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वर्ल्ड अर्थ डे: हमारी ही तरह जिंदा है धरती, यह है कारण

Mon, 22 Apr 2019 11:17 AM IST
Raman Singh फेरिस जाबरा
फेरिस जाबरा Published by: Raman Singh Updated Mon, 22 Apr 2019 11:17 AM IST
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World Earth Day 2019 Earth is living like us
Earth Day

हर साल अमेजन के वर्षा वनों में चालीस हजार करोड़ या चार सौ अरब पेड़ और उन पर निर्भर जीव सात फीट बारिश में डूब जाते हैं। यह लंदन में होने वाली सालाना वर्षा का चार गुना है। इस बाढ़ का एक कारण भौगोलिक अवस्थिति है। भूमध्यरेखा के नजदीक होने के कारण सूर्य की तेज रोशनी समुद्र के पानी को तेजी से भाप में बदलती है और आकाश में बादलों का रूप लेकर भारी वर्षा के तौर पर पृथ्वी पर उतरती है। लेकिन यह आधी कहानी है।


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हर साल अमेजन के वर्षा वनों में चालीस हजार करोड़ या चार सौ अरब पेड़ और उन पर निर्भर जीव सात फीट बारिश में डूब जाते हैं। यह लंदन में होने वाली सालाना वर्षा का चार गुना है। इस बाढ़ का एक कारण भौगोलिक अवस्थिति है। भूमध्यरेखा के नजदीक होने के कारण सूर्य की तेज रोशनी समुद्र के पानी को तेजी से भाप में बदलती है और आकाश में बादलों का रूप लेकर भारी वर्षा के तौर पर पृथ्वी पर उतरती है। लेकिन यह आधी कहानी है।

अमेजन के जीव-जंतु बारिश का पानी सिर्फ प्राप्त नहीं करते, बल्कि वे वर्षा को बुलाते हैं। विस्तृत इलाके तक फैले वन आसमान में रोज बीस अरब टन वाष्प छोड़ते हैं। पेड़ हवा से गैसीय तत्व और लवण सोख लेते हैं। फुंगी जीवाणुओं को सूंघते हैं। तेज हवा बैक्टीरिया, फूलों के पराग, पत्तों की खुशबू और कीड़ों की कोशिकाओं को बुहार देती है।

जंगल की भीगी सांसें, जो जीवाणुओं और जैविक अवशिष्टों को अपने में मिला लेती हैं, वर्षा के लिए आदर्श स्थिति पैदा करती हैं। हवा में भारी मात्रा में व्याप्त पानी के अलावा अनेक ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं, जिनसे पानी सघन रूप लेता है और बहुत तेजी से बारिश के बादल तैयार हो जाते हैं।

इतने जल प्लावन के बावजूद अमेजन बचा रहता है। जंगल वस्तुतः पृथ्वी के महत्वपूर्ण परिसंचरण तंत्र होते हैं। अमेजन के वन से जो पानी ऊपर आसमान की ओर उठता है, वह तेजी से दक्षिण अमेरिकी के फार्मों और शहरों में छा जाता है। कुछ वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि लंबे रेंज में वातावरणीय तरंग प्रभाव के जरिये अमेजन दूर स्थित कनाडा तक में बारिश को संभव करता है।

अमेजन  का वर्षा से जुड़ा यह अनुष्ठान प्रकृति के उन अनेक चमत्कारी तरीकों में से एक है, जिनके तहत जीव जंतु अपने पर्यावरण और व्यापक अर्थ में इस पूरे ब्रह्मांड को रूपांतरित करते हैं। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए, जब इस पारिस्थितिकी के बड़े हिस्से को खोजा और समझा गया। अब हमारे पास इसके ठोस सुबूत हैं कि जीवाणु अनेक जैविक प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं, कुछ वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि महाद्वीपों के निर्माण में उनकी भूमिका रही है।

पेड़, शैवाल और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के जरिये पूरी दुनिया के सांस लेने जितना ऑक्सीजन पैदा होता है। ऑक्सीजन की यह मात्रा काफी होती है, ताकि ब्रह्मांड का जटिल जीवन सुचारु रूप से चल सके। हालांकि ऑक्सीजन का यह स्तर इतना भी अधिक नहीं होता कि थोड़ी-सी रगड़ से यह पृथ्वी आग की लपटों में घिर जाए।

