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बदहाल पाकिस्तान और सांस्कृतिक कूटनीति: कट्टरपंथ के खिलाफ एक नरम विकल्प खोजने की कोशिश
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पाकिस्तान का झंडा
- फोटो :
ANI
विस्तार
कई दक्षिण एशिया में इस समय ऐसी गर्मी पड़ रही है, मानो लगता है कि हर चीज जल रही है। इस जलवायु परिवर्तन से पहले रावलपिंडी में गर्मी मई के अंत तक सहनीय होती थी और उसके बाद ही असल में गर्मियां शुरू होती थीं और शैक्षणिक संस्थानों को गर्मी की छुट्टी के लिए बंद कर दिया जाता था। लेकिन इस बार अप्रैल में लगातार बारिश और सर्द वसंत के बावजूद बढ़ते तापमान पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।राजधानी इस्लामाबाद के ऊपर और मुर्री पर्वत के नजदीक मरगल्ला हिल्स के वन क्षेत्रों में गर्मियों की शुरुआत में ही दो बार भीषण आग लग चुकी है। मेरे बगीचे पर नजर डालने पर पता चलता है कि पानी देने के बावजूद सब कुछ मुरझा रहा है। गुलाब जैसे ज्यादातर फूल खिलने से पहले ही सूख रहे हैं। यहां तक कि गर्मियों का फूल गार्डेनिया, (जो आकार में छोटे होते हैं), भी इस भीषण गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान के दक्षिणी इलाकों, जैसे बलूचिस्तान में भयंकर सूखे के बावजूद गर्मी सहनीय है।
यहीं पर हम बहुत से स्थानीय एवं विदेशी पर्यटकों को धार्मिक पर्यटन पर पहुंचते देखते हैं, क्योंकि हिंदू समुदाय के लोग हिंगलाज यात्रा के लिए आते हैं। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि अनुष्ठान है, जिसमें हिंदू हमारे सूफी कवि अब्दुल लतीफ भिट्टाई के समय से भाग लेते रहे हैं, जिन्होंने अपनी कविता में इसका उल्लेख किया है। पाकिस्तान के वे इलाके, जहां अब भी हिंदू शांतिपूर्वक रहते हैं, वे हैं मीरपुर खास, बादिन, संघर, उमरकोट, हैदराबाद, घोटकी और कराची। कवयित्री फहमिदा रियाज कहती हैं कि इनमें ज्यादातर गरीब तबके के किसान-मजदूर हैं।
दक्षिण एशिया में इतनी ज्यादा मजहबी असहिष्णुता के बीच यह वाकई सराहनीय है कि चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के हिंदू समुदाय अब भी सिंध से लंबी सड़क यात्रा करके बलूचिस्तान के पहाड़ों तक पहुंचते हैं। हाल ही में कराची की मुस्लिम नारीवादी कवयित्री फहमिदा रियाज ने हिंगलाज की यात्रा की। वह कराची से आरसीडी राजमार्ग से होकर यात्रा कर रही थीं और उन्होंने बसों एवं अन्य वाहनों से पुरुषों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को यात्रा करते हुए देखा। फहमिदा रियाज कहती हैं, 'वाहनों में बैठे लोगों के हाथों में लाल और भगवा
झंडे थे और उनके बाजुओं पर लाल एवं पीली पट्टियां बंधी हुई थीं। झंडों और पट्टियों पर ‘जय माता हिंगलाज’ और ‘जय माता शेरां वाली’ लिखा था।'
अब भारत के हिंदू समुदायों द्वारा यह आवाज उठाई जाने लगी है कि जिस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते के कारण सिख समुदायों के लिए करतारपुर कॉिरडोर की स्थापना की गई है, ताकि वे अपने पवित्र स्थल की यात्रा कर सकें, उसी तरह हिंदू समुदायों को भी ऐसी ही सुविधा प्रदान की जाए, क्योंकि पूरे पाकिस्तान में ऐसे कई प्राचीन हिंदू तीर्थ स्थल हैं, जहां वे जाना चाहते हैं।
इस बीच पाकिस्तान में एक अलग तरह का धार्मिक पर्यटन चल रहा है और वह भी पाकिस्तान की बौद्ध विरासत पर। मुझे याद है कि कुछ दशक पहले मैं पाकिस्तान के उत्तरी इलाके में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात घाटी की यात्रा पर गई थी। इस प्रांत में बौद्ध विरासत के कई पवित्र स्थल हैं, जिनमें पहाड़ों में उकेरी गई भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं भी हैं। स्वात घाटी में स्थित प्रतिमा बहुत ऊंची नहीं थी, इसलिए मैं उस पर चढ़कर मूर्ति की गोद में बैठकर फोटो खिंचवा पाई थी।
इस हफ्ते पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने 'गांधार से विश्व तक' शीर्षक से एक परिसंवाद एवं प्रदर्शनी का आयोजन किया था, जो दुनिया के समक्ष मौजूद कट्टरपंथ, जो शांति और सुरक्षा के लिए खतरा है, के खिलाफ एक नरम विकल्प खोजने की कोशिश थी। परिसंवाद का उद्देश्य यह संदेश देना था कि दुनिया भर के लोगों को जोड़ने के लिए कई कारक हैं और बौद्ध विरासत उनमें से एक है। यह पाकिस्तान आकर बौद्ध विरासत के प्राचीन चिह्नों को देखने का एक धार्मिक पर्यटन मात्र नहीं है, बल्कि कई गैर-बौद्ध भी यहां आते हैं, क्योंकि भगवान बुद्ध का शांति का संदेश पर्यटकों को आकर्षित करता है।
खैबर पख्तूनख्वा में प्राचीन गांधार सभ्यता के चिह्न आधुनिक तक्षशिला, पेशावर, चारसद्दा और स्वात में हैं। यह देखना दिलचस्प था कि विदेश मंत्रालय, जो आम तौर पर मुल्क की विदेश नीति को बढ़ावा देने और उसकी रक्षा करने में व्यस्त रहता है, ने पूरी तरह से अलग तरह के पर्यटकों को आमंत्रित किया था। परिसंवाद आयोजित करने के पीछे वैशाख पूर्णिमा का उत्सव मनाने का विचार था, जो भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और निर्वाण का दिवस है।
मुख्य अतिथि श्रीलंका के विदुर विक्रमनायक थे, जो वहां के धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों के मंत्री हैं। उनके अलावा, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम के धार्मिक नेता और विशेषज्ञ भी मौजूद थे। विदुर विक्रमनायक ने अपने सार्थक वक्तव्य में कहा कि 'आइए, हम सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक गांधार सेतु बनाएं, ताकि लोगों और राष्ट्रों को एक साथ लाया जा सके। हमें गांधार को एक जीवंत विरासत बनाना है।'
थाईलैंड के विश्व बौद्ध विश्वविद्यालय के मानद रेक्टर अनिल शाक्य ने एक वीडियो संदेश भेजा था, जिसमें कहा गया कि 'पाकिस्तान वह स्थान है, जहां बौद्ध इतिहास में पहली बार भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं प्रकट हुईं और गांधार कला दुनिया भर के सभी बौद्धों और गैरबौद्धों के लिए बहुत प्रभावशाली रही है।' अमर उजाला के पाठकों को यह जानकर खुशी होगी कि पाकिस्तान के संग्रहालयों में भगवान बुद्ध की कुछ बहुत ही दुर्लभ और ऐतिहासिक मूर्तियां हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध उपवासरत बुद्ध की मूर्ति है।
ऐसे समय में, जब नफरत, उग्रवाद और असहिष्णुता समाजों को बांट रहे हैं, अब वक्त आ गया है कि दुनिया भर के देशों के बीच गांधार सेतु का निर्माण किया जाए, जो शांति और सहिष्णुता के प्रतीक भगवान बुद्ध के संदेश का प्रसार करेगा।