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टाइम मशीन: विलुप्ति के 300 साल बाद डोडो का संदेश, जिसमें छिपा है पारिस्थितिक संकेत
Sun, 23 Mar 2025 07:13 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
रेनी बर्गलैंड
रेनी बर्गलैंड
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Sun, 23 Mar 2025 07:13 AM IST
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विस्तार
विलुप्ति शब्द तब से हमें परेशान कर रहा है, जब हमें इसके बारे में पता भी नहीं था। ऐसे समय में जब प्रजातियों के लुप्त होने की अवधारणा को हम समझ भी नहीं पाए थे, विलुप्ति को प्रकट करने वाला पहला जीव शायद डोडो ही था। मोटा और उड़ने में असमर्थ यह पक्षी 17वीं सदी में मॉरीशस द्वीप पर यूरोपीय नाविकों को मिला। पश्चिमी लोगों द्वारा किए गए शिकार के कारण इस पक्षी के लुप्त होने को सबसे शुरुआती ज्ञात विलुप्ति माना जाता है। डोडो मॉरीशस द्वीप का स्थानीय पक्षी था, जिसका सबसे करीबी जीवित रिश्तेदार निकोबार कबूतर है, जो भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है। पर विलुप्ति के बावजूद चार शताब्दियों से डोडो हमारी कला और तर्कों में एक प्रतीक बनकर रहा है।
डोडो का प्रतीक समय के साथ बदलता गया है। यह विभिन्न रूपों में दृष्टांत, मजाक और चेतावनी के रूप में रहा है। जब हम इसे मनुष्य के विनाशकारी लालच के प्रतीक के रूप में देखते हैं, तो पछतावे और दुख से बचने का कोई उपाय नहीं दिखता। लेकिन डोडो का संदेश हमें आशा की ओर भी प्रेरित कर सकता है। बेशक हम अपने पूर्वजों की गलतियों को सुधार नहीं सकते, लेकिन बची हुई प्रजातियों की रक्षा करने और उनका आनंद लेने के लिए नए संकल्प के साथ पारिस्थितिक दुख से उबर सकते हैं। प्राकृतिक दुनिया से संबंध बनाना बिल्कुल संभव है, जो हमें विकास की ओर ले जाता है।
पहले डोडो लालच और मूर्खता के प्रतीक थे। बिना किसी सुबूत के, यूरोपीय लोगों ने कल्पना की कि डोडो खुद लालची पक्षी थे। चित्रकारों ने डोडो को पाप का प्रतिनिधित्व करने के लिए चित्रित किया, जैसा कि फ्रांज रोसेल वॉन रोसेनहॉफ के 'आफ्टर द फॉल' में है, जिसमें एक निर्दोष छवि का शांतिपूर्ण बैल एक अन्य पेंटिंग में एक अशुभ अजीब डोडो बन गया। चूंकि एक डोडो का वजन आसानी से 50 पाउंड हो सकता है, ऐसे में उसकी मोटाई उसकी अजीब छवि को बढ़ावा देने में मदद करती है। एक डोडो से 25 नाविकों का पेट भरा जा सकता था, भले ही डोडो का मांस चिकना और बेस्वाद होता था। फ्रेंच में डोडो को 'नजाकत का पक्षी' के नाम से जाना जाता था। नाविकों द्वारा शिकार किए जाने के कारण तथा यूरोपीय लोगों के साथ आए चूहों और सूअरों द्वारा उनके अंडों और आवास को नष्ट कर दिए जाने के कारण डोडो लंबे समय तक जीवित नहीं रहे।
आखिरी डोडो को वर्ष 1700 से पहले ही मार दिया गया था। उस समय, मानवता आसानी से किसी प्रजाति के विलुप्त होने की कल्पना नहीं कर सकती थी। डोडो के गायब होने के बाद, कई लोगों ने सोचा कि उनका गायब होना मनुष्यों के लिए एक दिव्य संदेश था। उनका प्रतीकवाद धीरे-धीरे बदल गया, उन्हें लालची पक्षियों से यूरोपीय लालच के प्रतीक में बदल दिया गया।
