिसमें उन्नीस गाने शामिल थे। लिंक में संगीत कार्यक्रम की तारीख भी अंकित थी- 20 अगस्त 1978, दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में मेरे अंतिम वर्ष का पहला महीना। अब इस लिंक को कुमार गंधर्व की अन्य रिकॉर्डिंग के साथ जोड़कर यूट्यूब पर सुना जा सकता है। कुमार जी के गाने प्रो. अनीता रामपाल द्वारा उपहार में दी गई वे आठ सीडी मेरे पास पूरी तरह संरक्षित हैं।