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पर्यावरण: प्रकृति में संतुलन की दरकार, चुनौतियों के स्थायी समाधान के लिए कई कदम जरूरी
Mon, 08 Jul 2024 06:29 AM IST
शिव शरण शुक्ला
गुंजन मिश्रा
गुंजन मिश्रा
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Mon, 08 Jul 2024 06:29 AM IST
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पर्यावरण
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विस्तार
विकास के नाम पर मानव जीवन के लिए जो जरूरी वास्तविक धन है, उसे बर्बाद करने की होड़ मची हुई है। हम सह-अस्तित्व के सिद्धांत को नकार कर जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ रहे हैं, उसी के चलते आज धरती हीटवेव का सामना कर रही है। अब तो तापमान सिर्फ दिन में ही नहीं बढ़ता, बल्कि रातें भी गर्म रहने लगी हैं। भूमिगत जल का तापमान भी बढ़ने लगा है। स्पष्ट है कि हमने पृथ्वी पर जीवन को संकटमय बना दिया है। आज अधिकांश शहरों का तापमान सामान्य से 4.5 से लेकर 6.4 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका है। इतना बढ़ा हुआ तापमान देश में हीटवेव की रेड कैटेगरी में आता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत अधिक नुकसानदेह है। इससे भविष्य में गर्मी के कारण होने वाली मृत्यु में छह गुना का इजाफा हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के अलावा शहरीकरण के चलते हीट इंडेक्स को अनदेखा करना; भूजल, पेट्रोलियम पदार्थों व कोयला का मनमाना दोहन, पृथ्वी की सतह पर पानी का कम होना, घरों-दफ्तरों में एसी का बढ़ता इस्तेमाल, वनों की कटाई, जैव-विविधता में कमी, पृथ्वी की चुंबकीय क्षमता में कमी एवं पृथ्वी की अंदर की सतह के घूर्णन की गति कम होना तथा सूर्य व पृथ्वी के बीच की दूरी घटने जैसे कारक इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
भारत के ही संदर्भ में देखें, तो 1971 में सबसे ज्यादा तापमान 44.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था, जो 2024 में बढ़कर 52 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो गया है। यानी 53 वर्षों में तापमान में आठ डिग्री सेल्सियस तापमान की वृद्धि हो चुकी है। बढ़ते तापमान से जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाओं में तो वृद्धि होती ही है, इससे जैव-विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचता है।
इस ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए दुनिया भर के नीति निर्माताओं को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए जरूरी है कि कॉप -28 में जो निर्णय लिए गए, उनका बेहतर ढंग से पालन किया जाए। हमें प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर रोक लगाना होगा।
इसके अलावा, 'सह-अस्तित्व के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए पूरे विश्व में पर्यावरणीय नियम-कानून लागू किए जाने चाहिए। भारत में पर्यावरणीय सूचकांक की स्थिति को देखते हुए प्राकृतिक वसीयत के लिए एक अध्यादेश लागू हो। तभी हम खुशहाल जीवन जी सकते हैं। इसके अलावा सरकारों को चाहिए कि पंचमहाभूतों के संरक्षण हेतु एक एकीकृत योजना लागू की जाए एवं इसके अंतर्गत कृषि को एक राष्ट्रीय कार्य घोषित किया जाए, ताकि हम सर्वे भवन्तु सुखिनः का संदेश विश्व को दे सकें।
बढ़ती हुई आर्थिक, सामाजिक असमानता को संतुलित रखने के लिए एक आयोग की स्थापना हो, जिसमंे सर्कुलर इकनॉमी को बढ़ावा दिया जाए। सर्कुलर इकनॉमी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह स्थानीय स्तर पर काम और कुशल कारीगर तैयार करेगी। इससे परोक्ष व अपरोक्ष रूप से रोजगार मिलने के साथ जैव-विविधता भी समृद्ध होगी। पेड़ और जंगल लंबे समय से कार्बन पृथक्करण का केंद्र बिंदु रहे हैं। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का मुकाबला करने के लिए पेड़ लगाना और उनकी रक्षा जरूरी है।
मानवीय गतिविधियों के कारण ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिसके कम होने के कोई संकेत नहीं हैं। उसमें कमी के प्रयास सभी देशों को करने चाहिए। कार्बन उत्सर्जन के लिए सिर्फ विकासशील देश ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि विकसित देश इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं।
पर्यावरण संकट का हमें स्थायी समाधान तलाशना होगा, क्योंकि वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर देना जलवायु परिवर्तन का स्थायी हल नहीं है, और न ही इसका स्थायी समाधान किसी सरकार व टेक्नोलॉजी के पास है। इसका स्थायी समाधान सिर्फ किसानों के पास है, क्योंकि किसान ही है, जिसका सीधा संबंध मिट्टी से होने के कारण, जैव-विविधता, जल, पशु-पक्षी आदि से भी होता है।
हमें प्रकृति में संतुलन लाना होगा। यदि हम जलवायु परिवर्तन सुधारने के चक्कर में सिर्फ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के प्रयास करते रहे, तो निश्चित रूप से विफल साबित होंगे। हमें अपनी जीवन-शैली में भी सुधार करना होगा।