फ्रांसीसी जीवाश्म विज्ञानी जॉर्जेस कुवियर को लोगों को यह समझाने में सौ साल से ज्यादा का समय लग गया कि पृथ्वी से प्रजातियों को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है। जीवाश्मों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने 1796 में तर्क दिया कि प्राकृतिक आपदाओं के चलते कई प्रजातियां विलुप्त हो गई थीं। मनुष्य हिमयुग के बाद से विलुप्ति का कारण बन रहे थे। विशेष रूप से न्यूजीलैंड में पोलिनेशिया का विस्तार बड़े पैमाने पर प्रजातियों के विनाश के लिए जिम्मेदार था, जिसने शुरू में यूरोपीय खोजकर्ताओं को परेशान किया। लेकिन यह विचार उन्हीं यूरोपीय लोगों के लिए लगभग पूरी तरह से नया था। मैरी शेली और लॉर्ड बायरन सहित रोमांटिक कवियों और उपन्यासकारों ने भूविज्ञान के प्राकृतिक समापन बिंदु के रूप में मानव विलुप्ति की कल्पना शुरू कर दी और डायस्टोपियन (निराशाजनक) रचनाएं लिखीं, जिनमें पृथ्वी को अंततः 'मृत्यु उपत्यका' से अधिक नहीं बताया गया। कुवियर के पचास साल बाद, जब शिकारियों ने 1844 में आखिरी महान ऑक्स को मार डाला, तो यह तथ्य कि मनुष्य सीधे विलुप्ति का कारण बन सकता है, एक और झटका था।
डोडो के विनाश के बारे में एक नई समझ पैदा हुई, हालांकि इसमें हमेशा शोक शामिल नहीं था। 19वीं सदी के कुछ विचारकों ने मानव शक्ति के बारे में कहा कि यह इतनी महान है कि यह पूरी प्रजाति को मिटा सकती है। 1874 में, चार्ल्स डार्विन और उनके वैज्ञानिक सहयोगियों ने मॉरीशस के औपनिवेशिक गवर्नर से स्थानीय कछुओं को बचाने की अपील में डोडो का हवाला दिया। डार्विन और उनके साथी उन कछुओं को नहीं बचा पाए, जो जल्द ही डोडो की तरह विलुप्ति का शिकार हो गए। डार्विन ने निश्चित रूप से डोडो के लिए शोक जताया, लेकिन उन्होंने विलुप्त होने को अन्य तरीकों से भी देखने की कोशिश की-एक रचनात्मक शक्ति के रूप में, जो विकास के लिए आवश्यक है। उन्होंने लिखा, 'पुराने रूपों का विलुप्त होना और नए और बेहतर रूपों का जन्म एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।' उनके अनुसार, एक प्रजाति का विनाश बिल्कुल नई प्रजाति को जन्म दे सकता है। इसके पीछे तर्क यह है कि डायनासोर के खत्म हुए बिना स्तनधारियों का उदय नहीं हो सकता था। बाद के लेखक डार्विन की सृजनात्मक प्रतिक्रिया से प्रभावित हुए। एमिली डिकिंसन के लिए, 'एक हड्डी' रहस्यों को उजागर कर सकती है। उन्होंने लिखा, विज्ञान और कल्पना, 'घास के मैदान के सबसे नाजुक फूल' का उपयोग ' कई गुना गुलाब और लिली/और अनगिनत तितलियों' के समृद्ध आवास के पुनर्निर्माण के लिए कर सकते हैं। यह सोच हमें अपने अनिश्चित भविष्य को स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करती है। हम नहीं जान सकते कि विलुप्त होने के बाद क्या होगा। ऐसी अनंत संभावना भयावह है, लेकिन रोमांचकारी भी है। जीवमंडल उन तरीकों से बदल रहा है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
आज, मनुष्यों के कारण अनेक प्रजातियों की विलुप्ति की गति तेज हो रही है। इस लंबी सूची में डोडो पहले से ही शामिल है। इसके अलावा, दस लाख प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। हमारी वर्तमान चिंतित करने वाली पारिस्थितिकीय वातावरण में डिकिंसन और डार्विन की तरह पौधों और जानवरों की शानदार विविधता से भरे भविष्य की कल्पना करना कठिन है। लेकिन यह असंभव नहीं है। लंबे समय से लुप्त हो चुकी प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के बारे में सोचना भले ही बेहद आनंददायक क्यों न हो (कुछ वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि प्रयोगशाला में पर्याप्त खर्च किया जाए, तो डोडो भी वापस आ सकता है), लेकिन यह स्वीकार करना शायद बेहतर है कि प्रत्येक प्रजाति को सहारा देने वाले रिश्तों का जाल बेहद जटिल है और यह हमेशा बदलता रहता है। हममें से कोई भी कभी डोडो नहीं देख पाएगा, लेकिन हम उन पक्षियों को बचा सकते हैं, जो अब भी हमारे बीच रहते हैं। जैसा कि डिकिंसन ने कहा, 'उम्मीद पंखों वाली चिड़िया है।'