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Budget 2023: बजट में रोजगार की चिंता, बुनियादी कौशल की आवश्यकता
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विस्तार
एक फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण आगामी लोकसभा चुनाव से पहले का पूर्ण बजट पेश करेंगी। यह बजट देश की आर्थिक प्रगति को रफ्तार दे पाएगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इस चुनौती भरे समय में, जब देश कोरोना के असर समेत दूसरी अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है और यूक्रेन में चल रहे युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा है, तब भारत में सबसे बड़ी चिंता निश्चित रूप से रोजगार को लेकर है।
बजट में जीडीपी में वृद्धि को लेकर, जाहिर है, तमाम तरह की बातें होंगी। हालांकि ध्यान रखने की बात यह है कि जीडीपी में वृद्धि से हमेशा रोजगार में वृद्धि नहीं होती। जबकि देश के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती रोजगार में वृद्धि की है। कटु सच्चाई यह है कि आर्थिक विकास दर के बढ़ने और अर्थव्यवस्था के विस्तार के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में हमारे यहां रोजगार में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई है, जो कि खासकर समाज के कमजोर वर्ग के लिए ज्यादा निराशाजनक है। कोविड के दौरान इसी वर्ग को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है।
सच्चाई तो यह है कि पर्याप्त रोजगार पैदा न कर पाने की चिंता देश के एकाधिक मुख्यमंत्रियों ने भी जताई है। छत्तीसगढ़ का ही उदाहरण लें, जहां इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाला है। कुछ ही दिन पहले वहां के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह घोषणा की कि अगले वित्त वर्ष से राज्य के बेरोजगारों को मासिक भत्ता दिया जाएगा। रोजगार के मामले में इस वास्तविकता की अनदेखी नहीं की जा सकती कि ग्रामीण भारत की तुलना में, जहां कृषि बड़ी संख्या में लोगों को किसी न किसी तरह रोजगार मुहैया कराती है, शहरी भारत में रोजगार की समस्या ज्यादा बड़ी है। ग्रामीण भारत के लोगों को मनरेगा के जरिये भी, जो ग्रामीण भारत में रोजगार प्रदान करने की केंद्र सरकार की बहुद्देश्यीय योजना है, आंशिक रोजगार प्राप्त होता है, जिसमें साल में कम से कम 100 दिन रोजगार देने का प्रावधान है।
यह अलग बात है कि सरकारी घोषणा और जमीन हकीकत में हमेशा फर्क पाया जाता है। उदाहरण के लिए, द सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की अकाउंटिबिलिटी इनीशिएटिव के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 से 2021-22 के बीच मजदूरी की दर में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन वर्ष 2021 में अप्रैल से दिसंबर के बीच देश के 28 में से 16 राज्यों में मनरेगा के तहत दी गई मजदूरी बढ़ी हुई मजदूरी से कम ही थी। केरल और झारखंड इस मामले में जरूर अपवाद थे, जहां सरकार द्वारा घोषित दर से ज्यादा मजदूरी दी गई। जाहिर है, ग्रामीण भारत के लोगों के लिए मनरेगा एक सहारा तो है ही।
हकीकत यह है कि जिन-जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां की सरकारें शहरी युवाओं को रोजगार देने की योजनाओं पर विचार कर रही हैं। पिछले साल राजस्थान ने ऐसी ही एक योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत वहां 18वीं सदी की खनिया की बावड़ी के पुनरुद्धार की योजना पर काम शुरू हुआ है। इसी तरह ओडिशा, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, केरल, झारखंड और तमिलनाडु ने या तो शहरी रोजगार योजना की शुरुआत की है या इस दिशा में कुछ करने के बारे में सोच रहे हैं। लेकिन ये छोटी योजनाएं ही हैं। इस मामले में राजस्थान की रोजगार योजना को ही महत्वाकांक्षी बताया जा रहा है।
देखने की बात यह होगी कि आगामी बजट में शहरी युवाओं को रोजगार देने के लिए केंद्रीय स्तर पर किसी योजना की घोषणा की जाती है या नहीं। इसकी वजह यह है कि पिछले काफी समय से अनेक आर्थिक विशेषज्ञ सरकार को इस तरह का सुझाव दे रहे हैं। हालांकि ऐसी किसी योजना के लिए पैसा कहां से आएगा, यह भी एक बड़ा प्रश्न है।
ऐसा नहीं है कि रोजगार की चिंता सिर्फ देश के गरीब तबके के बीच ही है। यह ठीक है कि देश में विलासिता की वस्तुओं का बाजार बढ़ा है, जो बताता है कि अमीरों और उच्च मध्यवर्ग के लिए स्थिति अच्छी ही है। लेकिन दूसरे क्षेत्रों की अनेक कंपनियों ने अपने यहां छंटनी की है। अकेले तकनीकी क्षेत्र का ही उदाहरण लें, तो पिछले दो साल में लगभग 30,000 लोगों की नौकरियां चली गई हैं। तकनीकी क्षेत्र में की गई छंटनियों पर नजर रखने वाले एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के अनुसार, सिर्फ ओला ने वर्ष 2020 से 2022 के बीच अपने करीब 2,600 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है। ऐसे में, रोजगार के मोर्चे पर चिंतित होना स्वाभाविक है।
इसके बावजूद मौजूदा स्थिति हताशा का कारण नहीं होना चाहिए। बल्कि यही उचित समय है, जब मजबूत सामाजिक सुरक्षा और बेरोजगार लोगों की आर्थिक सुरक्षा पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होनी चाहिए। और चूंकि बजट आने वाला है, ऐसे में, यह बहस अभी ही शुरू होनी चाहिए। उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि हमारे युवाओं को फिलहाल उपलब्ध रोजगार और भविष्य में मिलने वाले रोजगार के लिए भी तैयार किया जाए।
ध्यान देने की बात यह है कि वैश्विक स्तर पर रोजगार का परिदृश्य बदल रहा है। ऐसे में, वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बने रहने के लिए आवश्यक यह है कि हमारे युवाओं को उन कौशलों से लैस किया जाए, जिनकी मांग बनी हुई है तथा आगे और बढ़ने वाली है। इसके लिए बुनियादी कौशल की आवश्यकता है, जिससे युवा तेजी से सीखते हैं। चूंकि जीवन के तमाम क्षेत्रों में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ता ही जा रहा है, लिहाजा आने वाले दिनों में अत्यधिक हुनरमंद युवाओं और आम कौशल विहीन युवाओं के बीच का फासला बढ़ेगा। महामारी के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए और मौजूदा युवा आबादी को रोजगार पाने के कौशल से लैस करने के लिए बुनियाद को मजबूत करने की आवश्यकता है। इसके लिए, जाहिर है, गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा और सबके लिए शिक्षा पर काफी निवेश करने की जरूरत पड़ेगी। देखने की बात यह होगी कि बजट में इन मुद्दों पर कितना ध्यान दिया जाता है।