जरूरत है ऐसी 'आवारा' भीड़ को रोकने की
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कल अखलाक था, आज नारंग है और शायद कल मैं। हां बिल्कुल क्यों नहीं! अगर इस आवारा भीड़ को यहीं नही रोका गया तो हम सब एक दिन इनका शिकार होंगे। भीड़ किसी धर्म, जाति या संप्रदाय का हिस्सा नहीं होती। आखिर हम में कितना गुस्सा भरा है? किसी के राय मशिवरे पर हम इतना उबल क्यों जाते हैं कि उसका परिणाम ही मौत हो। अखलाक की मौत को सही ठहराने वाली कौम का कहना था कि उसके घर में बीफ मिला था। ये इस बीफ के आगे 'कथित तौर' भी इस्तेमाल करना चाहते क्योंकि उन्हें उस भीड़ पर पूरा भरोसा था। लेकिन इस भीड़ के बारे में कौमें क्या कहेंगी? या फिर हर मामले में आगे रहने वाली राजनीति की क्या राय है? कोई कुछ कहेगा भी या फिर इस तरह आवारा भीड़ को हम सबका सामूहिक मौन समर्थन मिलता रहेगा।
खबरों के मुताबिक डॉक्टर पंकज नारंग ने गली में गाड़ी से आ रहे नासिर को सिर्फ इतनी हिदायत दी थी कि वो कम स्पीड में चले। नारंग की इस सलाह पर नासिर इतना भड़क गया कि उसने मार डाला। इस हत्या में आरोपी पांच लोग जिसमें एक महिला और नाबालिग भी शामिल है, न्यायिक हिरासत में हैं। इस पर भी पता नहीं पहले जैसी बहस करने, लेख लिखने और राजनीति चमकाने वाले लोग सामने आएंगे या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस हत्या ने फिर से वो डर पैदा कर दिया है जो अखलाक की हत्या पर मुझमें पैदा हुआ था। पता नहीं आप अखलाक की मौत से डरे थे या नहीं। लेकिन मैं एक बार फिर सहम गया हूं। क्या पता मैं कब किस के गुस्से का शिकार हो जाऊं, नहीं पता। एक समय था जब पुलिस और अदालतें किसी भी मर्डर या संदिग्ध हत्या में यह पूछने की जहमत उठाती थी कि 'किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?' इस आवारा भीड़ ने उनसे यह मौका भी छीन ही लिया है।
कुछ समझदार लोगों को अखलाक और नारंग की हत्या में हिन्दू और मुस्लिम दिखाई दे रहा है। किसी को ये दिखाई दे रहा है कि मीडिया ने इस खबर को उस ढ़ंग से पेश नहीं किया जिस तरह से वो अन्य मामलों में करती है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अखलाक और नारंग की हत्या में कोई समानता है ही नहीं। लोग यह भी मान रहे हैं कि अगर आपको इसमें कोई समानता नजर आ रही है तो आप उसे धर्म और संप्रदाय के चश्मे से देख रहे हैं। गलत हैं आप लोग। अंधे भी। अगर आपको अखलाक और नारंग की हत्या में समानता नजर नहीं आती तो। अगर आपको इन हत्याओं में धर्म नजर आ रहा है तो आप संवेदनशील समाज का हिस्सा होने लायक नहीं हैं।
ये सोच उन्हीं लोगों की है जो खुद सोशल होने का दावा करते हुए अपनी वॉल और न्यूज फीड में मुल्क बचाने वाली गजलें और सुबह-सुबह सुविचार साझा करते हैं। दरअसल, केवल सुविचार और राष्ट्रवाद से ओत प्रोत गजलें साझा कर लेने भर से सारी सामाजिकता आपके दिल दिमाग में नहीं बस जाती। वो आती है तो आपके सामाजिक होने। उन सुविचारों और गजलों को समझने से। आपको क्या लगता है कि जिन लोगों ने इन हत्याओं को अंजाम दिया है वो आप के गिरेबां तक नहीं पहुंचेंगे? ग़र आपको ऐसा लगता है तो आप शेख चिल्ली के सपनों वाली दुनिया में अपनी जिन्दगी बिता रहे हैं। इस भीड़ का चेहरा कभी कोई नासिर होता है तो कभी विशाल। यह बात समझ के परे है कि ऐसी सनसनीखेज हत्याओं के गुनाहगार 20 से 25 साल के बीच वाले ही क्यों होते हैं? जिस युवा जोश पर पुरा मुल्क पर गर्व करता है क्या ये उसी जोश का प्रतीक हैं?
इन सब के बीच यह देखना जरूरी हो जाएगा कि प्रशासन और समाज इस मामले में कैसा रवैया अपनाता है। अब हमें जरूरत है कि हम धर्म, संप्रदाय सरीखे दायरों से ऊपर उठकर ऐसी हर हत्या का विरोध करने का है जो सिर्फ इंसान ही नहीं वरन् इंसानियत को भी मुर्दा करने की ओर है। जरूरत है खुद पर काबू करने की। जरूरत है ऐसी आवारा भीड़ को रोकने की। हम ऐसे हालात में पहुंच चुके हैं कि कितनों की मौत को अब हम मौत भी नहीं कह सकते। मौत वो होती है जो असामयिक हो। जो जिन्दगी किसी द्वेष, गुस्से और अहंकार की बलि न चढ़ी हो उसे मौत कहा जा सकता है लेकिन भीड़ तो मौत तक की परिभाषा को बदलने में जुट गई है।