सामुद्रिक कीड़े, प्रवाल भित्तियां और शेल फिश जैसे सी फूड बड़ी मात्रा में कार्बन जमा करते हैं, समुद्र का रासायनिक संतुलन बनाए रखते हैं और प्रतिकूल मौसम से समुद्र तटों की रक्षा करते हैं, तो हाथी, कुत्ते और दीमक निरंतर पृथ्वी की ऊपरी सतह का पुनर्निर्माण करते रहते हैं। ऐसे ही जल, हवा और पोषक तत्वों का प्रवाह बदलते हुए ब्रह्मांड में स्थित लाखों प्रजातियों के भविष्य को सुखद और सुरक्षित बनाया जाता है।

पृथ्वी को प्रतिकूल तरीके से बदलने में एक जीव के तौर पर मनुष्य का हाथ सबसे अधिक है। ग्रीनहाउस गैसों को वायुमंडल में धकेलकर हमने सौर विकिरण को बेअसर करने की ब्रह्मांड की अपनी व्यवस्था को ही उलट दिया, जिससे पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, समुद्र का जलस्तर ऊपर आ रहा है और तूफान घनीभूत होते जा रहे हैं।

ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में सबसे बड़ी बाधा हमारा यह कुतर्क है कि मनुष्य इतना ताकतवर नहीं कि पूरे ब्रह्मांड पर असर डाल सके। पिछले दिनों ग्लोबल वार्मिंग पर ट्रंप प्रशासन की एक गंभीर रिपोर्ट को खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने ही स्वीकारने से इनकार कर दिया। सच्चाई यह है कि वैश्विक पारिस्थितिकी को नष्ट करने वाला मनुष्य अकेला प्राणी नहीं है। पृथ्वी पर जीवन का इतिहास वस्तुतः पृथ्वी पर पुनर्जीवन का इतिहास है।

पृथ्वी को जीवित न मानने वाले तर्क देते हैं कि धरती भोजन नहीं करती, उसमें प्रजनन या विकसित करने की क्षमता नहीं है। बेशक विज्ञान अभी तक धरती के जीवित होने की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं दे पाया है। उसने सिर्फ इसमें जीवन होने की विशेषताओं की सूची ही दी है। दूसरे अनेक जीवित प्राणियों की तरह धरती का एक संगठित ढांचा है, मेम्ब्रेन यानी झिल्ली है, तथा यह ऊर्जा का उपभोग, भंडारण और रूपांतरण करती है।

 

अगर धरती सांस लेती है, उसको पसीने आते हैं, भूकंप उसके कंपन का प्रमाण है, अगर वह लाखों जीवों को पैदा करती है, जो उसकी हवा, पानी और चट्टानों को बदलते और खत्म होने के बाद फिर से भर देते हैं, अगर धरती पर पैदा होने वाले जीव और उनके पर्यावरण उसी अनुपात में बदलते और विकसित होते रहते हैं, तो हम कैसे न मानें कि हमारी धरती जिंदा है?

हम मनुष्य इस ब्रह्मांड के मस्तिष्क यानी चेतना हैं। अद्भुत है कि तब भी हमारी पर्यावरणीय जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है। ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कर हमने न केवल जलवायु में परिवर्तन ला दिया है, हमने ब्रह्मांड के जीवित स्वरूप को घायल और इसकी जैविक लय को अवरुद्ध कर दिया है। ब्रह्मांड में और किसी दूसरे जीव के पास हमारे जैसे विशेषाधिकार नहीं हैं और किसी जीव में यह क्षमता नहीं है कि वह धरती की नसों और रक्त वाहिकाओं को देख पाए। सिर्फ हम धरती को जिंदा रखने में सबसे प्रभावी योगदान कर सकते हैं।

हाल के वर्षों में अमेजन के वर्षा वनों में अस्वाभाविक रूप से सूखे के लंबे-लंबे दौर देखे गए। कुछ वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह वनों की कटाई और जंगलों में लगने वाली आग का नतीजा है। अमेजन में आए बदलाव को स्थानीय परिवर्तन बताकर इस गंभीर बहस को महत्वहीन नहीं किया जा सकता।
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