मामला फिल्मी हो तो कुत्ते जरूरी हैं
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फिल्मों की बात कुत्तों के बिना अधूरी रहती है जी। कुत्तों के बिना किसी हिंदी फिल्म का हिट होना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। कुत्तों के बिना एक धांसू डायलॉग तक तो मारा नहीं जा सकता, फिल्म कहां से हिट होगी! फिल्मों में विलेन इतनी शराब नहीं पीता होगा, जितना हीरो गुंडों का खून पीता है। ज्ञानी जन शराब को तो सेहत के लिए हानिकारक बताते रहे हैं, और शायद इसी वजह से विलेन पिटता भी बहुत है। आखिर कमजोर जो हो जाता है। जबकि कुत्तों का खून पीने की बात मात्र कहकर हीरो इतना शक्तिशाली हो उठता है कि वह पचासों गुंडों से अकेला निपट लेता है। इसीलिए शायद ज्ञानीजन भी कुत्तों का खून पिए जाने पर चुप्पी साध जाते हैं। और यह बात तो कतई नहीं कहते कि यह सेहत के लिए हानिकारक है। फिर हमारे यहां कुत्ते के इतने टुकड़े किए जाते हैं, जितने अचार के लिए शायद आम के भी न किए जाते हों।
फिर भी देखिए कि सलमान खान के हिट ऐंड रन केस में जब गायक अभिजीत ने फुटपाथ पर सोनेवालों की तुलना कुत्तों से कर दी, तो लोग कितना भड़क उठे। वैसे लोग भड़क तो तब भी उठे थे, जब मोदी जी ने गुजरात दंगों में मरनेवालों को कुत्ते-पिल्ले टाइप कुछ कह दिया था। निश्चित रूप से यह उन पर फिल्मी असर नहीं रहा होगा, जो अमित जी से उनकी मित्रता की वजह से आया होगा। बल्कि वह तो संघ की ऐसी काली कमली ओढ़े हैं कि उन पर कोई और रंग चढ़ ही नहीं सकता। खैर, गायक अभिजीत ने कहा कि कुत्ता रोड पर सोएगा, तो कुत्ते की ही मौत मरेगा। सड़क गरीब के बाप की नहीं है। वैसे तो गरीब भी यह बात कह सकते हैं कि यह मुल्क तुम्हारे बाप का नहीं है। पर वे कहते नहीं हैं। वे ट्विटर पर नहीं हैं, न फेसबुक पर। पर जी, फिल्मों में तो कोठी-बंगलों में रहनेवाले विलेनों को भी फुटपाथिया हीरो कुत्ते की मौत मारने की ही धमकी दिया करता है। पर खैर जी, अच्छी बात यह है कि इधर एक विज्ञापन में कुत्ते भी अपने लिए कार सेलेक्ट करने लगे हैं। अब पता नहीं, इंसानों का क्या होगा?