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शिक्षा संस्थानों के अस्तित्व को खतरा: विश्वविद्यालयों को नष्ट कर रहे ट्रंप.. उसी देश में बर्बादी जिससे प्रेम..

Sun, 01 Jun 2025 08:10 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 01 Jun 2025 08:10 AM IST
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सार
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी विश्वविद्यालयों को नष्ट कर रहे हैं। चाहे यह व्यक्तिगत कारणों से हो या उनकी विचारधारा के कारण, वे देश को बर्बाद कर रहे हैं, जिससे वे प्रेम करने का दावा करते हैं।
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Educational institutions under threat Trump destroying universities Ruining country that he claims to loves
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : पीटीआई

विस्तार

1970 के दशक के भारत में पले-बढ़े होने के कारण मेरे मन में अमेरिका के प्रति दुविधापूर्ण भावनाएं थीं। मैं वहां के लेखकों में से एक अर्नेस्ट हेमिंग्वे का प्रशंसक था। बॉब डायलन और मिसिसिपी जॉन हर्ट के संगीत का सम्मान करता था। दूसरी ओर, मेरी समझ इतनी विकसित हो चुकी थी कि मैं यह ठीक से याद रख सकूं कि किस तरह से रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने 1971 के युद्ध में भारत (और बांग्लादेश) के खिलाफ पाकिस्तान का समर्थन किया था।



1980 में मैं कोलकाता (तब कलकत्ता) चला गया और मेरी दुविधा पूरी तरह से शत्रुता में बदल गई। अपने मार्क्सवादी शिक्षकों के प्रभाव में मैं पूरी तरह से अमेरिका विरोधी बन गया। अगर मैं अकेला होता तो कभी अमेरिका नहीं जा पाता, लेकिन 1985 में मेरी पत्नी सुजाता को येल यूनिवर्सिटी से मास्टर्स करने के लिए छात्रवृत्ति मिल गई। मैं उनके रास्ते में बाधा नहीं डाल सकता था, इसलिए मुझे उनके साथ रहने का कोई रास्ता तो खोजना ही था। सौभाग्य से मेरी मुलाकात इतिहासकार उमा दासगुप्ता से हुई, जो उस समय यूनाइटेड स्टेट्स एजुकेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया में वरिष्ठ पद पर थीं। उमा दीदी की सलाह और सहायता से मैंने येल स्कूल ऑफ फॉरेस्ट्री एंड एनवायरनमेंटल स्टडीज में विजिटिंग लेक्चररशिप के लिए आवेदन कर दिया और आश्चर्य की बात यह रही कि वह स्वीकृत भी हो गया।


सुजाता अगस्त 1985 में येल चली गईं। उसी वर्ष नवंबर में इस अमेरिका विरोधी ने खुद को हो ची मिन्ह सरानी में अमेरिका के वाणिज्य दूतावास के बाहर पाया। काउंटर सुबह 8.30 बजे खुला। मैं वहां सात बजे ही पहुंच गया था, क्योंकि जब मैं सुजाता के साथ उसके वीजा साक्षात्कार के लिए चेन्नई (तब मद्रास) गया था तो अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर लंबी लाइन लगी थी। लेकिन हो ची मिन्ह सरानी में लगी कतार में मुझसे आगे सिर्फ एक ही व्यक्ति था। मुझे लगा कि तमिल लोग बिल्कुल भी अमेरिका विरोधी नहीं थे और बंगालियों की तुलना में वे कहीं अधिक इंजीनियरिंग का कोर्स करते थे।

मैं 2 जनवरी, 1986 को येल पहुंचा और अगले डेढ़ साल तक अपने दिमाग को विकसित करने में लगा रहा। पढ़ाता रहा और साथ ही अपने छात्रों से सीखता रहा। अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे बहुत खुशी होती है कि मैं अमेरिका गया। चूंकि मैंने पहले ही पीएचडी कर ली थी, इसलिए मुझे यकीन था कि मैं जिस जमीन पर खड़ा हूं, वह सही है। अमेरिका में अध्ययन कर चुके युवा भारतीय इतिहासकारों से मिलने के बाद मैं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उनका काम किस प्रकार सतही चलन पर आधारित था। अमेरिकी शिक्षाविद एडवर्ड सईद के दृष्टिकोण के बाद उत्तर-उपनिवेशवाद और सांस्कृतिक अध्ययन काफी लोकप्रिय हो गए थे। उनके अनुयायियों ने शोध के लिए जमीनी सतह या अभिलेखागार में महीनों बिताने के बजाय पुस्तकालय से दिवंगत अंग्रेजों के ग्रंथों को निकाल कर उनकी छानबीन करना ही उचित समझा, ताकि यह पता चल सके कि वे उस समय की ‘कट्टरपंथी राजनीति’ से अलग थे।

