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जड़ता तोड़ने वाली पार्टी
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Tue, 31 Dec 2013 08:02 AM IST
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आम आदमी और रोजमर्रा के उसके संघर्ष ने अचानक सबका ध्यान खींचा है। निस्संदेह दिल्ली के नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी प्रतीकात्मकता की ताकत बखूबी जानती है। मगर मारक ठंड से बचने के लिए मफलर को सिर में लपेटना, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल, लाल बत्ती या सायरन लगी गाड़ियों से परहेज करने जैसे सामान्य संकेतों को हममें से कई लोगों का हैरत से देखना यह बताता है कि कैसे आम लोग और उनके चुने गए प्रतिनिधियों के बीच के बड़े अंतर को हम चुपचाप कबूल करते आए हैं।
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यह तस्वीर बदली जा सकती है। आम आदमी पार्टी की जीत सिर्फ उनके शानदार चुनावी आगाज में ही नहीं, बल्कि हममें से कइयों को यह भरोसा दिलाने में भी निहित है कि आम आदमी या औरत के पास भी ताकत होती है। ऐसा कर, इसने शहर में उस निराशावाद को खत्म किया है, जो सदियों से 'दरबारी' संस्कृति का ठिकाना रहा है, जहां दरबारियों और सत्ता के दलालों की तूती बोलती रही है, जहां कानून के शासन के बजाय चीजें लेन-देन और अपने इष्ट-मित्र से तय होती रही हैं, और जहां अधिसंख्य आबादी को यह एहसास कराया गया है कि उनके होने-न होने का कोई मतलब नहीं है।
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हालांकि अभी तो महज शुरुआत है। लेकिन अगर आम आदमी पार्टी न सिर्फ दिल्ली में, बल्कि भारत के अन्य शहरों में भी, जनता के दिलों में घर बनाने में कामयाब हुई है, तो इसकी वजह यह है कि इस नई पार्टी ने अपने कर्मों और वचनों से आम आदमी/ औरत को यह भरोसा दिलाया है कि 'आम लोग' के पास बहुमत है और अगर वे सभी एक साथ खड़े हो जाएं, तो 'खास लोगों' को सत्ता का उपभोग करने की परंपरा को वे आसानी से चुनौती दे सकते हैं।
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दिल्ली में या कहीं भी, आम आदमी पार्टी अगर सनसनी फैला रही है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि इससे पहले आम आदमी के विषय में बोलने वाली कोई पार्टी नहीं थी। देश के सभी राजनेता आम आदमी के हित में काम करने का दावा करते हैं। लेकिन यह साफ हो चुका है कि ऐसी बयानबाजी उनकी मानसिकता से मेल नहीं खाती। वे बोलते कुछ, और करते कुछ और हैं। और यही वह कारक है, जिससे आप को खासा फायदा पहुंचा। उसने अपनी कथनी और करनी को एक कर खुद को साबित किया है।
हालांकि हमारे तंत्र में जड़ जमा चुकी गंदगी और सड़ांध को दूर करने में आप कितनी सफल होगी, यह आकलन तो फिलहाल मुश्किल है। लेकिन दिल्ली में सरकार कितने दिन चलेगी, इसकी परवाह किए बगैर आम आदमी पार्टी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जो वायदे उसने किए हैं, वह उसे पूरा कर सकती है। इस नई पार्टी ने न सिर्फ सहभागितापूर्ण लोकतंत्र को एक नया कलेवर दिया है, बल्कि भारतीय राजनीति के नियमों को भी बदला है। जैसा कि आप की प्रवक्ता आतिशी मार्लेना कहती हैं, आप की नीतियां अथवा उनका घोषणापत्र बंद कमरों में तय नहीं किए गए, बल्कि लगातार हुई जनसभाओं और विशेषज्ञों की राय के आधार पर इसे बनाया गया है।
बहरहाल, यह तय है कि आप के लिए आगे की राह आसान नहीं होने वाली। कई लोग चाहते हैं कि आप का प्रयोग विफल हो, क्योंकि इसने यथास्थितिवाद को चुनौती दी है। लेकिन एक नई पार्टी को एक मौका देने में बुराई क्या है?
उनकी सिर्फ दो प्राथमिकताओं- बिजली के बिल में कमी और दिल्ली के हर बाशिंदे को 700 लीटर मुफ्त पानी देने, पर ही नजर डालें। आप के आलोचक इसे वामपंथी और अव्यावहारिक कदम कहकर खारिज करते हैं। मार्लेना कहती हैं, आप ने ऊर्जा क्षेत्र में निजीकरण खत्म करने की बात कभी नहीं कही है। वह तो दिल्ली में काम कर रही बिजली कंपनियों को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाना चाहती है। इस जांच का अर्थ यह देखना है कि बिजली मीटर में तो दोष नहीं है, बिजली बिल सही ढंग से गणना की जा रही है या नहीं और बिजली वितरण करने वाली कंपनियों के खातों में कोई गड़बड़ी तो नहीं है। इनमें से किसी भी जांच में क्या वाकई कोई आपत्ति है?
पानी की स्थिति देखें। दिल्ली का हर शख्स यहां के निजी पानी टैंकर माफिया और पूरे शहर में जारी दोषपूर्ण जल वितरण से परिचित है। अब इसमें हर्ज क्या है कि आम आदमी पार्टी पहले इन पर कार्रवाई करती है और फिर जल के मूल्य का पुनर्निर्धारण करती है? वैसे सोमवार को आम आदमी पार्टी 20,000 लीटर पानी प्रति महीने मुफ्त देने की घोषणा करके 700 लीटर पानी प्रतिदिन मुफ्त देने का अपना वायदा पूरा करती दिखी। आप के सदस्य कहते हैं, जल संयंत्रों से अवैध तरीके से निजी टैंकरों को पानी दिया जाता है। आखिर मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर अगर अरविंद केजरीवाल इस क्षेत्र में सफाई अभियान चलाते हैं, तो इसमें किसी को हर्ज नहीं होना चाहिए।
बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि दी गई समय सीमा में आप की सरकार अपने वायदों को पूरा कर भी सकती है और नहीं भी। लेकिन अगर यह पार्टी यों ही जनहितकारी मुद्दों को उठाती रही और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम लोगों को शामिल करती रही, तो निस्संदेह इसकी स्थिति पहले से मजबूत ही होगी। और रही देश की बाकी पार्टियों की बात, तो वे बस धैर्य रखे और यह इंतजार करें कि गिरने से पहले दिल्ली की यह नई सरकार कोई बड़ी गलती करे।