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मुफ्त इंटरनेट का सपना
नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Sun, 10 Jan 2016 06:45 PM IST
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हम एक ऐसे राष्ट्र हैं, जहां पैसे की कीमत आसानी से समझी जा सकती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि जब कहीं सेल लगती है या कुछ मुफ्त मिलता है, तो लेने वालों की लंबी कतार लग जाती है। इसके बावजूद हाल के हफ्तों में फ्री-बेसिक्स नाम की सेवा, जिसके तहत मुफ्त इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है, की काफी आलोचना हुई है। इसका विरोध इसलिए हो रहा है, क्योंकि इसकी मुफ्त इंटरनेट कुछ खास वेबसाइट तक ही सीमित है।
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यह समझने की जरूरत है कि मुफ्त इंटरनेट वास्तव में कैसे निःशुल्क नहीं है और क्यों आधार योजना के पूर्व प्रमुख नंदन नीलेकणी समेत कई टेक्नोक्रेट इसके खिलाफ हैं। उनका यह तर्क सही है कि फ्री-बेसिक्स के तहत मुफ्त इंटरनेट की आड़ में यह दरअसल इंटरनेट पर कब्जा करने की कवायद है, क्योंकि फेसबुक ही यह फैसला करेगी कि कौन-सी सामग्री उपलब्ध होगी। साथ ही, जो लोग फ्री-बेसिक्स सेवा लेंगे, उनकी निजी जानकारियां भी फेसबुक के हवाले हो जाएंगी। हां, कुछ लोगों का मानना है कि फ्री-बेसिक्स वैसे लोगों के लिए अच्छा है, जिनकी अभी इंटरनेट तक पहुंच नहीं है, यानी यह वैसे लोगों को इंटरनेट की दुनिया से रूबरू कराएगा। फेसबुक ने समाचार, मातृत्व स्वास्थ्य, स्थानीय रोजगार एवं स्थानीय सरकारी सूचनाओं जैसे विषय पर इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने के लिए फ्री-बेसिक्स तैयार किया है। यह पहले ही इंटरनेट डॉट ओआरजी, जिसकी शुरुआत 2014 में हुई थी, के तहत ये सेवाएं एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के कई देशों में उपलब्ध करा रही है, जहां इंटरनेट तक लोगों की पहुंच सीमित है या बिल्कुल नहीं है। हालांकि भारत एक अलग बाजार है। यहां मोबाइल की पैठ ज्यादा है, जो भविष्य में इंटरनेट उपभोक्ताओं में वृद्धि की संभावना जताता है।
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ऐसे में फेसबुक के फ्री बेसिक्स को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए, कोई आपको कार चलाने के लिए मुफ्त में ईंधन देता है, लेकिन वह फैसला करता है कि आप कार केवल दो खास दिशाओं में ही चला सकते हैं। ऐसे में, कुछ समय बाद या तो आप अपने पैसे से ईंधन खरीदेंगे या इस पर आश्चर्य करेंगे कि जब केवल अस्पताल या पार्क की तरफ ही कार ले जाई जा सकती है, तो फिर मुफ्त ईंधन का मतलब क्या है।
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फेसबुक का तर्क है कि मुफ्त इंटरनेट संस्करण का अनुभव लेने के बाद ज्यादातर लोग इंटरनेट के लिए पैसे चुकाना शुरू कर देंगे। हालांकि वह यह नहीं बताती कि मुफ्त इंटरनेट पाने वालों को भी इंटरनेट पर पूर्ण पहुंच की जरूरत है। यह मुफ्त उपलब्धता मानो ऐसा है, जैसे मादक पदार्थ बेचने वाला पहले आपको मुफ्त में तब तक ड्रग्स देता है, जब तक आप उस लत के बुरी तरह शिकार नहीं हो जाते, और फिर उसके लिए आपको पैसा चुकाने की जरूरत होती है।
