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ताकि सांसद खुद को वीआईपी न समझें

Sun, 27 Jul 2014 04:52 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 27 Jul 2014 04:52 PM IST
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Do not get the MP oneself VIP

महाराष्ट्र सदन में घटी शर्मनाक घटना पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना देने की जरूरत है। हमारे जनप्रतिनिधि दिल्ली में आते ही भूल जाते हैं कि उनको संसद में भेजा किसने और वे यहां क्या करने आए हैं। इसलिए शिवसेना के सांसदों का पहला हंगामा जनता की सेवा को लेकर नहीं, अपनी सेवा को लेकर हुआ। उनमें से एक जब एक रोजेदार कर्मचारी के मुंह में जबर्दस्ती रोटी ठूंसते पकड़े गए, तो उन सबने अपने बचाव में कहा कि हमको वह इज्जत नहीं दी जा रही, जिसकी सांसद होने के नाते हम अपेक्षा करते हैं। हम सांसद हैं, तो हमें छोटे कमरे क्यों दिए गए हैं। हम महाराष्ट्र के सांसद हैं, तो क्यों नहीं हमें मराठी खाना दिया जा रहा है। यानी इतनी जल्दी वे जनप्रतिनिधि होने का मतलब भूल चुके हैं।

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जिन मतदाताओं ने उनको चुनकर संसद में भेजा है, उनमें से अधिकतर ऐसे लोग हैं, जिनके अपने घर के सामने महाराष्ट्र सदन का छोटा कमरा महल जैसा होगा। अनेक मतदाता ऐसे हैं, जिनको दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी मिल जाए, तो वे गनीमत मानते हैं। संसद में मतदाताओं की नुमाइंदगी करने वालों को तकलीफ जनता की तकलीफों से होनी चाहिए। पर ऐसा नहीं होता। दिल्ली में पहुंचते ही वे अपनी सुविधाओं और अपनी इज्जत को अहमियत देने लगते हैं।
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मजे की बात है कि महाराष्ट्र के ही अन्ना हजारे ने इस बात को लेकर इतना बड़ा आंदोलन शुरू किया था। अन्ना बार-बार सांसदों के बारे में कहा करते थे कि वे जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। यही बात प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने पहले भाषण में कही थी। समाजवादी सोच ने हमारे सांसदों की आदतें बिगाड़ दी हैं।
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देश भर में आवास की कमी है, मगर हम लुटियंस दिल्ली में अपने सांसदों को आलीशान आवास देते हैं। देश भर में बिजली-पानी का अभाव है, लेकिन दिल्ली में सांसदों को इन चीजों का अभाव नहीं है। मेरी उम्र के लोगों को वे दिन याद हैं, जब घरेलू गैस का इतना अभाव हुआ करता था कि किसी सांसद की मदद के बिना दिल्ली में सिलेंडर नहीं मिला करता था। टेलीफोन लाइन भी अगर अपने घर में लगवानी होती थी, तो उसके लिए किसी सांसद की मदद चाहिए होती थी।

दोस्तो, ये गलत आदतें हमने तत्कालीन सोवियत यूनियन और चीन जैसे देशों की नकल करके डालीं, जहां कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य शान से रहा करते थे और जनता के जीवन में हर चीज का अभाव होता था। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के लोकतांत्रिक देशों में आपको ये परंपराएं नहीं मिलेंगी। वहां जनप्रतिनिधियों को अपनी तनख्वाहों से किराये के मकान लेने पड़ते हैं और खुद ही बिजली-पानी के खर्च उठाने पड़ते हैं।


इसलिए प्रधानमंत्री जी, मैं आपसे निवेदन करती हूं कि असली परिवर्तन अगर आप लाना चाहते हैं, तो दिल्ली में सांसदों को आवास देने की परंपरा बंद कीजिए। हर राज्य सरकार का दिल्ली में अपना सदन है, जिसमें सांसदों के रहने का पूरा इंतजाम है। इन सदनों में हमारे जनप्रतिनिधि क्यों नहीं रह सकते? भारतीय राजनीति में यह छोटा-सा कदम उठाने के बाद इतना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा, जिसकी कल्पना करना मुश्किल है। फिर राजनीति में लोग जनता की सेवा करने आएंगे, और दिल्ली में आने के बाद वे खुद को वीआईपी नहीं समझेंगे। इससे अच्छा बदलाव क्या हो सकता है?

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