सावधान, आगे मुश्किल मोड़ है! और विफल हो चुकी है पहले वाली 'सोशल इंजीनियरिंग'
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संदेह जितने सपनों की हत्या करता है, उतनी तो नाकामियां भी नहीं करतीं।
-सूजी कासेम
रास्ते, चलने से ही बनते हैं।
-फ्रेंज काफ्का
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विस्तार
यह विकट चुनाव था और शुद्ध रूप से 'मोदी की गारंटी' की केंद्रीय सत्ता के इर्द-गिर्द लड़ा गया था। इसमें क्या संदेह है कि नरेंद्र मोदी ने अपने समय में एक फिनामिना को जन्म दिया है। 2014 में जब उनका पहला चुनाव था, तो परिस्थितियों में एक तात्कालिकता थी, धारणा से उपजी प्यास थी। इसलिए वे कथा-कहन के हिसाब से सबसे अच्छे 'स्टोरी टेलर' थे और सबसे ज्यादा शेयर की जाने वाली कहानी। एक, आशा ने उनके रास्ते अपना रास्ता तलाशा। दूसरे, चुनाव में उस पहले के आभासी बिम्ब पर मुहर का मौका था। तीसरा, चुनाव उनके एक 'कल्ट' की शक्ल में स्थापित हो जाने के बाद का चुनाव था। फैसलों की तेजी और निर्णायक दृढ़ता ने उनकी व्यक्तिगत अपील को अंतत: मोदी की गारंटी में तब्दील कर दिया। वह एक 'स्वंयसेवक' थे और अपनी पार्टी के मूल संकल्पों को पूरा करने में उन्होंने राजनीतिक शक्ति का रणनीतिक उपयोग किया। इस तरह रचे गए मुहावरे ने उन्हें ढेरों भक्त दिए, और विरोधी भी। विरोध का स्तर यह था कि उनकी विफलता की कामना ही कई लोगों के जीवन की साध बन गई।
ताजा चुनाव में जो विपक्षी गठबंधन बना, वह ढीला-ढाला गठबंधन था, जिसका केंद्रीय बंधु तत्व मोदी-विरोध ही था। ईडी, तानाशाही, बेरोजगारी, मोहब्बत के श्लोक थे। अगर ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि क्षेत्रीय पार्टियों ने एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को इतना कम स्पेस दिया कि वह दबाव बनाने की स्थिति में न रह सके। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में, राष्ट्रीय जनता दल बिहार में और एनसीपी-शिवसेना महाराष्ट्र में कांग्रेस को पहली पायदान पर कुछ कैसे दे सकती थीं? रही बात 'आप' और 'टीएमसी' की, तो वे पंजाब-पश्चिम बंगाल में समझौते से दूर ही रहीं। कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन भी इससे कुछ अलग नहीं था। साफ है कि राज्यों में, वहां के भावी विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय वर्चस्व बनाए रखना उनकी पहली प्राथमिकता है और उन्होंने इस चुनाव के दौरान यह जमीन तैयार करने की पूरी कोशिश की है।
उत्तर प्रदेश ऐसा ही एक उदाहरण है, जिससे समझा जा सकता है कि सोशल इंजीनियरिंग का कथित मुहावरा कैसे काम करता है। पहले मोदी-शाह ने क्रीमी लेयर वाली जातियों से त्रस्त छोटी-छोटी जातियों के समूहों को इकट्ठा कर नया समर्थक समूह बनाया था। इस बार सपा ने उम्मीदवारों के चयन में भी यह मानकर कि मोदी विरोध में मुस्लिम और परंपरागत यादव वोट तो हर हाल में उसके साथ आएंगे,जातीय पहचान के रणनीतिक प्रयोग किए। दलितों को जब लगा कि बसपा ने हथियार डाल दिए हैं, तो उनके वोट भी आरक्षण की बात करने वाले 'इंडिया' को शिफ्ट हो गए। इस तरह भाजपा जिस 'सोशल इंजीनियरिंग' के भरोसे पहले जीती थी, वह विफल हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि जाटों ने हरियाणा और राजस्थान में और राजपूतों ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक आकांक्षाओं के खाते से झटके को अपना योगदान दिया है। यह उस ओर इशारा करता है कि एकल हिंदुत्व की पुकार कैसे जातीय समीकरणों और स्थानीय यथार्थ में गुम हो जाती है। तभी तो राम मंदिर वाले अयोध्या तक में, फैजाबाद सीट सपा की झोली में गिरी है। अलबत्ता मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा समेत कुछ इलाकों से भाजपा को बड़ी सहायता मिली। यह तथ्य बताने के लिए काफी है कि आकांक्षाओं और राजनीतिक वास्तविकताओं का भूगोल व मनोविज्ञान किस तरह काम करता है। या, कैसे फॉर्मूलाबद्ध आदर्श अवधारणाएं हवा हो जाती हैं।
तीखा, अर्थहीन मुहावरों के साथ शुरू हुआ यह चुनाव आखिर में संदेह पर समाप्त हुआ था। संदेह को एक मुद्रा की तरह चलाया गया। जैसा कि सूजी कासेम की उक्ति शुरू में कही गई है-संदेह जितने सपनों की हत्या करता है उतनी तो नाकामियां भी नहीं करती। इस लिहाज से यह चुनाव मुद्दों से उठकर 'अलंकारिक' और 'घात-प्रतिघात' का चुनाव बन गया। अब जब परिणाम आ गए हैं, शायद संदेह के सौदागर भी शांत होंगे और ईवीएम भी चैन की सांस लेगी। और हां, सबसे बड़ी घटना भारत के जीतने की, जम्मू-कश्मीर में हुई जहां पैंतीस साल बाद पहली बार 58 प्रतिशत से ज्यादा का मतदान हुआ। ताजा नतीजों ने फिर साझा सरकार के दिन लौटा दिए हैं। बकौल फ्रेंज़ काफ्का, रास्ते, चलने से ही बनते हैं। पर आगे मुश्किल मोड़ हैं। प्रधानमंत्री जो 'क्रांतिकारी' फैसले पहले सहज ढंग से कर सकते थे, अब वह सब उतना आसान नहीं रह जाएगा। सभी राजनीतिक चुनौतियां और ज्यादा जटिल होकर सामने आएंगी। समझौते और प्रहसन खड़े होंगे।
अंत में खलील जिब्रान की एक कहानी-
एक दफे बदसूरती और खूबसूरती समंदर मे नहाने के लिए गईं। कपड़े उतार कर दोनों समंदर में उतरीं। बदसूरती नहाकर पहले बाहर आ गई और खूबसूरती के कपड़े पहनकर चलती बनी। जब खूबसूरती बाहर आई, तो बड़ी शर्माई। लाज बचाने के लिए वहां जो मिला, वही पहनना पड़ा। अब उसके तन पर बदसूरती के कपड़े थे। कहते हैं, इसीलिए लोग कपड़ों से धोखा खाकर एक को दूसरी समझ लेते हैं। हालांकि कुछ लोगों ने असली कपड़ों के साथ उनके चेहरे भी देख लिए थे, इसलिए वे बदले कपड़ों के बावजूद उन्हें पहचान लेते हैं। इसी से खूबसूरती की रोशनी बरकरार रहती है। यह कहानी, लोकतंत्र की अंतर्निहित जटिलताओं में हमें विकट संकेतों को समझने के लिए भी बहुत काम आ सकती है। अगर यह हम जान लें तो, लोकतंत्र की खूबसूरती की रोशनी कायम रख सकेंगे।