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मुद्दा: परिवहन क्षेत्र को कार्बन मुक्त होना होगा, यात्रा शुरू...लंबा सफर बाकी
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विस्तार
भारत का विनिर्माण क्षेत्र अग्रणी होने के साथ-साथ उल्लेखनीय रूप से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। देश के सकल घरेलू उत्पाद ऑटोमोबाइल सेक्टर का योगदान करीब सात प्रतिशत है। भारतीय मोटर वाहन उद्योग ने वित्त वर्ष 2023-24 में 20 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया और अब देश में संग्रहीत कुल जीएसटी में इसका योगदान 14-15 प्रतिशत है। हालांकि वर्ष 2016 में देश में ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में परिवहन क्षेत्र का योगदान करीब 13 फीसदी रहा है। जाहिर है, कार्बन उत्सर्जन को कम करने और पर्यावरण की रक्षा के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर देना होगा, लेकिन इसके लिए व्यापक निवेश की जरूरत होगी।
भारत का सड़क परिवहन क्षेत्र मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल पर निर्भर है और यह देश का सबसे बड़ा तेल उपयोगकर्ता क्षेत्र भी है। देश में पेट्रोलियम पदार्थों के कुल उपभोग में ऑटोमोबाइल सेक्टर की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत है। जहां तक वैकल्पिक ईंधन का सवाल है, तो उसकी भूमिका बहुत सीमित है। जाहिर है, उत्सर्जन में परिवहन क्षेत्र के भारी योगदान को देखते हुए इस क्षेत्र को डीकार्बनाइज करने के प्रयास नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से अहम हैं। परिवहन क्षेत्र को डीकार्बनाइज किए बिना नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल साबित होगा।
जाहिर है, इसके लिए भारत को ज्यादातर इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भर रहना होगा। नतीजतन इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण, नई टेक्नोलॉजी और अनुसंधान एवं विकास पर बहुत बड़े पैमाने पर निवेश करना जरूरी हो गया है। क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी इनीशिएटिव की एक रिपोर्ट के मुताबिक, परिवहन क्षेत्र को डीकार्बनाइज किए जाने से परिवहन उद्योग, खासकर इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में विकास के अवसर पैदा हो सकते हैं।
‘इंडिया ऑटो इंडस्ट्री : मैपिंग कोर्स टू नेट जीरो 2070’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2070 तक देश में ऑटो सेक्टर का रूपांतरण होने से 197 खरब डॉलर का बाजार तैयार हो सकता है। इसमें 63 प्रतिशत हिस्सेदारी कारों की होगी और इनका योगदान 155 खरब डॉलर का होगा। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2070 तक करीब 263 अरब डॉलर का सबसे बड़ा निवेश चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी हो सकता है।
ट्रक निर्माताओं द्वारा वर्ष 2070 तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए 45 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का अनुमान है। इसके अलावा, वर्ष 2020 से 2070 के बीच ऑटोमोबाइल क्षेत्र के रूपांतरण से माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में 41 खरब डॉलर का राजस्व भी हासिल होने का अनुमान है।
बैटरी की सालाना 1,716 गीगावाट की अनुमानित मांग को पूरा करने और पूरी तरह से घरेलू स्तर पर उत्पादन करने के लिए निर्माणकर्ताओं को वर्ष 2070 तक 196 अरब डॉलर का निवेश करना ही होगा। वर्ष 2070 तक भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को पूरी तरह से नेट जीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए ओरिजिनल इक्विपमेंट्स मैन्यूफैक्चरर्स (ओईएम) इकाइयों को नई प्रौद्योगिकियों और विनिर्माण पर 323 अरब डॉलर का भारी भरकम निवेश करने की जरूरत होगी।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की दिशा में हो रही प्रगति की अगुवाई मुख्य रूप से दोपहिया वाहनों द्वारा की जा रही है। वित्तीय वर्ष 2019 से 2024 के बीच के छह वर्षों में दोपहिया वाहनों की सालाना बिक्री 140 से 210 लाख इकाइयों तक रही है। इस दिशा में ऑटो या तीन-पहिया वाहनों का भी उल्लेखनीय योगदान है। वित्तीय वर्ष 2019 से 2024 के बीच ऐसे 3-7 लाख वाहनों की बिक्री हुई। इस अवधि में ऑटो बाजार 180 से 260 लाख गाड़ियों की सालाना बिक्री के बीच रहा। वित्त वर्ष 2023 में इलेक्ट्रिक वाहनों ने कुल 12 लाख इकाइयों की बिक्री के साथ दस लाख का आंकड़ा पार कर लिया।
वर्ष 2020 से 2070 के बीच इलेक्ट्रिक ट्रकों की भी बिक्री बढ़ने की संभावना है। उम्मीद की जा रही है कि यह अनुमान कुल इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री से संबंधित राजस्व में 834 अरब डॉलर से अधिक का योगदान देगा। बड़े-बड़े महानगरों की हवा मानव स्वास्थ्य के िलए हानिकारक हो चुकी है, इसके पीछे उद्योगों से निकलने वाला धुआं और विनिर्माण क्षेत्र के अलावा डीजल-पेट्रोल से चलने वाले वाहन भी हैं। इसलिए हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वच्छ हवा में सांस ले सकें, इसके लिए मौजूदा परिदृश्य में इलेक्ट्रिक वाहन सबसे अच्छा विकल्प हैं।