मेरी पीढ़ी के जो भारतीय अमेरिका में पढ़ने-पढ़ाने के लिए पहुंचे थे, वे मुख्य रूप से व्यक्तिगत उन्नति के लिए गए थे। ऐसा उनके अवसरवाद के कारण नहीं था कि मैंने उनसे दूरी बना ली थी, बल्कि इसलिए कि उनके बौद्धिक सरोकार मेरे लिए नहीं थे। जिन विद्वानों की ओर मेरा आकर्षण हुआ, वे मेरे एक या दोनों विषय क्षेत्रों - पर्यावरण और सामाजिक विरोध - पर काम करते थे, हालांकि उनकी संस्कृति और संदर्भ मेरे विचारों से अलग थे। येल में ही मैंने पर्यावरण समाजशास्त्री विलियम बर्च, पर्यावरण इतिहासकार विलियम क्रोनन और पारिस्थितिकी मानवविज्ञानी टिमोथी वेस्केल के साथ लंबी बातचीत की थी। येल विश्वविद्यालय के जिस वरिष्ठ विद्वान से मैं अक्सर बात करता था, वे जेम्स स्कॉट थे, जिन्होंने उसी समय अपनी पुस्तक ‘वेपन्स ऑफ द वीक : एवरीडे फॉर्म्स ऑफ पीजेंट रेजिस्टेंस’ प्रकाशित की थी। येल के बाहर रटगर्स में मैंने तुलनात्मकवादी माइकल अडास, बर्कले में समाजशास्त्री लुईस फोर्टमैन तथा उस समय ब्रैंडिस में पढ़ा रहे अमेरिकी पर्यावरण इतिहास के दिग्गज डोनाल्ड वर्स्टर से संपर्क किया था।

इन विद्वानों ने अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी अमेरिका में उन तकनीकों और विषयों का उपयोग करते हुए काम किया था, जिनसे मैं परिचित नहीं था। ये अमेरिकी प्रोफेसर कोलकाता या दिल्ली में पढ़ाने वाले शिक्षाविदों के विपरीत पदानुक्रम से मुक्त थे। मुझसे उम्र में बड़े होने के बाद भी वे अपने नाम से बुलाया जाना ही पसंद करते थे और अपने विचारों के आलोचनात्मक मूल्यांकन पर भी खुशी जाहिर करते थे। इन विद्वानों से मिलने और उनके दस्तावेजों को पढ़ने से मेरे बौद्धिक क्षेत्र और महत्वाकांक्षा का विस्तार हुआ। उनकी ही तरह मैं भी अपने पीएचडी (शोध) को किताब के रूप में छपवाना चाहता था। इसके बाद दूसरी और तीसरी किताब पर काम करना चाहता था। मैं ऐसे अनेक भारतीयों को जानता हूं, जिन्होंने अपनी पहली किताब बहुत अच्छे तरीके से लिखी और उसी से संतुष्ट हो गए, जबकि एडास, स्कॉट और वर्स्टर ने गहराई और विविधता वाले उल्लेखनीय काम किए। यही वह मॉडल था, जिसका मैं घर वापस आने पर अनुसरण करना चाहता था।

एक बार मैं महात्मा गांधी पर एक पाठ्यक्रम पढ़ा रहा था और मेरे बर्मी, यहूदी एवं अफ्रीकी-अमेरिकी छात्रों द्वारा गांधी तथा उनकी विरासत में दिखाई गई रुचि ने मुझे आश्वस्त किया कि आने वाले दशक में गांधी पर शोध और लेखन करना मेरे लिए सार्थक होगा।

मैंने अपनी पूरी शिक्षा भारत में ली है और अधिकांश समय भारत में रहते और काम करते हुए बिताया है। इसके बाद भी मैंने अमेरिका में रहते हुए जिन विद्वानों और छात्रों के साथ समय बिताया, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना चाहता हूं। वहां के पुस्तकालय और अभिलेखागारों का भी, जहां अक्सर भारत के इतिहास पर ऐसे अमूल्य दस्तावेज होते हैं, जो अपने यहां उपलब्ध नहीं होते। इसलिए मेरे मन में डोनाल्ड ट्रंप के प्रति काफी गुस्सा है। वे अमेरिकी विश्वविद्यालय को नष्ट कर रहे हैं, चाहे यह व्यक्तिगत कारणों से हो या उनकी विचारधारा के कारण। वे देश को बर्बाद कर रहे हैं, जिससे वे प्रेम करने का दावा करते हैं।

यह सही है कि हाल के दशक में अमेरिकी उच्च शिक्षा ने कुछ आत्मघाती कदम उठाए हैं। इनमें से दो प्रमुख हैं- पहला, पहचान की राजनीति के आगे समर्पण, जिसने कैंपस में स्वतंत्र चर्चा और रचनात्मक बहस को बहुत हद तक रोका है। दूसरा है, सेवानिवृत्ति की आयु को समाप्त करने का निर्णय, ताकि शिक्षक अस्सी और नब्बे की उम्र में भी पढ़ाते रहें और भविष्य की नियुक्तियों में मतदान के अधिकार को बनाए रखने के लिए मौजूद रहें। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी अमेरिका में ही है। दुनियाभर के विद्वानों को शिक्षित और प्रभावित करके उन्होंने देश की सॉफ्ट पावर को बहुत बढ़ाया है। उन्होंने प्रासंगिक रूप से वैज्ञानिक रचनात्मकता की एक अंतहीन धारा को पोषित किया है, जिसने अमेरिका को दुनिया में आर्थिक और तकनीकी रूप से सबसे उन्नत देश बनाने में एक अतुलनीय भूमिका निभाई है।

1986 में येल जाने से पहले मैं कुछ समय के लिए अमेरिकी विदेश नीति का आलोचक रहा था। उसके बाद के सालों में विदेशी सरकार के इरादों के बारे में मेरा संदेह बरकरार रहा है। मेरे पूरे जीवन में संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति अहंकार और पाखंड का मिश्रण रही है। फिर भी इसके विश्वविद्यालयों का मामला पूरी तरह से अलग है। उन पर जाने-अनजाने होने वाले हमलों पर सभी राष्ट्र के विचारशील लोगों को शोक मनाना चाहिए।

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