पर्यावरण के लिए चुनौती न बने दिवाली, 90 फीसदी लोग वायु प्रदूषण की चपेट में
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अब समय आ चुका है कि हम दीपावली का सही मतलब समझें। यह इसलिए भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि हमारे पर्यावरण की क्षति एक गंभीर स्थिति तक पहुंच चुकी है। आज अगर हम दुनिया भर में देखें, तो बढ़ते प्रदूषण से प्राणवायु एक बड़े संकट में है। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां प्राणवायु की हालत गंभीर न हो चुकी हो।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में करीब 90 फीसदी लोग आज किसी न किसी रूप में वायु प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं, जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रोजाना की अपनी गतिविधियों में हम ऐसे साधनों का उपयोग कर रहे हैं, जो हमारी प्राण वायु को ही संकट में डाल रहे हैं।
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अब समय आ चुका है कि हम दीपावली का सही मतलब समझें। यह इसलिए भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि हमारे पर्यावरण की क्षति एक गंभीर स्थिति तक पहुंच चुकी है। आज अगर हम दुनिया भर में देखें, तो बढ़ते प्रदूषण से प्राणवायु एक बड़े संकट में है। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां प्राणवायु की हालत गंभीर न हो चुकी हो।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में करीब 90 फीसदी लोग आज किसी न किसी रूप में वायु प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं, जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रोजाना की अपनी गतिविधियों में हम ऐसे साधनों का उपयोग कर रहे हैं, जो हमारी प्राण वायु को ही संकट में डाल रहे हैं।
यह अजीब-सी बात है कि जब प्राण वायु ही हमारे प्राण लेने पर उतारू हो जाए, तो उसका दोष आखिर किसके सिर पर मढ़ा जाए! और ऐसे में अगर हम दिवाली में पटाखों का अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं, तो यह समझ लें कि यह पर्व नहीं, बल्कि हमारा पतन ही होगा। दुनिया में पटाखों की संस्कृति किसी न किसी रूप में हमेशा से ही रही है। लेकिन प्रदूषण ने जिस तरह से हमारे बीच में जगह बना ली है, ऐसे में शायद अब हमें नए सिरे से यह सोचना होगा कि हमारे पर्वों का स्वरूप क्या हो।
अब देखिए, शास्त्र कहीं भी दीपावली में इस तरह के शोर-शराबे के महत्व को नहीं दर्शाते। लेकिन हमने चाहे वह दशहरा हो या फिर दिवाली, इन दोनों ही पर्वों पर पटाखों की झड़ी लगाकर इसके मूल स्वभाव को ही एकदम बदल दिया है। दीपावली रोशनी के आगाज से जुड़ा हुआ एक पर्व है। भगवान रामचंद्र लंका में रावण पर जब जीत हासिल कर चुके, तो समाज ने उसको एक ऐसी जीत के रूप में देखा कि यह एक नए उजाले की शुरुआत हुई है। दीपावली में कभी भी पटाखों की किसी भी रूप में जगह नहीं रही। यह तो हम हैं, जिन्होंने इस पर्व को पटाखों के शोर-शराबे में बदल दिया। और आज इसने गंभीर स्थिति धारण कर ली है।
ये फेफड़े ही हैं, जिनके माध्यम से हमारे रक्त में ये सारे तत्व विभिन्न अंगों को घातक रूप से प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, सल्फर डाई ऑक्साइड की ज्यादा मात्रा सांसों को अवरुद्ध करती है, तो कैडमियम एनीमिया पैदा कर किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, कॉपर सांसों में अवरोध पैदा करता है और इसी तरह से लेड और मैग्नीशियम किसी न किसी रूप में हमारे शरीर के लिए बेहद घातक सिद्ध होते हैं। और यही तत्व जब जल के साथ मिलकर फसलों पर ब्लैंकेट बना लेते हैं, तो उन पर भी इनका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जो कहीं न कहीं उस रास्ते से हमारे शरीर में भी प्रवेश कर जाते हैं।
इतना ही नहीं, पटाखे ध्वनि प्रदूषण पैदा कर हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बड़ा बुरा असर डालते हैं, क्योंकि इनसे उत्पन्न ध्वनि 90 डेसिबल की होती है। जब एक जहाज उड़ता है, तब जो शोर उससे पैदा होता है, उसकी बराबरी पटाखों के शोर से की जा सकती है। इन सबके अलावा जब यह देश कूड़े की मार झेल रहा हो, तब दिवाली के दिन कूड़े का एक और पहाड़ हम खड़ा कर देते हैं। गांव, शहर और कोई गली ऐसी नहीं बचती, जहां पटाखों का कूड़ा अपनी जगह न बना लेता हो।
हमें समझना चाहिए कि अब स्थिति ऐसी नहीं रही, जो कि आज से 25 साल पहले थी, जब वातावरण इस तरह के दुष्प्रभावों को झेलने की क्षमता रखता था। पर अब जब हालात गंभीर हो चुके हैं और सब कुछ मिटने को तैयार हो, तब बेहतरी इसी में है कि हम अपने लिए संकट के रास्ते तैयार न करें, क्योंकि वायु प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित बच्चे ही होते हैं, जिनसे हमारा भविष्य जुड़ा होता है। इस बार दीपावली में हमारा यही संकल्प होना चाहिए कि हम बेहतर समाज और दुनिया का निर्माण करें और इस पर्व का सही अर्थ समझें।