नेट न्यूट्रलिटी के पक्षधरों के मुताबिक, मामला सिर्फ मुफ्त इंटरनेट का नहीं है, तथ्य यह है कि फ्री-बेसिक्स पूरी तरह खुला नहीं है। फेसबुक ने प्रकाशकों और डेवलपरों को इंटरनेट पर अपनी सेवाएं और सामग्री परोसने की अनुमति देने का फैसला तो किया है, पर उसे खारिज करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा है। जबकि इंटरनेट इसके लिए नहीं जाना जाता। लेकिन फेसबुक एक दरबान के रूप में उन सेवाओं और सामग्रियों को प्रतिबंधित करेगी, जो उसे चुनौती देगी।
भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, वर्ष 2015 की पहली छमाही में 5.2 करोड़ लोग इंटरनेट उपभोक्ता बने। लेकिन फ्री-बेसिक्स लोगों को दो हिस्सों में बांट देगी। एक तरफ वे लोग होंगे, जो मुक्त इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे, दूसरे तरफ वे लोग, जो फेसबुक और उसके द्वारा मंजूर सेवाओं का इस्तेमाल करेंगे।
विगत दिसंबर में भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने भारत में फ्री-बेसिक्स की व्यावसायिक लांचिंग को लंबित कर लोगों से राय मांगी थी। ट्राई को फेसबुक के फ्री-बेसिक्स के 14 लाख समर्थक मिले। लेकिन ट्राई का कहना है कि वह उसे खारिज कर सकता है, क्योंकि इन लोगों ने उस सवाल का जवाब नहीं दिया, जो उसने पूछा था। इंटरनेट सेवाओं के मूल्य निर्धारण पर राय देने की ट्राई की अवधि आठ जनवरी को खत्म हो गई और लगता है कि ज्यादातर यहां लोग फ्री-बेसिक्स के खिलाफ हैं।
नीलेकणी ने ठीक ही सबको लिखे अपने ई-मेल में कहा है कि पसंद, प्रतिस्पर्द्धा और खुलापन दांव पर लगा है। इसी के लिए इंटरनेट जाना जाता है। इस समय कोई भी व्यक्ति बिना केंद्रीय प्राधिकार की मंजूरी के अपनी वेबासाइट बना सकता है और कोई भी उस तक पहुंच सकता है। जबकि फ्री-बेसिक्स के पक्ष में मार्क जुकरबर्ग का तर्क है कि यह पुस्तकालय की तरह है, जहां सभी किताबें उपलब्ध नहीं होतीं, फिर भी यह लोगों को ज्ञान तक पहुंचने का अवसर उपलब्ध कराता है। फ्री-बेसिक्स का विरोध करने वाले भी ठीक यही तर्क देते हुए कहते हैं कि पुस्तकालय में कुछ किताबों का न होना एक बात है, पर जहां तक फ्री-बेसिक्स का मामला है, इस पुस्तकालय में मात्र कुछ ही किताबें हैं, जिसमें एक फेसबुक भी है।
जाहिर है, हर कोई मुफ्त इंटरनेट पाना चाहेगा और जब तक हो सके, बिना किसी पाबंदी के हर सामग्री, हर वेबसाइट पर पहुंचना चाहेगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह फ्री शब्द का मजाक है। यह सैटेलाइट सेवा पर मुफ्त चैनल की तरह है, यानी आप हर तरह के आनंद से दूर रहेंगे, पर आपको याद दिलाया जाएगा कि टीवी का असली मजा पाने के लिए आपको भुगतान करना होगा। मुफ्त में आप समाचार और शिक्षा से संबंधित चैनल ही देख पाएंगे।
समझदार भारतीय यह अच्छी तरह समझते हैं कि फ्री-बेसिक्स में मुफ्त कुछ भी नहीं है, बल्कि यह मुफ्त इंटरनेट का सपना भर है।
लेखक, आउटलुक मनी के संपादक हैं