फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   DMK govt advertisements in Hindi showing change in its approach of politics in tamil nadu

भाषा: सियासत की राह पर सरपट दौड़ रही हिंदी, यही साबित करता है द्रमुक का बदला हुआ रवैया

Mon, 04 Sep 2023 07:15 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 04 Sep 2023 07:15 AM IST
विज्ञापन
सार
द्रमुक की पूरी राजनीति जिस हिंदी के विरोध में आगे बढ़ी है, द्रमुक सरकार का अब उसी हिंदी में विज्ञापन जारी करना मामूली बात नहीं है। 
 
loader
DMK govt advertisements in Hindi showing change in its approach of politics in tamil nadu
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media

विस्तार

तमिलनाडु की मौजूदा सत्ता का नजरिया क्या हिंदी के प्रति उदार होने लगा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि कुछ ही दिन पहले तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने अपनी उपलब्धियों को लेकर उत्तर भारत के कुछ बड़े हिंदी अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन जारी किया था। जिस हिंदी के विरोध में द्रमुक की पूरी राजनीति आगे बढ़ी है, उसी हिंदी में द्र्मुक सरकार का विज्ञापन जारी करना मामूली बात नहीं है। द्रमुक ने राजनीतिक दल के तौर पर बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। तमिलनाडु की जनता की नजर में उसकी एक कामयाबी हिंदी विरोध को उस चरम पर पहुंचाना भी रहा है, जहां से पीछे लौट पाना आसान नहीं।


सांविधानिक प्रावधानों के मुताबिक, हिंदी को 26 जनवरी, 1965 के दिन से राजभाषा के तौर पर पूरी तरह स्थापित होना था। वह द्रविड़ राजनीति ही रही, जिसने तब गणतंत्र दिवस के सम्मानवश 26 जनवरी के बजाय उसके ठीक एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को पूरे तमिलनाडु को हिंदी-विरोधी काले झंडों से पाट दिया था। उसके बाद हिंदी को राजभाषा का असल स्थान देना टल ही गया। हिंदी के विरोध में काला झंडा फहराने वाले राजनीतिक दल के हिंदी में विज्ञापन जारी करने पर सुखद आश्चर्य होगा ही।


स्टालिन सरकार के इस कदम पर हैरान होने की कई वजहें हैं। भारतीय राजनीति की समाजवादी धारा हिंदी की घोर समर्थक रही है। लोहिया का अंग्रेजी हटाओ अभियान हिंदी का समर्थन ही था। मुलायम सिंह यादव जब पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब हिंदी को स्थापित करने के लोहिया के सपने के अनुरूप कदम उठाने को प्रेरित हुए। अच्युतानंद मिश्र जैसे कतिपय वरिष्ठ पत्रकारों के सुझाव पर उन्होंने गैर हिंदीभाषी राज्यों के बीच हिंदी को पत्र-व्यवहार का माध्यम बनाया। गैर हिंदीभाषी राज्यों की सुविधा के लिहाज से हिंदी पत्र का उस विशेष राज्य की भाषा में अनुवाद भी दिया जाना था। उसी योजना के तहत स्टालिन के पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की सरकार को हिंदी में तमिल अनुवाद के साथ पत्र भेजा गया। पर करुणानिधि ने मुलायम से अपने गर्मजोशी भरे संबंधों को धता बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को सिर्फ तमिल और अंग्रेजी में जवाब भेजा।

हाल-हाल तक स्टालिन सरकार हिंदी को लेकर आक्रामक रही है। अगस्त, 2020 में नई शिक्षा नीति के बहाने स्टालिन ने हिंदी के खिलाफ हमला बोला था। बीते मार्च में जब नियमों के तहत दही के पैकेट पर हिंदी में दही लिखना अनिवार्य किया जा रहा था, तब तमिलनाडु ने भाषायी साम्राज्यवाद का आरोप लगाते हुए इसका विरोध किया। पिछले महीने भी स्टालिन सरकार ने हिंदी के खिलाफ विषवमन किया।

तमिलनाडु में हिंदी का विरोध अलबत्ता अब सिर्फ राजनीतिक ही रह गया है। चेन्नई की कई दुकानों पर हिंदी में सामान मांगने या मोल-तोल करने में अब हिंदीभाषियों को दिक्कत नहीं होती। तमिलनाडु की नई पीढ़ी समझने लगी है कि हिंदी का विरोध महज राजनीतिक है। पश्चिम एशिया के देशों में ‘नौकरी’ कर रहे तमिल युवाओं को पता है कि वहां तमिल या किसी अन्य दूसरी भारतीय भाषा के बजाय एशियाई लोगों से आपसी संपर्क हिंदी के जरिये कहीं ज्यादा सुगम है। पुरानी पीढ़ी के लोग भी अब स्वीकारते हैं कि हिंदी का विरोध कर उन्होंने बहुत कुछ खोया है।

तमिलनाडु की आर्थिकी का एक बड़ा आधार उत्तर भारत से लगातार तमिलनाडु पढ़ने जा रहे छात्र भी हैं। वहां नौकरी कर रहे नौजवान भी तमिलनाडु के आर्थिक आधार के अहम स्तंभ बन रहे हैं। तमिलनाडु में पेशेवर काम करने वालों में काफी संख्या में उत्तर भारतीय हैं। चाहे छात्र हों, नौकरीपेशा लोग या कारीगर, सब अपनी जरूरत के हिसाब से तमिल जरूर सीख रहे हैं। ऐसे में, तमिलों का मानस भी बदल रहा है। तमिलनाडु में अच्छी शिक्षा में हिंदी पढ़ना भी शामिल होता जा रहा है।

इस लोक दबाव को शायद स्टालिन सरकार भी समझ रही है। उसे भी लगता है कि उत्तर भारत में अगर अपनी छवि बनानी है, तो हिंदी का ही सहारा लेना पड़ेगा। शायद ये तमाम कारक हैं, जिन्होंने स्टालिन सरकार को मामूली स्तर पर ही सही, अपना नजरिया बदलने को मजबूर किया है। इसका स्वागत करना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed